समान कानून का छलावा और न्याय की तराजू क्या केवल प्रभाव ही तय करता है जांच की दिशा?

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जेठपुर/राजकोट। 1 युवक की दिनदहाड़े निर्मम हत्या ने समाज में एक गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। जब सरेआम चाकू से किसी की जान ली जाती है, तो व्यवस्था का तंत्र सक्रिय तो होता है, लेकिन उस सक्रियता की गति और दिशा पर अब सवाल उठने लगे हैं। विधि और न्याय के सिद्धांतों की बात करें, तो कानून की नजर में हर नागरिक समान है, परंतु धरातल पर जो वास्तविकता सामने आ रही है, वह एक विचलित करने वाली तस्वीर पेश करती है।


संसाधन और पहुंच का अदृश्य प्रभाव
अक्सर यह देखने में आता है कि जब कोई अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति या बड़ी हस्ती किसी मामले से जुड़ती है, तो जांच का दायरा स्वतः ही व्यापक हो जाता है। चाहे मामला आत्महत्या का हो या कोई और, संसाधनों की उपलब्धता और आर्थिक प्रभाव के कारण जांच की गंभीरता और उसकी प्रक्रिया में एक स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। वहीं, दूसरी ओर जब एक सामान्य व्यक्ति किसी अपराध का शिकार होता है, तो जांच की गति उस स्तर पर नहीं पहुँच पाती जो एक पीड़ित परिवार के लिए न्याय का मार्ग प्रशस्त करे। यह अंतर क्या केवल प्रशासनिक प्रक्रिया है, या फिर यह धन-बल और पहुंच का प्रभाव है, जो न्याय की गति को धीमा या तेज कर देता है? समाज में अब यह चर्चा आम हो गई है कि क्या न्याय अब केवल उन लोगों के लिए सुलभ है जो व्यवस्था में अपना प्रभाव रखने में सक्षम हैं?

व्यवस्था का ध्रुवीकरण और समाज की चिंता
आज का समाज इस बात से भी चिंतित है कि आपराधिक मामलों को किस चश्मे से देखा जा रहा है। प्रशासनिक कार्रवाई में तटस्थता के बजाय किसी विशेष समुदाय या समूह को केंद्र में रखकर चर्चा करना, कानून के मूल उद्देश्यों को कमजोर करता है। यह एक अत्यंत संवेदनशील विषय है, जहाँ धर्म और समुदाय के नाम पर विमर्श को मोड़ दिया जाता है। प्रशासन और जांच एजेंसियों को यह समझना होगा कि अपराध का कोई धर्म या जाति नहीं होती, और न ही न्याय का स्वरूप किसी समूह के आधार पर अलग होना चाहिए। जब किसी मामले को केवल ध्रुवीकरण के जरिए देखा जाता है, तो न्याय का मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाता है। यह स्थिति कानून के शासन के लिए एक गंभीर चुनौती है, क्योंकि इससे आम नागरिक का व्यवस्था से भरोसा उठने लगता है।

​पत्रकारिता और सच की अग्निपरीक्षा
जब एक पत्रकार अपनी कलम से यह सच लिखता है कि कानून का प्रयोग समान होना चाहिए, तो उसे कई तरह के दबावों का सामना करना पड़ता है। व्यवस्था को यह स्वीकार करना होगा कि प्रश्न पूछना पत्रकारिता का धर्म है, न कि किसी के खिलाफ साजिश। कुछ लोगों की वजह से पत्रकारिता पर सवाल उठते हैं, लेकिन यह मानना गलत होगा कि पूरी पत्रकारिता अपनी मर्यादा खो चुकी है। जो पत्रकार आज भी बिना किसी भेदभाव के सच लिख रहे हैं, वे केवल समाज का आईना दिखा रहे हैं। इन पत्रकारों पर जो संकट आते हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि सच लिखना आज के दौर में कितना कठिन है।

अंतिम विचार
न्याय की मांग किसी जाति, धर्म या आर्थिक स्तर के आधार पर नहीं होनी चाहिए। कानून का शासन तभी प्रभावी है जब वह गरीब और अमीर, प्रभावशाली और साधारण के बीच भेदभाव न करे। अपराधियों के हौसले तब तक बुलंद रहेंगे जब तक हम अपराध को धर्म और प्रभाव के चश्मे से देखना बंद नहीं करेंगे। जेठपुर की घटना पर आम जनता की नजरें हैं कि प्रशासन इस मामले की तह तक कैसे पहुँचता है। जनता केवल कार्रवाई नहीं चाहती, बल्कि वह यह देखना चाहती है कि कानून सबके लिए बराबर है। सच को सामने लाना हमारा धर्म है, और हम इस कर्तव्य पर सदैव अडिग रहेंगे।