आगर-मालवा/नलखेड़ा। धर्मधानी में अब श्रद्धा के नाम पर चल रहे व्यापार और दान की पेटियों में हो रही सेंधमारी के खिलाफ बगावत का बिगुल बज चुका है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद देश भर में जिस तरह से मंदिरों के प्रबंधन, दान और पारदर्शिता को लेकर नई जागरूकता आई है, उसके बाद अब मंदिरों की दान पेटियों और व्यवस्थाओं की पोल-पट्टी खुलने का दौर शुरू हो गया है। इसी कड़ी में आगर-मालवा के प्रसिद्ध मां बगलामुखी मंदिर, नलखेड़ा से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने धार्मिक संस्थानों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। कलेक्टर द्वारा जारी आदेश ने अब उन लोगों की बोलती बंद कर दी है जो मंदिर की आड़ में अपनी तिजोरियां भर रहे थे।
मंदिर परिसर में चल रहा था समांतर प्रशासन
आगर-मालवा के कलेक्टर द्वारा जारी जांच दल आदेश के अनुसार, मां बगलामुखी मंदिर, नलखेड़ा में गंभीर अनियमितताओं की शिकायतें प्राप्त हुई थीं। आरोप बेहद संगीन हैं—मंदिर परिसर में एक गैर-शासकीय समिति द्वारा शासन की आधिकारिक प्रबंधन समिति से अलग हटकर, अपने स्तर पर श्रद्धालुओं से नगद और स्वर्ण-रजत आभूषणों के रूप में दान वसूलने का खेल चल रहा था। इतना ही नहीं, दान की गई इस राशि को सरकारी खजाने में जमा करने के बजाय निजी बैंक खातों में उपयोग करने के भी गंभीर आरोप हैं। इन तथ्यों के सामने आने के बाद कलेक्टर ने इसे गंभीरता से लेते हुए तीन-सदस्यीय संयुक्त जांच दल का गठन कर दिया है, जिसमें जिला पंचायत के सीईओ श्री बी.एस. सोलंकी, जिला कोषालय अधिकारी श्री मनीष सोलंकी और मुख्य नगर पालिका अधिकारी सुश्री मिनी अग्रवाल शामिल हैं।

अयोध्या से शुरू हुआ जागृति का दौर, अब दानपात्रों पर होगी पैनी नजर
अयोध्या में राम मंदिर के बाद देशभर में अब मंदिरों के प्रबंधन को लेकर भक्तों की आंखें खुल गई हैं। अब श्रद्धालु सिर्फ आस्था में अंधे होकर दान नहीं दे रहे, बल्कि वे यह भी जानना चाहते हैं कि उनकी गाढ़ी कमाई का एक-एक रुपया कहाँ जा रहा है। देश के कई हिस्सों से खबरें आ रही हैं कि कैसे मंदिरों के दानपात्रों में से पैसे गायब हो रहे हैं और कैसे कुछ लोग इसे अपनी ‘पर्सनल एटीएम’ समझ बैठे हैं। मां बगलामुखी मंदिर का यह मामला उसी श्रृंखला की एक कड़ी है, जो साबित करता है कि अब समय बदल गया है। जो लोग मंदिरों को निजी जागीर समझकर चला रहे थे, उन्हें अब जवाब देना होगा। क्या अब हर प्राचीन मंदिर के दानपात्रों की जांच होगी? क्या मंदिरों के भीतर चल रहे इन ‘अघोषित साम्राज्यों’ का अंत सुनिश्चित है? यह सवाल अब प्रशासनिक गलियारों में गूंज रहा है।

साफ-सफाई से लेकर जांच तक, सात दिनों में दूध का दूध-पानी का पानी
कलेक्टर द्वारा गठित जांच दल को मंदिर परिसर में किसी भी गैर-शासकीय या अपंजीकृत समिति द्वारा की जा रही समांतर व्यवस्थाओं के तथ्यों और उनकी जवाबदेही का परीक्षण करने का कड़ा निर्देश दिया गया है। जांच दल को रसीद पुस्तिकाओं, बैंक खातों और अन्य अभिलेखों की गहन पड़ताल करनी होगी कि आखिर कितना नगद, सोना और चांदी आया और वह कहाँ गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस जांच में किसी भी शासकीय अधिकारी, कर्मचारी या मंदिर प्रबंधन से जुड़े व्यक्ति की मिलीभगत की भी जांच होगी। सात दिनों की मोहलत के भीतर इस जांच रिपोर्ट को कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।

हमारी कलम रुकती नहीं और न ही हम कोरी बातें करते हैं
हमारा स्पष्ट मानना है कि मंदिर किसी के निजी लाभ का अड्डा नहीं, बल्कि जन-आस्था का केंद्र हैं। अवंतिका के युवराज के मंच से हम केवल उन मुद्दों को उठाते हैं जो तथ्यों की कसौटी पर सौ फीसदी खरे उतरते हैं। हम केवल बातें करने वालों में से नहीं हैं; हम काम करने में विश्वास रखते हैं। हमारा हर शब्द प्रमाणिक है और भ्रष्ट तत्वों पर सीधी चोट करता है। अब जब प्रशासनिक तंत्र सक्रिय हुआ है, तो हमें उम्मीद है कि इस जांच के बाद न केवल मां बगलामुखी मंदिर में व्यवस्थाएं सुधरेंगी बल्कि प्रदेश के अन्य प्राचीन मंदिरों में भी फैले भ्रष्टाचार की जड़ों पर प्रहार होगा। दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा, और यह जांच रिपोर्ट आने वाले समय में उन तमाम लोगों के लिए एक सबक होगी जो धर्म की आड़ में अपनी जेबें भर रहे हैं। हम इस मामले की हर अपडेट पर नज़र बनाए रखेंगे।










