600 करोड़ का महा-घोटाला उजागर फर्जी बिल डबल एम्प्लॉय कोड और जुए-सट्टे में उड़ाया जनता की कमाई का पैसा
विशेष इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट (अवंतिका के युवराज/भोपाल)। एक तरफ तो प्रदेश की मोहन सरकार खर्च में कटौती के बड़े-बड़े ढोल पीट रही है, मंत्रियों और अफसरों की विदेश यात्राओं पर रोक लगाने और सरकारी आयोजनों में महंगे होटलों का इस्तेमाल बंद करने के कड़े निर्देश जारी कर रही है, वहीं दूसरी तरफ राज्य के जिस डिजिटल वित्तीय तंत्र के भरोसे 4.50 लाख करोड़ का बजट चलता है, उसी खजाने की तिजोरी में पीछे से 600 करोड़ रुपये का भयंकर डाका डाल दिया गया। कोष एवं लेखा संचालनालय (ट्रेजरी एंड अकाउंट डिपार्टमेंट) की स्टेट फाइनेंशियल इंटेलिजेंस सेल (SFIC) की जांच में जब इस महा-घोटाले की परतें उघड़ीं, तो वल्लभ भवन से लेकर जिला ट्रेजरी दफ्तरों तक हड़कंप मच गया। जनता की गाढ़ी कमाई और खून-पसीने के टैक्स के पैसे पर सरकारी तंत्र के भ्रष्ट कारिंदों, बाबुओं और अफसरों ने जिस बेशर्मी से डाका डाला है, उसने मोहन सरकार के जीरो टॉलरेंस और सुशासन के दावों के परखच्चे उड़ा कर रख दिए हैं।
एकीकृत वित्तीय प्रबंधन सूचना प्रणाली (IFMIS) जैसे हाई-टेक सिस्टम की नाक के नीचे पिछले पांच सालों से यह खेल चलता रहा और आका नींद में सोए रहे। जांच में सामने आया कि भ्रष्ट सिंडिकेट ने सरकारी खजाने को लूटने के दो मुख्य रास्ते बनाए थे। पहला रास्ता सीधे निजी खातों में डाका डालने का था, जिसके तहत 199 संदिग्ध ट्रांजैक्शन के जरिए सीधे 305 करोड़ रुपये अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपनी पत्नियों, रिश्तेदारों और अपने करीबियों के बैंक खातों में जमा करा लिए। दूसरा रास्ता नियमों को ताक पर रखकर ट्रेजरी के पर्सनल डिपॉजिट (PD) खातों की जगह 293 करोड़ रुपये अन्य निजी बैंक खातों में ट्रांसफर करने का रहा। इस पूरे महा-घोटाले में स्कूल शिक्षा विभाग से लेकर राजस्व, पुलिस, वन, स्वास्थ्य, पशुपालन, कृषि और पीएचई समेत 24 से अधिक सरकारी विभाग पूरी तरह से शामिल पाए गए हैं।
सिस्टम में लगाई गई सेंध की दास्तान इतनी हैरान करने वाली है कि आम नागरिक दंग रह जाए। अधिकारियों और कर्मचारियों की साठगांठ का आलम यह था कि एक ही कर्मचारी के दो-दो एम्प्लाय कोड बनाकर सालों तक डबल सैलरी बांटी जाती रही। आहरण एवं संवितरण अधिकारियों (DDO) ने अपने लॉगइन और पासवर्ड कर्मचारियों को बांट रखे थे। सिस्टम में कर्मचारियों के असली मोबाइल नंबर बदलकर भ्रष्ट कर्मचारी अपने नंबर दर्ज कर देते थे ताकि बैंक से आने वाला ओटीपी सीधे उनके पास पहुंचे और करोड़ों का डाका आसानी से पड़ सके। बैंक खातों और सर्विस रिकॉर्ड के मिलान की कोई पुख्ता व्यवस्था ही नहीं थी।
आलिराजपुर के कट्ठीवाड़ा में तत्कालीन बीईओ कमल राठौर ने ट्रेजरी से 20.47 करोड़ रुपये उड़ाकर रिश्तेदारों के खातों में डाले और गंधवानी में ‘बालाजी धाम’ नाम की पूरी कॉलोनी ही काट डाली। वहीं उज्जैन जेल का मामला तो और भी शर्मनाक निकला, जहां महज 35 हजार रुपये सैलरी पाने वाले जेल प्रहरी रिपुदमन सिंह ने अधीक्षक का पासवर्ड चुराकर अपनी सैलरी खुद ही बढ़ाकर 4.82 लाख रुपये महीना कर ली और 10 करोड़ से ज्यादा का गबन करके सारा पैसा सट्टे और जुए में उड़ा दिया। इसी तरह सोंडवा में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी रायसिंह तोमर और राघू डुडवे दो-दो एम्प्लाय कोड के जरिए सालों तक डबल सैलरी ऐंठते रहे।
जब आम नागरिक अपने काम के लिए सरकारी दफ्तरों में जाता है, तो यही अधिकारी और बाबू नियमों का पाठ पढ़ाते हैं, चक्कर कटवाते हैं और रिश्वत के बिना एक फाइल आगे नहीं बढ़ाते। लेकिन जब खुद सरकारी तिजोरी लूटने की बात आई, तो इन जिम्मेदार अफसरों ने सारे नियम-कायदे और पासवर्ड एक-दूसरे की थाली में परोस दिए। अब तक इस मामले में 400 से ज्यादा आरोपियों पर 59 एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि लुटे गए 600 करोड़ में से बाकी बचे 380 करोड़ रुपये की रिकवरी कैसे होगी। घोटाला होने के बाद अब सिस्टम में 50 से ज्यादा सुधार करने की बात कही जा रही है, लेकिन सवाल यह उठता है कि इतने सालों से निगरानी करने वाले वरिष्ठ अफसर और वित्त विभाग के जिम्मेदार आका क्या भांग पीकर सो रहे थे? यदि मोहन सरकार वास्तव में पारदर्शी सुशासन का दावा करती है, तो केवल छोटे कर्मचारियों को जेल भेजने के बजाय उन बड़े नीति-नियंताओं और विभाग प्रमुखों पर कड़ी कार्रवाई करे जिनकी नाक के नीचे जनता के 600 करोड़ रुपये सट्टे, प्रॉपर्टी और अय्याशी में उड़ा दिए गए।










