जेल महा-घोटाले में डबल मार का खौफनाक सच

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35 करोड़ साफ, फिर बजट से भरा खजाना, न फूटी कौड़ी की रिकवरी, न बड़े आकाओं पर कार्रवाई!

विशेष इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट (अवंतिका के युवराज/उज्जैन)। महाकाल की नगरी उज्जैन का चर्चित जेल गबन घोटाला कांड अब सिर्फ एक वित्तीय हेरफेर नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र, पुलिस और जांच एजेंसियों की मिलीभगत का एक ऐसा काला दस्तावेज बन चुका है, जिसने प्रदेश के सुशासन और जीरो टॉलरेंस के ढोल की पोल खोलकर रख दी है। अवंतिका के युवराज की विशेष खोजी पड़ताल में इस महा-घोटाले का वह सबसे कड़वा और सनसनीखेज सच सामने आया है, जिसे सत्ता और प्रशासन के गलियारों में दबाने की भरसक कोशिशें की जाती रहीं।

इस पूरे महा-घोटाले में सबसे बड़ा धोखा मध्य प्रदेश की जनता के साथ हुआ है, जिस पर प्रशासनिक नाकामी और भ्रष्टाचार के कारण दोहरी मार पड़ी है। घोटाले की शुरुआत में जब उज्जैन जेल के खाते और कर्मचारियों के पीएफ-पेंशन फंड से करीब 35 करोड़ रुपये की विशाल धनराशि साफ कर दी गई, तो हड़कंप मचा। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह और भी शर्मनाक था। भ्रष्ट सिंडिकेट की जेबों में गए इस 35 करोड़ रुपये की रिकवरी करने और आरोपियों की संपत्तियों को नीलाम करने के बजाय, सरकार ने लीपापोती करते हुए जनता के टैक्स के पैसे (सरकारी बजट) से दोबारा 35 करोड़ रुपये निकालकर कर्मचारियों के खातों में डाले। यानी एक तरफ तो 35 करोड़ रुपये लुटेरों की जेब में चले गए और दूसरी तरफ उसी 35 करोड़ की भरपाई फिर से सरकारी खजाने से की गई—सीधे-सीधे 70 करोड़ रुपये का चूना प्रदेश की जनता को लगा!

जांच के नाम पर खानापूर्ति और फरार मास्टरमाइंड
मामले की जांच का जिम्मा जिस अधिकारी (तत्कालीन एसपी सचिन शर्मा) के पास था, वह निष्पक्ष और कड़क जांच करने के बजाय मामले को ठंडा छोड़कर पहले दिल्ली भागे और अब धार एसपी बनकर मलाई काट रहे हैं। यदि उन्होंने बिना किसी दबाव के निष्पक्ष जांच की होती, तो कई बड़े बागड़बिल्ले और वर्दीधारी आज जेल की सलाखों के पीछे सड़ रहे होते। उल्टे, तत्कालीन जेल अधीक्षक उषाराज जैसी दबंग अधिकारी बंदियों और प्रहरियों को माननीय (मंत्री जी) के नाम की धमकी देकर अवैध वसूली का रैकेट चलाती रही। वसूली के दौरान यह तक कहा जाता था कि इस काली कमाई का हिस्सा मंत्री जी तक नहीं जाता, इसलिए चुपचाप पैसे दो। शर्मनाक बात यह है कि उषाराज के जाने के बाद भी आज जेल के अंदर से बंदियों से वसूली का यह खेल बदस्तूर जारी है।

अधिकारियों की सरपरस्ती और शून्य रिकवरी
एसआइटी प्रमुख मंशा राम पटेल की जांच और एसआइटी की रिपोर्ट में पूर्व जेल अधीक्षक अलका सोनकर (जो अब इंदौर में पदस्थ हैं) को स्पष्ट रूप से दोषी माना गया था, लेकिन प्रशासनिक गलियारों में ‘ले-देकर’ और ऊंची पहुंच के दम पर उन पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। यही हाल ट्रेजरी (कोषालय) के उन भ्रष्ट कर्मचारियों का रहा, जिनकी मिलीभगत के बिना यह डाका संभव ही नहीं था—उन्हें भी जांच में अभयदान दे दिया गया। कोर्ट में मामला चलने के बावजूद, इतनी बड़ी राशि में से ‘एक फीसदी’ भी रिकवरी नहीं हो सकी। आरोपियों की अवैध संपत्तियों की कुर्मी और नीलामी की फाइलें ठंडे बस्ते में धूल फांक रही हैं।

ईओडब्ल्यू के पाले में गेंद, वर्तमान अधीक्षक की मजबूरी
मामले की लीपापोती और भारी जनआक्रोश को देखते हुए करीब 6 महीने पहले इस पूरे गबन कांड की जांच फिर से ईओडब्ल्यू उज्जैन को सौंपी गई है। हालांकि, वर्तमान जेल अधीक्षक मनोज साहू बेहद ईमानदार, सख्त और सही नीयत वाले अधिकारी हैं, जो व्यवस्था को सुधारने का पूरा प्रयास कर रहे हैं। लेकिन पूर्व के भ्रष्ट अधिकारियों द्वारा फैलाए गए दलदल और ऊपरी प्रशासनिक दबाव के कारण वे भी खुद को बेबस और मजबूर पा रहे हैं।

जो सरकारी खजाने को लूटकर खामोश बैठे हैं,
वो जांच के नाम पर सिर्फ तमाशा देख रहे हैं।
सवाल तो अब उस निजाम की नीयत पर है,
जहां लुटेरे आजाद और कानून के हाथ बंधे दिख रहे हैं!

जब 35 करोड़ रुपये का डाका पड़ने के बाद भी रिकवरी शून्य रही, दोषी अधिकारियों को नई मलाईदार पोस्टिंग मिलती रही और जांच को ठंडे बस्ते में डाला जाता रहा, तो फिर ईओडब्ल्यू की इस नई जांच का क्या औचित्य? क्या ईओडब्ल्यू उन बड़े मगरमच्छों और तत्कालीन जांच अधिकारियों की संपत्तियों पर बुलडोजर चलाकर जनता के 35 करोड़ रुपये वापस लाएगी या यह भी सिर्फ एक और कागजी खानापूर्ति साबित होगी? विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, इस पूरे जेल गबन कांड की फाइल जल्द ही रीओपन हो सकती है—जिसके बाद कई रसूखदारों की नींद उड़ना तय माना जा रहा है। यह सवाल अब हमारे पाठकों और आम जनता के जेहन में एक बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा हो चुका है।