विशेष कृपा पात्र दबंग बालक के आगे नतमस्तक जिम्मेदार, मासूमों से प्रताड़ना और वीआईपी कल्चर का खौफनाक खेल

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शासकीय बाल गृह या यातना गृह?

उज्जैन। धर्मधानी उज्जैन के शासकीय बाल गृह (बालक) से एक ऐसा संवेदनहीन और व्यवस्था को शर्मसार कर देने वाला मामला सामने आया है, जिसने इस बाल संरक्षण संस्थान के मूल उद्देश्यों पर ही गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। कहने को तो यह संस्थान अनाथ, बेसहारा और देखरेख की आवश्यकता वाले मासूम बच्चों को सुरक्षित माहौल और नया भविष्य देने के लिए एकीकृत बाल संरक्षण योजना के तहत संचालित है, लेकिन हकीकत में यह इन बच्चों के लिए किसी यातना गृह में तब्दील हो चुका है। वर्तमान में इस शासकीय बाल गृह में कुल 13 बच्चे आवासित हैं, लेकिन इन सभी मासूमों की जिंदगी को नर्क बनाने वाला कोई और नहीं, बल्कि पिछले 2 वर्ष से वहां रह रहा संस्थान का ही एक सबसे उम्रदराज दबंग किशोर है। सबसे हैरान और विचलित कर देने वाली बात यह है कि कानूनन सुरक्षा और गोपनीयता के दायरे में आने वाले इस दबंग बालक को वहां के सर्व-सर्वा अधिकारियों और जिम्मेदार कर्मचारियों ने खुली छूट और पूरा संरक्षण दे रखा है, जिसके दम पर वह अन्य छोटे मासूम बच्चों पर अमानवीय जुल्म ढा रहा है।

इस पूरे मामले में महिला एवं बाल विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि विभाग द्वारा संस्थान में पदस्थ एक महिला अधिकारी श्रीमती शादिमा खान पर कथित रूप से विशेष प्यार लुटाया जा रहा है। मूल रूप से सुपरवाइजर के पद पर तराना में पदस्थ यह मैडम विशेष अनुरोध करवाकर वर्तमान में इस शासकीय बाल गृह में प्रोबेशन ऑफिसर का रसूखदार पद लेकर बैठी हैं। गंभीर आरोप है कि मैडम अपनी 80 परसेंट विकलांगता का भरपूर अनुचित लाभ उठा रही हैं और बच्चों के हक पर डाका डाला जा रहा है। संस्थान में मासूम बच्चों के लिए बनने वाले शासकीय पौष्टिक भोजन से लेकर दिनभर मिलने वाला नाश्ता तक इन मैडम के लिए परोसा जाता है। सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह खड़ा हो रहा है कि आखिर इन मैडम को उस दबंग किशोर से इतना गहरा लगाव क्यों है, जबकि वरिष्ठ अधिकारियों और बाल आयोग की अध्यक्ष निवेदिता शर्मा तक ने विशेष रूप से बालगृह में भ्रमण के दौरान इस दबंग बालक को तुरंत उसके घर भेजने का कड़ा आदेश दिया था। इसके बावजूद आज दिनांक तक उस आदेश पर कोई कार्रवाई नहीं की गई और आयोग की अध्यक्ष की बात की भी सरेआम अवहेलना करते हुए इस किशोर को विशेष वीआईपी सुविधाएं दी जा रही हैं। 13 बच्चों में सबसे बड़ा यही लड़का है जिसकी उम्र करीब 17 वर्ष से अधिक है और बालिग होने में महज 4 महीने का समय शेष है, लेकिन उसे बचाने के लिए पूरा बाल गृह अमला एड़ी-चोटी का जोर लगाए बैठा है।

बाल गृह के भीतर का माहौल किसी खौफनाक कैदखाने जैसा बना दिया गया है, जहां इस दबंग किशोर का खौफ पूरे परिसर में गूंजता है। वह वहां रह रहे अन्य छोटे बच्चों से जबरन अपने पैर दबवाता है और रात के अंधेरे में उनके साथ बेरहमी से मारपीट करता है। कुछ महीने पहले तो क्रूरता की सारी हदें पार हो गईं, जब जेल में सजा काट रही एक बेबस मां के नाबालिग बच्चे को इस दबंग लड़के ने इतना बेरहमी से पीटा कि उस मासूम की पीठ नीली पड़ गई। इस गंभीर प्रताड़ना की बाकायदा लिखित शिकायत खुद भैरवगढ़ जेल में बंद उस बेबस मां ने जेल अधीक्षक से की थी, जिसके बाद जेल प्रबंधन द्वारा बालगृह अधीक्षक को इस संबंध में आधिकारिक सूचना भी भेजी गई थी। मगर व्यवस्था की मिलीभगत देखिए कि इस गंभीर शिकायत के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई करने के बजाय उल्टा उस दबंग लड़के को ही बचाया गया और उस मां के आंसुओं को अनसुना कर दिया गया।

यहाँ तक कि संस्थान के भीतर सिर्फ शारीरिक प्रताड़ना ही नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ हो रहा है। कई बच्चे ऐसे हैं जो पिछले 3 साल से इस संस्था में रह रहे हैं, लेकिन वहां बच्चों को पढ़ाने के लिए आने वाली शिक्षिका की कार्यप्रणाली का स्तर यह है कि उन बच्चों को आज तक ‘अनार का अ’ लिखना भी नहीं आया है और वे अपना नाम तक लिखना नहीं सीख पाए हैं। मैडम नियत समय पर आती हैं, आराम से मोबाइल चलाती हैं और बच्चों को स्वयं के भरोसे छोड़ देती हैं कि तुम खुद ही पढ़ाई करो। पिछले 15 साल से इन मैडम का तबादला क्यों नहीं हो रहा, यह अपने आप में एक बड़ा प्रशासनिक प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। इसके साथ ही, योगेश धौलपुरे (जिसे बच्चे वहां बापू कहते हैं) नाम का सफाई कर्मी इन मासूम बच्चों से नियम विरुद्ध तरीके से पूरे परिसर की सफाई और टॉयलेट साफ करवाने जैसा भारी काम लेता है। यदि कोई मासूम बच्चा इस अमानवीय श्रम का विरोध करता है, तो उसे बेरहमी से पीटा जाता है और बाद में उसे पूरी तरह उस दबंग लड़के के सुपुर्द कर दिया जाता है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच प्रशासनिक मेहरबानी का एक और अनोखा कारनामा सामने आया है। पिछले महीने बाल गृह में जो भी अमानवीय हरकतें और विवाद हुए, उन पर कोई दंडात्मक कार्रवाई करने के बजाय विभाग ने मेहताब सिंह परस्ते को बालगृह का नया अधीक्षक बना दिया है। नए अधीक्षक महोदय पर विभाग इस कदर मेहरबान है कि उनके खिलाफ कोई एक्शन होना तो दूर, उन्हें ऊपर से और अधिक शाही सुविधाएं दे दी गई हैं। अब परस्ते उसी बालगृह परिसर में अपने पूरे परिवार के साथ रहने की योजना बना रहे हैं और वहां शिफ्ट होने की पूरी तैयारी कर ली गई है। यानी विभाग का ही घर और विभाग का ही मुफ्त खाना- सब कुछ इन्हीं जिम्मेदार अधिकारियों के ऐशो-आराम के लिए समर्पित नजर आ रहा है। जब हमारे समाचार पत्र द्वारा विशेष सूत्रों को इस शासकीय बाल गृह की जमीनी हकीकत जानने के लिए भेजा गया, तो संपूर्ण बाल गृह की यह खौफनाक कार्यप्रस्तानी और राज उजागर हुए, जिनका जनहित में सामने आना बेहद जरूरी था। इस संवेदनशील मामले में अब उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच और दोषियों को तत्काल निलंबित करने की मांग उठ रही है।

शासकीय बाल गृह में बच्चों के सर्वोत्तम हित और उनके मानसिक विकास के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग के साथ मुंबई की एक बेहद प्रतिष्ठित और पूर्णतः कानूनी (NGO) संस्था भी जुड़ी हुई है। इस संस्था द्वारा विशेष रूप से बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए वहां एक मैडम (शिक्षिका) को भी तैनात किया गया है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि मुंबई की इतनी बड़ी लीगल संस्था से जुड़ी होने के बावजूद, इन मैडम द्वारा बच्चों को क्या और कैसा पढ़ाया जा रहा है, यह तो अब सिर्फ भगवान ही जाने! तीन-तीन साल से संस्थान में रह रहे मासूम बच्चों को आज तक ‘अ’ से अनार और खुद का नाम तक लिखना नहीं आ पाया है। सेवा और शिक्षा का दम भरने वाली इस संस्था की मैडम के आने के बाद भी बच्चों का बौद्धिक स्तर शून्य बना हुआ है, जिससे यह बड़ा सवाल उठता है कि क्या ये संस्थाएं सिर्फ कागजों पर औपचारिकताएं पूरी करने और फंड खपाने के लिए ही काम कर रही हैं?

इस पूरे मामले में विभाग की कार्यप्रणाली और दोहरे मापदंडों पर सबसे बड़ा सवालिया निशान तब खड़ा होता है, जब हम पास ही स्थित शासकीय बालिका गृह की व्यवस्थाओं को देखते हैं। वहां रहने वाली सभी बच्चियां नियमित रूप से शिक्षा ग्रहण करने के लिए लालपुर स्थित स्कूल में जाती हैं। ऐसे में प्रशासन से यह सीधा और चुभता हुआ सवाल है कि क्या बाल गृह के इन बालकों को लालपुर या किसी अन्य बाहरी स्कूल में पढ़ने के लिए नहीं भेजा जा सकता? जब बच्चियां बाहर जाकर तालीम हासिल कर सकती हैं, तो क्या इन मासूम बालकों की नियति सिर्फ बाल गृह की इन चार दीवारियों के बीच ही कैद रहकर दिखावे की शिक्षा ग्रहण करना रह गई है? बच्चों के भविष्य के साथ हो रहे इस सौतेले व्यवहार पर अब उच्च स्तरीय जांच की सुई घूम चुकी है।