चार दिन पहले लगी आग की राख ठंडी भी नहीं हुई और फिर सुलगाया गया नया ढेर
क्या किसी बड़े हादसे या अपराध का इंतज़ार कर रहे हैं ज़िम्मेदार?

विशेष खोजी रिपोर्ट (अवंतिका के युवराज/गांधीधाम-कच्छ)। गांधीधाम शहर में दीनदयाल पोर्ट अथॉरिटी (DPT) और GIDC क्षेत्र की बेशकीमती जमीनों पर कचरे के अवैध डंपिंग और उसे आग के हवाले करने का एक बेहद गंभीर और खतरनाक सिलसिला सामने आ रहा है। अभी चार दिन पहले ही हाउसिंग बोर्ड इलाके के सामने स्थित विशाल भूखंड पर भीषण अग्निकांड हुआ था, जहाँ दमकल की कई गाड़ियों ने घंटों पानी की बौछारें करके जैसे-तैसे आग पर काबू पाया था। परंतु ज़मीनी पड़ताल में जो सच सामने आया है, वह चौंकाने वाला है। उस भयावह घटना के अगले ही दिन उसी स्थान पर दोबारा नया औद्योगिक कचरा लाकर पटका गया और उसमें फिर से आग सुलगा दी गई। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यह आग कोई अचानक लगी दुर्घटना नहीं, बल्कि सुनियोजित तरीके से कचरा ठिकाने लगाने के लिए बार-बार लगाया जाने वाला मानव निर्मित तांडव है।

स्थानीय सूत्रों और आसपास की बस्तियों के रहवासियों का आरोप है कि कुछ औद्योगिक इकाइयों व निजी कंपनियों द्वारा अपने कारखानों का बटन वेस्ट, केमिकल युक्त मलबा और प्लास्टिक कचरा यहाँ लाकर अवैध रूप से डंप किया जाता है। नगर निगम के राजस्व और संसाधनों की बलि चढ़ाकर इस कचरे को चुपचाप आग के हवाले कर दिया जाता है। जब आग बेकाबू होकर आसपास के क्षेत्रों के लिए खतरा बनती है, तब नगर निगम की फायर ब्रिगेड को बुलाकर उसे बुझाने की औपचारिकता पूरी कर ली जाती है। दमकल विभाग का अमला पानी बहाकर चला जाता है, और उसके बाद यह पूरा चक्र फिर से शुरू हो जाता है।

सुरक्षा मानकों की उड़ रही धज्जियाँ, ज़हरीले धुएं से घुट रहा गरीब बस्तियों का दम
जिस जगह पर यह अवैध कचरा डंप किया जा रहा है, उसके ठीक आसपास घनी गरीब बस्तियाँ और केमिकल प्रोसेसिंग इकाइयाँ स्थित हैं। यदि कचरे की यह उग्र लपटें या कोई भटकती हुई चिंगारी पास की किसी केमिकल कंपनी तक पहुँच गई, तो पूरे इलाके को श्मशान घाट बनते देर नहीं लगेगी। इस ज़हरीले धुएं और उठती सड़न की वजह से आसपास रहने वाले छोटे बच्चों, बुजुर्गों और आम नागरिकों का जीना दूभर हो चुका है। साँस की बीमारियों और वायु प्रदूषण का खतरा सिर पर मंडरा रहा है।

इससे भी बड़ा सुरक्षा पहलू यह है कि बिना किसी बाउंड्री वॉल, बिना किसी सुरक्षा गार्ड और बिना सीसीटीवी सर्विलांस के पड़े इस विशाल लावारिस भूखंड का उपयोग कोई भी आपराधिक तत्व गलत गतिविधियों के लिए कर सकता है। इतने बड़े कचरे के मलबे और लगातार सुलगती आग के बीच यदि कोई गंभीर अपराध घटित हो जाए, तो प्रशासन को कानों-कान खबर तक नहीं होगी।
अधिकारियों की चुप्पी और पल्ला झाड़ने का रवैया
जब इस पूरे घटनाक्रम और ज़मीन के अवैध इस्तेमाल को लेकर संबंधित महकमे के ज़िम्मेदार अधिकारियों से संपर्क साधने का प्रयास किया गया, तो वे अपनी नैतिक और कानूनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ते नज़र आए। निचले मातहतों या पीआरओ के मत्थे बात मढ़कर अधिकारी मामले को टालते दिखाई दे रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या DPT और संबंधित प्रशासनिक तंत्र ने अपनी इन ज़मीनों की लीज़, उपयोग और सुरक्षा के लिए कोई स्पष्ट अनुबंध या बाउंड्री वॉल के कड़े नियम लागू नहीं किए हैं? अगर कोई सुरक्षा नीति है, तो उसका धरातल पर पालन क्यों नहीं कराया जा रहा?
अवंतिका के युवराज यह सीधा और तीखा सवाल उठाता है कि आखिर कब तक शासकीय ज़मीनों का इस तरह अवैध डंपिंग यार्ड के रूप में दुरुपयोग होता रहेगा? क्या नगर निगम और बंदरगाह प्रशासन किसी बड़े हादसे, व्यापक जनहानि या जानलेवा महामारी के फैलने के बाद ही हरकत में आएगा? प्रशासन को इस पूरे डंपिंग रैकेट की निष्पक्ष जाँच कराकर दोषी इकाइयों, अवैध कब्ज़ेदारों और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी, ताकि गांधीधाम के नागरिकों की जान-माल और स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।










