ब्लैकमेलिंग के जाल में फंसा इकलौता चिराग बुझा

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26 वर्षीय गौतम की संदिग्ध मौत से उठे कई सवाल, रहस्यमयी खत पर पुलिस की खामोशी क्यों?

विशेष खोजी रिपोर्ट (अवंतिका के युवराज/उज्जैन)। मुख्यमंत्री के अपने गृह जिले उज्जैन के पिपलीनाका क्षेत्र स्थित हरिनगर से एक दुखद और हैरान करने वाली खबर सामने आई है। दो बहनों के इकलौते भाई, 26 वर्षीय युवा गौतम शर्मा ने 30 अगस्त 2026 को मानसिक प्रताड़ना, ब्लैकमेलिंग और भारी दबाव से तंग आकर अपनी जान दे दी। जिस वक्त यह घटना घटी, गौतम घर पर अकेला था और उसका परिवार गुजरात गया हुआ था। हंसता-खेलता, घर का इकलौता सहारा युवा आखिर किस कदर डर और मानसिक दबाव में जी रहा था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसे अपनी जान देकर इस परेशानी से रास्ता तलाशना पड़ा।

रहस्यमयी खत और दबी जुबान में उठते सवाल
घटना के बाद से ही क्षेत्र के रहवासियों और आसपास की गलियों में दबी जुबान से यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि मौके से पुलिस को एक संदिग्ध ‘अंतिम खत’ (सुसाइड नोट) भी हाथ लगा है, जिसमें कुछ लोगों और एक युवती द्वारा की जा रही प्रताड़ना व ब्लैकमेलिंग की बात लिखी हुई है। हालांकि ऐसे में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इस खत की बात अगर केवल चर्चा तक सीमित है, तो पुलिस की अब तक की जांच सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही? क्या वाकई मामले में केवल सुनी-सुनाई बातें हैं या फिर पुलिस किसी वजह से इस खत की बात सामने नहीं आने दे रही?

परिजनों के आंसुओं के बीच उठते सवाल: डिजिटल सबूतों से कब हटेगा पर्दा?
गौतम के परिजनों का सीधा आरोप है कि वह पिछले काफी समय से कुछ लोगों की मानसिक प्रताड़ना और ब्लैकमेलिंग का सामना कर रहा था। परिजनों ने मांग की है कि गौतम के मोबाइल फोन, कॉल रिकॉर्डिंग्स, व्हाट्सएप चैट्स और सोशल मीडिया गतिविधियों की निष्पक्ष जांच की जाए। परिजनों का कहना है कि पुलिस केवल औपचारिक कार्रवाई करके फाइल बंद न करे, बल्कि आत्महत्या के लिए उकसाने वाले असल आरोपियों तक पहुंचे।

यह बेहद चिंताजनक है कि प्रदेश के सबसे प्रमुख गृह क्षेत्र में एक सामान्य परिवार का नौजवान ब्लैकमेलिंग का शिकार होकर अपनी जान दे देता है और पुलिस महकमा केवल शुरुआती जांच की बात कहता रहता है। परिजनों की न्याय की मांग को सिर्फ कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं रखा जा सकता।

अवंतिका के युवराज यह स्पष्ट करता है कि अगर आम लोगों के बीच चर्चा में आए उस खत, मोबाइल चैट्स और ब्लैकमेलिंग के इस पूरे मामले का सच सामने नहीं लाया गया, तो यह सवाल बना रहेगा कि एक साधारण परिवार के युवक को न्याय मिलने में देरी क्यों हुई? पुलिस प्रशासन को तुरंत लीपापोती छोड़कर डिजिटल सबूतों के आधार पर सच्चाई सामने लानी होगी, ताकि पीड़ित परिवार को न्याय मिल सके।