क्या यह स्वास्थ्य सेवा है या संवेदनहीनता का अघोषित क्रूर तंत्र…?
गोंडा। आज जब मैंने अपना सोशल मीडिया अकाउंट खोला, तो एक वीडियो ने मुझे भीतर तक झकझोर कर रख दिया। उस वीडियो में जो दृश्य थे, उसे देखकर न तो मेरे हाथ रुक सके और न ही मेरी कलम। यह घटना गोंडा स्वास्थ्य विभाग की उस शर्मनाक हकीकत को बयां करती है, जिसे देखकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति स्तब्ध रह जाए। जिस पद पर बैठकर किसी को जीवन बचाने की शपथ निभानी चाहिए, वहां एक ऐसा अधिकारी बैठा है जिसे न तो पद की गरिमा का ज्ञान है और न ही संवेदनशीलता की कोई परिभाषा।
कुर्सी का अहंकार और जिम्मेदारी का अभाव
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। विडंबना देखिए कि स्वास्थ्य सेवाओं की कमान ऐसे लोगों के हाथों में है, जिन्हें अक्सर अपने पद का फुल फॉर्म तक ठीक से नहीं पता होता। यह केवल एक व्यक्ति की बात नहीं है, बल्कि यह उन विशेष कृपा प्राप्त लोगों की फौज है जो बिना किसी योग्यता के, केवल रसूख के दम पर कुर्सियां हथियाकर बैठे हैं। जब एक अधिकारी को अपने विभाग के मूल कार्यों की ही जानकारी न हो, तो वह जनता का इलाज क्या खाक करेगा?
असली काम नीचे का अमला, और बलि का बकरा भी वही!
प्रशासनिक व्यवस्था का एक काला सच यह है कि फाइलें और फील्ड का काम तो विभाग के निचले स्तर के कर्मचारी और अधिकारी ही करते हैं। लेकिन विफलता का ठीकरा और सजा का कोड़ा हमेशा उन्हीं के सिर पर गिरता है। यदि कोई चूक होती है, तो ट्रांसफर, निलंबन और कार्यवाही की गाज हमेशा उस छोटे कर्मचारी पर गिरती है, जो अपनी पूरी निष्ठा से काम कर रहा होता है। ऊपर बैठे ये विशेष कृपा वाले अधिकारी अपनी कुर्सी पर सुरक्षित बने रहते हैं और सारी जवाबदेही नीचे के उन लोगों पर डाल देते हैं, जो वास्तव में व्यवस्था को चला रहे हैं। क्या यह पदानुक्रम केवल दूसरों को बलि का बकरा बनाने के लिए बनाया गया है?
व्यवस्था पर गहरा प्रहार
एक मासूम की मृत्यु पर जिस तरह की क्रूरतापूर्ण हंसी और बेतुका बयान सामने आया है, उसने यह सिद्ध कर दिया है कि सत्ता का नशा मानवीय संवेदनाओं को खत्म कर देता है। जिसे ‘जनसेवा’ के लिए नियुक्त किया गया था, वह आज जनता के दुखों का मजाक बना रहा है। ये अधिकारी न केवल जनता का अपमान कर रहे हैं, बल्कि उस पूरे विभाग का नाम भी कलंकित कर रहे हैं।
पत्रकार की कलम और हमारा संकल्प
कुछ लोगों को लग सकता है कि हम केवल निशाना साध रहे हैं, लेकिन मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि यह निशाना उन लोगों पर है जिन्होंने पद की गरिमा को मिट्टी में मिला दिया है। पत्रकारिता देश का चौथा स्तंभ है और जब-जब व्यवस्था में बैठे ‘अज्ञानी’ और असंवेदनशील लोग अपनी हदें पार करेंगे, तब-तब मेरी कलम बिना डरे, बिना झुके सच लिखती रहेगी। कुछ कथिक लोगों की वजह से पत्रकारिता बदनाम हो सकती है, पर जो कलम सच के लिए लड़ती है, वह किसी से नहीं डरती। हमें अपनी जान और अपने करियर की परवाह नहीं, हमें बस उस सच की चिंता है जिसे ये अधिकारी फाइलों के नीचे दबाना चाहते हैं।










