औद्योगिक नगरी गांधीधाम में खाकी का चालान अभियान
अवैध शराब माफिया बेलगाम, लेकिन गरीब मजदूरों की जेब पर पुलिस का सीधा डाका!
विशेष खोजी व प्रशासनिक रिपोर्ट (अवंतिका के युवराज/गांधीधाम-कच्छ)। देश और प्रदेश की प्रमुख औद्योगिक एवं व्यावसायिक नगरी के रूप में पहचाने जाने वाले गांधीधाम शहर में इन दिनों पुलिस प्रशासन की अजीबोगरीब और जनविरोधी कार्यप्रणाली चर्चा का विषय बनी हुई है। शहर की बदहाल यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने के नाम पर हर छोटे-बड़े चौराहे पर पुलिसकर्मी हाथों में चालान के रसीद कट्टे थामे मुस्तैद दिखाई दे रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या पुलिस की यह चौकसी ट्रैफिक को सुचारू बनाने के लिए है या केवल आम जनता और गरीब मजदूरों की जेब खाली करने का एक माध्यम बन चुकी है?
गांधीधाम एक ऐसा औद्योगिक शहर है जहाँ देश के कोने-कोने से गरीब मजदूर, कर्मचारी और दो वक्त की रोटी कमाने वाले लोग अपने परिवार का पालन-पोषण करने के उद्देश्य से आते हैं। सुबह से शाम तक पसीना बहाकर अपने बच्चों का पेट पालने वाले इन बेबस मजदूरों पर जब पुलिस प्रशासन का चाबुक चलता है, तो एक-एक गाड़ी पकड़कर 6,000 रुपये से भी अधिक का भारी-भरकम जुर्माना थमा दिया जाता है। अपने घर में रोशनी और खुशी के दीप जलाने के लिए मेहनत करने वाले इन असहाय लोगों के घरों के दीप बुझाने का काम यह पुलिसिया रवैया कर रहा है। जनता में यह सवाल तेज़ी से कौंध रहा है कि क्या सरकारी राजस्व का घाटा पूरा करने की पूरी जिम्मेदारी केवल इन्हीं गरीब और निहत्थे नागरिकों के कंधों पर डाल दी गई है?
ट्रैफिक सिग्नल की जगह खड़े मिलते हैं सिपाही कहाँ जाता है चालान से वसूला गया राजस्व?
शहर के जिन व्यस्त और संवेदनशील चौराहों पर आधुनिक ट्रैफिक सिग्नल और वैज्ञानिक यातायात प्रबंधन प्रणाली की सख्त दरकार है, वहाँ सिग्नल व्यवस्था नाममात्र की है। कई चौराहों पर तो ऐसा दृश्य प्रतीत होता है मानो यातायात संभालने के लिए बिना उचित प्रशिक्षण के ही कर्मियों को सड़क पर खड़ा कर दिया गया हो। चालान काटने में जो फुर्ती और मुस्तैदी दिखाई जाती है, वैसी फुर्ती जाम छुड़ाने या स्थायी सिग्नल लाइट लगाने में क्यों नज़र नहीं आती? आम नागरिक और सजग वर्ग प्रशासन से यह सीधा हिसाब मांगते हैं कि चालान के जरिए प्रतिदिन जो भारी-भरकम राजस्व वसूला जा रहा है, उस बजट का कितना हिस्सा गांधीधाम के सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षित यातायात सुधार पर खर्च किया गया?
शराब माफियाओं के हौसले बुलंद पर आम आदमी के लिए नियमों का चाबुक!
सबसे शर्मनाक और चिंताजनक पहलू यह है कि एक तरफ जहाँ शहर के विभिन्न इलाकों में अवैध शराब की बिक्री और माफियाओं के हौसले बुलंद देखने को मिलते हैं, वहीं दूसरी तरफ पुलिस प्रशासन की पूरी ऊर्जा केवल सड़कों पर आम नागरिकों के चालान काटने में खर्च हो रही है। अवैध गतिविधियों पर प्रभावी नकेल कसने में सुस्ती और आम वाहन चालकों पर तुरंत दंडात्मक चाबुक चलाना, प्रशासन की दोहरी नीति को उजागर करता है। क्या कानून और नियमों की सख्ती केवल बेबस नागरिकों के लिए है और रसूखदारों या अवैध धंधेबाजों के लिए ढील?
नागरिकों को रसीद कट्टा नहीं सुरक्षित और व्यवस्थित सड़कें चाहिए!
अवंतिका के युवराज गांधीधाम के जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों और गृह विभाग से यह कड़ा सवाल पूछता है कि कब तक गांधीधाम की सड़कों पर सुरक्षा के नाम पर यह दंडात्मक खेल चलता रहेगा? यदि पुलिस प्रशासन वास्तव में जनसेवा और सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध है, तो उसे केवल चालान से राजस्व बटोरने के बजाय चौराहों पर आधुनिक सिग्नल लगाने, पारदर्शी ट्रैफिक नीति बनाने और अवैध गतिविधियों को जड़ से उखाड़ फेंकने की दिशा में ठोस व पारदर्शी कदम उठाने होंगे। गांधीधाम की जनता को केवल रसीद कट्टे की पर्चियां नहीं, बल्कि सुगम सुरक्षित और सम्मानजनक यातायात व्यवस्था चाहिए!










