नवरात्रि के पवित्र दिनों में एक बेटी को अपने बीमार पिता के न्याय के लिए सड़कों पर उतरने को होना पड़ा मजबूर
विशेष खोजी रिपोर्ट (अवंतिका के युवराज/उज्जैन)। एक तरफ देश भर में नवरात्रि के पवित्र पर्व पर शक्ति स्वरूपा देवियों की आराधना की जा रही है और नारी सम्मान के बड़े-बड़े दावे गाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के गृह जिले उज्जैन में एक बेबस बेटी अपने बीमार और सर्जरी से जूझ रहे पिता को न्याय दिलाने के लिए सड़कों की ठोकरें खाने को मजबूर है। उज्जैन की पावन भूमि पर पुलिस प्रशासन और भू-माफियाओं के उस काले गठजोड़ की पोल पूरी तरह खुल चुकी है, जहां चंद सिक्कों और रिश्वत की हवस में खाकी ने कानून के रखवाले होने का फर्ज ताक पर रख दिया है और एक निर्दोष, गंभीर रूप से बीमार नागरिक के खिलाफ फर्जी एफआईआर दर्ज कर डाली है।
पूरा मामला उज्जैन के फाजलपुरा क्षेत्र स्थित लालाराम लाजपत राय मार्ग के मकान नंबर 31 से जुड़ा हुआ है, जिस संपत्ति को लेकर वैध सिविल वाद न्यायालय में विचाराधीन है। कानून की प्रक्रिया का सम्मान करते हुए मामला जब माननीय प्रथम व्यवहार न्यायाधीश, कनिष्ठ खंड, उज्जैन के न्यायालय (सिविल वाद क्रमांक 437-ए/2022) में विचाराधीन है, तब कानून को ठेंगा दिखाकर दूसरे पक्ष के असलम पिता अब्दुल हमीद द्वारा रची गई साजिश के तहत चिनमगंज मंडी थाने में एक झूठा और मनगढ़ंत प्रकरण दर्ज करवा दिया गया। हैरानी की बात यह है कि जिस समय यानी 11 अक्टूबर 2026 को सुबह 10 बजे के आसपास मारपीट की झूठी घटना का नाटक रचा गया, उस वक्त मकान मालिक नारायण बाथम पिता गोविंद बाथम अपने घर पर आराम कर रहे थे।
हकीकत यह है कि नारायण बाथम की हाल ही में देश के प्रतिष्ठित अस्पताल (मेदांता हॉस्पिटल) से गंभीर बाईपास सर्जरी हो चुकी है और वे चिकित्सकीय सलाह के तहत सख्त बेड रेस्ट पर हैं। उनके पास अस्पताल के वे पुख्ता मेडिकल दस्तावेज और पर्चे मौजूद हैं जो चीख-चीख कर उनकी शारीरिक लाचारी की गवाही दे रहे हैं। जब पुलिस प्रशासन के नुमाइंदे एक गंभीर हृदय रोगी को गिरफ्तार करने उसके घर जा पहुंचे, तो सामाजिक बंधुओं और परिवारजनों ने उनके ऑपरेशन के दस्तावेज और बेड रेस्ट की हकीकत दिखाई। इसके बावजूद पुलिस ने अपनी आंखें मूंद लीं और असलम तथा उसके साथियों के इशारों पर इस फर्जी मुकदमे को आगे बढ़ाने का कुचक्र जारी रखा।
इस अमानवीय और भ्रष्ट रवैये के खिलाफ जब पीड़ित परिवार ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर न्याय की गुहार लगाई और एक ज्ञापन सौंपा, तब जाकर प्रशासनिक हलकों में थोड़ी सुगबुगाहट हुई। पीड़ित परिवार ने अपनी मांग में स्पष्ट रूप से कहा है कि घटना के दिन यानी 11 अक्टूबर 2026 की सुबह नारायण बाथम के निवास स्थान, शिकायतकर्ता असलम के घर और आसपास के तमाम इलाकों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को तुरंत जांच का मुख्य हिस्सा बनाया जाए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने मीडिया के सामने जांच का आश्वासन तो दे दिया है, लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर प्राथमिक जांच किए बिना और तथ्यों को परखे बिना एक सर्जरी पीड़ित व्यक्ति पर आनन-फानन में एफआईआर किसने और किसके दबाव में दर्ज की?
अवंतिका के युवराज उज्जैन पुलिस प्रशासन और इस समूचे भ्रष्ट तंत्र से यह सीधा और सबसे चुभता सवाल पूछता है कि क्या पुलिस विभाग में बैठे कुछ गिने-चुने रिश्वतखोर कर्मचारियों ने कानून की किताबें केवल अपनी जेबें गर्म करने के लिए खोली हैं? जनता के खून-पसीने के टैक्स से सैलरी पाने वाले ये वे लोग हैं जो कथित तौर पर थाने की कुर्सी खरीदने के लिए ऊपर से नीचे तक घूस देते हैं और फिर उस अवैध निवेश का ब्याज वसूलने के लिए आम नागरिकों और गरीबों पर झूठे मुकदमे लादकर अपनी तिजोरियां भरते हैं। इन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी बेटी के सिर से उसके बीमार पिता का साया छिन रहा है या कोई बुजुर्ग अस्पताल के बिस्तर से उठकर पुलिस थानों की चौखट पर माथा टेकने को विवश हो रहा है।
मुख्यमंत्री के अपने गृह जिले में यदि इस तरह कानून की धज्जियां उड़ाई जाएंगी और एक बेटी को अपने पिता की हिफाजत के लिए सड़क पर उतरकर न्याय की भीख मांगनी पड़ेगी, तो आम जनता का इस समूची व्यवस्था और पुलिस प्रशासन से विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा। क्या उन भ्रष्ट पुलिसकर्मियों के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई होगी जिन्होंने बिना सत्यता जाने रिश्वत के इशारे पर यह फर्जी खेल खेला? क्या उस बेटी के आंसूओं का हिसाब ये खाकीधारी दे पाएंगे?










