1134 करोड़ की सरकारी खरीद का महा-घोटाला

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2 लाख की कचरा गाड़ी 6 लाख में और 5 रुपये का फिनाइल 33,500 में

जीतू पटवारी के तीखे हमलों से कांपी सरकार, भ्रष्टाचार के इस नंगे नाच पर फूटा जनता का गुस्सा!

विशेष खोजी व राजनीतिक रिपोर्ट (अवंतिका के युवराज/भोपाल-मध्य प्रदेश)। मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों में जनता के खून-पसीने की कमाई से भरे सरकारी खजाने पर किस तरह सुनियोजित डाका डाला जा रहा है, इसका एक और काला और शर्मनाक अध्याय उजागर हुआ है। प्रदेश के 374 नगरीय निकायों द्वारा पिछले तीन वर्षों में की गई करीब 1,134 करोड़ रुपये की सरकारी खरीद में सामने आए असामान्य और चौंकाने वाले मूल्य-अंतर ने प्रशासनिक तंत्र की पोल खोलकर रख दी है。 जब एक आम मजदूर दिन-रात पसीना बहाकर अपने परिवार का पेट पालता है और व्यापारी व कर्मचारी ईमानदारी से टैक्स चुकाकर सरकार का खजाना भरता है, तब भ्रष्ट अधिकारियों और सत्ता के संरक्षण में पलने वाले ठेकेदारों की मिलीभगत से उस पैसे को दोनों हाथों से लुटाया जाता है। यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता का नहीं, बल्कि प्रदेश की करोड़ों जनता के साथ किए गए एक बड़े विश्वासघात का है।

सरकारी खरीद के आंकड़ों में जो खेल सामने आया है, उसने हर होशमंद नागरिक को सन्न कर दिया है। जिस देश और प्रदेश में पारदर्शी व्यवस्था के दावे किए जाते हैं, वहाँ दो लाख रुपये में मिलने वाला कचरा वाहन कागजों और खरीद के खेल में छह लाख रुपये तक पहुंच जाता है। एक तरफ जहां एक निकाय सामान्य दर पर वाहन खरीदता है, वहीं दूसरी तरफ दूसरा निकाय उसी तरह के वाहन के नाम पर जनता के पैसों का खुलेआम दुरुपयोग करता है। सिर्फ कचरा गाड़ियाँ ही नहीं, बल्कि साफ-सफाई में इस्तेमाल होने वाले फिनाइल (कीटाणुनाशक) की खरीद में तो हद ही पार हो गई। जहाँ एक ओर फिनाइल लगभग पांच रुपये प्रति लीटर की दर से मिलने का उदाहरण सामने आता है, वहीं दूसरी ओर खरीद रिकॉर्ड में इसी तरह के उत्पाद के लिए 33,500 रुपये की भारी-भरकम कीमत दर्ज मिलती है। इसके अलावा, महज 306 रुपये में मिलने वाली 60 वॉट की एलईडी लाइट भोपाल जैसे बड़े शहर में खरीद के नाम पर 11,800 रुपये में खरीदी जाती है। आखिर यह कौन सा गणित है जिसमें पांच रुपये की चीज हजारों में और दो लाख का सामान छह लाख में बदल जाता है?

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी का सरकार पर प्रहार यह भ्रष्टाचार नहीं, जनता के सीने पर खंजर है!

इस महा-घोटाले के सामने आने के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए बेहद आक्रामक और तीखे तेवर दिखाए हैं। जीतू पटवारी ने सरकार को घेरते हुए कड़े शब्दों में आरोप लगाया कि भाजपा शासनकाल में भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार बन चुका है और नगरीय निकायों को लूट का मुख्य अड्डा बना दिया गया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के 374 निकायों में 1,134 करोड़ रुपये की जो खरीद हुई है, वह भाजपाई हुक्मरानों और भ्रष्ट अधिकारियों की सांठगांठ का सबसे बड़ा सबूत है।

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार से सवाल पूछते हुए कहा कि जब प्रारंभिक विश्लेषण में ही लगभग 250 करोड़ रुपये की भारी-भरकम बचत होने का अनुमान लगाया जा रहा है, तो इसका साफ मतलब यह है कि जनता के गाढ़े पसीने के 250 करोड़ रुपये सीधे तौर पर बिचौलियों और भ्रष्ट तंत्र की तिजोरियों में पहुंचाए गए हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जिन अधिकारियों और मंत्रियों की देखरेख में यह सब खेल चल रहा है, वे गरीबों के हक पर डाका डालकर अपनी जेबें भर रहे हैं। जीतू पटवारी ने चेतावनी दी है कि केवल कुछ छोटे कर्मचारियों पर खानापूर्ति की कार्रवाई करने या आंकड़ेबाजी दिखाने से इस बड़े पाप को छुपाया नहीं जा सकता कांग्रेस पार्टी इस संगठित भ्रष्टाचार के असली सरगनाओं को बेनकाब करके ही दम लेगी।

कार्रवाइयों के नाम पर लीपापोती या न्याय..? 392 अधिकारियों पर शिकंजा और लोकायुक्त जांच के घेरे में सरकार

विभागीय आंकड़ों और रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले के तूल पकड़ने के बाद मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे के हवाले से 392 अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई शुरू करने, 135 मुख्य नगरपालिका अधिकारियों पर शिकंजा कसने, सात अधिकारियों को सेवा से हटाने और 80 से अधिक सप्लायरों को ब्लैकलिस्ट किए जाने की खबरें सामने आई हैं। इसके साथ ही इस पूरे प्रकरण की लोकायुक्त जांच शुरू होने की भी जानकारी दी जा रही है।

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल निचले स्तर के अधिकारियों पर गाज गिराने या खानापूर्ति करने से उस जनता का पैसा वापस मिल जाएगा जिसे इन घोटालों में चूसा गया है? क्या जिन राजनीतिक आकाओं के संरक्षण में यह पूरा खेल फल-फूल रहा है, उन तक जांच की आंच पहुंचेगी?

जनता के टैक्स का हिसाब देना ही होगा!
अवंतिका के युवराज इस व्यवस्था और भ्रष्ट तंत्र को दो टूक चेतावनी देता है कि मध्य प्रदेश की जनता अब इन लीपापोती वाले बयानों और खोखले आश्वासनों के झांसे में आने वाली नहीं है। सरकारी खजाने में जमा एक-एक रुपया देश के गरीब, किसान, मजदूर और ईमानदार करदाता का है, न कि किसी राजनीतिक दल या भ्रष्ट बाबू की बपौती। यदि समय रहते इस 1,134 करोड़ रुपये की खरीद के हर एक बिल, टेंडर और दस्तावेज को सार्वजनिक करके दूध का दूध और पानी का पानी नहीं किया गया, तो जनता का यह सुलगता हुआ गुस्सा सड़क पर उतरेगा और इस अहंकारी सत्ता को उखाड़ फेंकेगा। अवंतिका के युवराज की यह धारदार कलम तब तक शांत नहीं बैठेगी जब तक चंदे और खरीद के इन लुटेरों को सलाखों के पीछे नहीं पहुंचा दिया जाता!