सिंहस्थ के भारी-भरकम बजट के बावजूद 600 करोड़ के कर्ज और 200 करोड़ के टेंपल बॉन्ड का मायाजाल
पूर्व जिला पंचायत उपाध्यक्ष भरत पोरवाल ने बोला हुक्मरानों पर करारा हमला!
विशेष राजनीतिक व वैचारिक रिपोर्ट (अवंतिका के युवराज/उज्जैन-मध्य प्रदेश)। महाकाल की पावन और मोक्षदायिनी नगरी उज्जैन में सिंहस्थ 2028 की आड़ लेकर रची जा रही नई वित्तीय योजनाओं ने सियासी और धार्मिक हलकों में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। धार्मिक आस्था के प्रमुख केंद्रों और 11 प्रसिद्ध मंदिरों के विकास व सौंदर्यीकरण के नाम पर तैयार की गई लगभग 1,124 करोड़ रुपये की भारी-भरकम योजना अब विवादों के घेरे में आ चुकी है। इस महत्वाकांक्षी योजना के पीछे जिस तरह से 600 करोड़ रुपये का विशाल बैंक कर्ज लेने और जनता की जेब से 200 करोड़ रुपये के ‘टेंपल बॉन्ड’ जारी करके 800 करोड़ रुपये का फंड जुटाने की तैयारी की जा रही है, उसने प्रशासनिक नीतियों की पारदर्शिता पर बेहद गंभीर और चुभते हुए सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस समूचे घटनाक्रम को लेकर उज्जैन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व जिला पंचायत उपाध्यक्ष भरत पोरवाल ने बेहद आक्रामक और तीखे तेवर अपनाते हुए शासन-प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। भरत पोरवाल ने सीधे तौर पर अधिकारियों और सत्ता में बैठे नीति-नियंताओं की नीयत पर उंगली उठाते हुए सवाल दागा है कि जब विश्व प्रसिद्ध सिंहस्थ आयोजन के लिए राज्य और केंद्र सरकार द्वारा अरबों रुपये का अलग से बजट आवंटित किया जाता है, तो फिर उज्जैन के पवित्र मंदिरों के विकास के नाम पर बैंकों के दरवाजे पर कटोरा लेकर 600 करोड़ का कर्ज मांगने की नौबत क्यों आ रही है? उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि जब सिंहस्थ के विशाल सरकारी बजट से ही इन तमाम विकास कार्यों को आसानी से अंजाम दिया जा सकता था, तब जनता और मंदिरों पर बॉन्ड व लोन का आर्थिक बोझ डालना किसी समझ से परे है।
भरत पोरवाल ने कलेक्टर और मंदिर समितियों की प्रशासनिक भूमिका पर भी तीखा हमला बोला है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि चूंकि मंदिर समितियों के अध्यक्ष पदेन कलेक्टर होते हैं, ऐसे में सरकारी जमीनों, मंदिर परिसरों के अधिकारों और वित्तीय देनदारियों से जुड़ी किसी भी योजना को अमल में लाने से पहले उसकी कानूनी वैधता और जवाबदेही सार्वजनिक की जानी चाहिए। पोरवाल ने यह गंभीर शंका जाहिर की है कि यदि भविष्य में 600 करोड़ के इस भारी-भरकम कर्ज या 200 करोड़ के बॉन्ड के भुगतान में कोई अड़चन आती है, तो उसकी भरपाई की गारंटी किसकी होगी और इसकी जिम्मेदारी आखिर किस संस्था या अधिकारी पर डाली जाएगी? क्या मंदिरों की संपत्तियों और उनकी आय पर अप्रत्यक्ष रूप से कोई वित्तीय शर्त थोपने की तैयारी है?
इस पूरे वित्तीय गणित में मौजूद विसंगतियों को उजागर करते हुए पोरवाल ने साफ किया कि एक तरफ योजना का कुल खर्च 1,124 करोड़ रुपये बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ 600 करोड़ के लोन, 200 करोड़ के बॉन्ड और 308 करोड़ की सरकारी ग्रांट को जोड़ें तो यह आंकड़ा केवल 1,108 करोड़ रुपये ही बैठता है। आखिर इस 16 करोड़ रुपये के भारी अंतर का क्या रहस्य है और इसका हिसाब किसके खाते में जाएगा? भरत पोरवाल ने ऐलान किया है कि मंदिरों के नाम पर इस तरह के अस्पष्ट वित्तीय प्रयोगों को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और यदि प्रशासन ने जल्द ही योजना के तमाम दस्तावेज, टेंडर शर्तें, ब्याज दरें और कानूनी अनुमतियां जनता के सामने पेश नहीं कीं, तो इस अन्यायपूर्ण फैसले के खिलाफ उग्र जन-आंदोलन खड़ा किया जाएगा।
अवंतिका के युवराज इस समूचे घटनाक्रम पर अपनी पैनी नजर रखते हुए यह स्पष्ट करता है कि आस्था की नगरी उज्जैन का विकास हर नागरिक चाहता है, लेकिन विकास की आड़ में कर्ज का ऐसा चक्रव्यूह रचना कहां तक जायज है जिसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़े? जब सरकारी खजाने से सिंहस्थ का बजट उपलब्ध है, तब 800 करोड़ रुपये बाजार और बैंकों से उठाने की जिद के पीछे कौन से प्रशासनिक आका बैठे हैं, इसका जवाब हर हाल में मिलना ही चाहिए। जब तक उज्जैन के मंदिरों और जनता के हितों की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती, तब तक भरत पोरवाल द्वारा उठाए गए इन बुनियादी सवालों की गूंज शासन के गलियारों में इसी तरह गूंजती रहेगी!










