नीलगंगा के चर्चित गोरकर हत्याकांड में 19वाँ आरोपी नागपुर से दबोचा गया

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बाईपास पर गाड़ी खराब होते ही भागने का ड्रामा और ब्रिज से गिरकर अस्पताल पहुँचा आरोपी

खाकी की कार्यप्रणाली पर खड़े होते गंभीर सवाल…..?

विशेष अपराध व खोजी रिपोर्ट (अवंतिका के युवराज/उज्जैन-मध्य प्रदेश)। महाकाल की पावन नगरी उज्जैन के नीलगंगा चौराहे पर हुए सनसनीखेज और बहुचर्चित गोरकर बंधुओं के हत्याकांड के मामले में पुलिस प्रशासन ने एक बार फिर चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। नीलगंगा थाना पुलिस और क्राइम ब्रांच की संयुक्त टीम ने इस बहुचर्चित मामले में लंबे समय से फरार चल रहे 19वें आरोपी रोहित पासी (पिता राकेश पासी, निवासी जबरन कॉलोनी) को नागपुर से घेराबंदी कर धर दबोचने में सफलता हासिल की है। पुलिस अधीक्षक के निर्देशन में हुई इस कार्रवाई के बाद अब तक पकड़े गए कुल आरोपियों की संख्या 19 हो चुकी है, जबकि इस जघन्य वारदात में शामिल 4 अन्य आरोपी अभी भी कानून की पकड़ से बाहर हैं, जिनकी तलाश में पुलिस जुटी हुई है।

लेकिन इस पूरी गिरफ्तारी के बाद पुलिस द्वारा जो कहानी और घटनाक्रम सामने आया, उसने एक बार फिर खाकी की कार्यप्रणाली और अभिरक्षा की व्यवस्थाओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

पुलिसिया सूत्रों और आधिकारिक बयानों के मुताबिक, जब संयुक्त टीम गिरफ्तार आरोपी रोहित पासी को नागपुर से अभिरक्षा में लेकर उज्जैन लौट रही थी, तभी बाईपास के पास अचानक पुलिस की गाड़ी में तकनीकी खराबी आ गई। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, गाड़ी का निचला हिस्सा देखने और मैकेनिक का इंतजार किए जाने के दौरान, आरोपी ने पुलिस को चकमा देने का मौका पा लिया और तेजी से दौड़ते हुए पास के ब्रिज पर चढ़ गया। भागने की इस हड़बड़ाहट में वह ब्रिज से नीचे गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसे तुरंत उपचार के लिए चरक अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहाँ उसका इलाज जारी है।

इस पूरे वाकये को लेकर अब शहर में तरह-तरह की चर्चाएं और सवाल उठने लगे हैं। कानूनी जानकारों और सजग नागरिकों का कहना है कि जब एक अंतरराज्यीय और गंभीर हत्याकांड के आरोपी को पुलिस टीम द्वारा लाया जाता है, तो वहां सुरक्षा के पुख्ता मानक (एसओपी) और हथकड़ी जैसे बुनियादी नियम लागू होते हैं। ऐसे में दर्जनों पुलिसकर्मियों और क्राइम ब्रांच के धुरंधरों की मौजूदगी के बीच आरोपी का अचानक ‘चकमा देकर भागना’ और फिर ब्रिज से नीचे गिर जाना प्रशासनिक सतर्कता की पोल खोलने के लिए काफी है। क्या पुलिस की गाड़ियों का रखरखाव और आरोपियों को लाने-ले जाने की व्यवस्था इतनी लाचार है कि हर बड़े मामले में ठीक वक्त पर गाड़ी खराब होने का इत्तेफाक सामने आ जाता है?

थाना प्रभारी तरुण कुरील की कार्यप्रणाली पर बयान….?


इस पूरे घटनाक्रम के बाद नीलगंगा थाना प्रभारी तरुण कुरील ने जिस अंदाज में मीडिया और पत्रकारों के सामने अपनी बात रखी, उसने खाकी के दावों की हवा निकाल दी है। पत्रकारों के सामने अपनी नाकामी और सुरक्षा चूक को छुपाने के बजाय उसे एक सहज घटना के रूप में पेश करने की जो कला थाना प्रभारी तरुण कुरील ने दिखाई है, वह वास्तव में हैरान करने वाली है।
थाना प्रभारी महोदय ने कैमरे के सामने बड़े ही सहज तरीके से यह बयान दे दिया कि गाड़ी खराब हो गई थी और आरोपी भागने लगा। सवाल यह उठता है कि क्या थाना प्रभारी और उनकी पूरी टीम की जिम्मेदारी केवल आरोपी को पकड़कर ले आने तक सीमित है, या रास्ते में उसकी सुरक्षा और हिरासत को पुख्ता रखना भी उनकी प्राथमिक ड्यूटी है? यदि गाड़ी खराब हुई भी थी, तो पुलिस बल के होते हुए आरोपी को भागने का मौका कैसे मिल गया? क्या जनता और मीडिया को ऐसी फिल्मी और लचर कहानियां सुनाकर पुलिस अपनी हर नाकामी पर पर्दा डालना चाहती है?

अब पुलिस प्रशासन पर यह प्रश्न चिन्ह खड़ा होता है कि केवल बयानों की जादूगरी और लीपापोती करने से प्रशासनिक कमियां छुपने वाली नहीं हैं। थाना प्रभारी तरुण कुरील और उनकी टीम को यह जवाब देना होगा कि नागपुर से लाते वक्त सुरक्षा मानकों में इतनी बड़ी चूक क्यों हुई? जब तक गोरकर हत्याकांड के बाकी बचे 4 अपराधी भी सलाखों के पीछे नहीं पहुँच जाते और इस पूरे ‘भागने के नाटक’ की निष्पक्ष जांच नहीं होती, तब तक जनता की यह तीखी और बेबाक आवाज यूं ही सिस्टम से सवाल पूछती रहेगी!