श्रीगंगा होटल का खूनी चेंबर, जहरीली गैस से घुट गया चार बेकसूरों का दम

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होटल संचालक की आपराधिक लापरवाही और व्यवस्था की अनदेखी ….?

विशेष अपराध व खोजी रिपोर्ट (अवंतिका के युवराज/उज्जैन-मध्य प्रदेश)। महाकाल की पावन और मोक्षदायिनी नगरी उज्जैन में एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और निजी प्रतिष्ठानों के लालच ने चार बेकसूर जिंदगियों को अकाल मौत के मुंह में धकेल दिया। देवास रोड स्थित दशहरा मैदान के पास मौजूद ‘श्रीगंगा होटल’ में बीती रात सफाई के नाम पर एक ऐसा खौफनाक हादसा हुआ, जिसने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। होटल के सड़े और बंद पड़े जहरीले चेंबर की सफाई करने उतरे चार मासूम मजदूरों की दम घुटने से दर्दनाक मौत हो गई। इस भीषण हादसे ने शहर के बड़े रेस्टोरेंट और होटल संचालकों की उस कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जो चंद पैसों की बचत के लिए इंसानी जान को दांव पर लगाने से भी नहीं हिचकते।

घटना की सूचना मिलते ही वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस बल दलबल के साथ मौके पर पहुँचा। चेंबर के भीतर से चारों शवों को निकालकर पोस्टमार्टम के लिए चरक भवन पहुंचाया गया। मारे गए अभागे मजदूरों की पहचान कमलेश पिता सोहनलाल तंबोली (उज्जैन), नितिन पिता ताराचंद (निवासी वाल्मीकि नगर, मछली मार्केट, उज्जैन), वाहिद (निवासी सोमवारिया, उज्जैन) और मनोज पिता तेजमल मीणा (निवासी झालावाड़, राजस्थान) के रूप में हुई है। यह दर्दनाक घटना साबित करती है कि सुरक्षा उपकरणों के बिना मजदूरों को जहरीले वातावरण में उतारना किस कदर जानलेवा साबित हो सकता है।

रात के अंधेरे में बिना किसी सुरक्षा किट, बिना ऑक्सीजन मास्क और बिना किसी तकनीकी आपातकालीन व्यवस्था के इन चारों को उस खूनी चेंबर में क्यों उतारा गया? क्या होटल प्रबंधन को इस बात का अंदेशा नहीं था कि कई दिनों से बंद चेंबर में जानलेवा जहरीली गैसें जमा हो चुकी होंगी? चेंबर में उतरते ही जब इन बेबस मजदूरों की सांसें अटकने लगीं, तो बाहर खड़े लोग लाचार बने रहे और देखते ही देखते चारों की जीवन-लीला समाप्त हो गई। इस हादसे के बाद परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है और पूरे उज्जैन में होटल संचालक की इस असंवेदनशीलता को लेकर भारी आक्रोश देखा जा रहा है।

घटना की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा मृतकों के परिजनों को चार-चार लाख रुपये की राहत राशि देने की घोषणा की गई है और प्रशासनिक अधिकारियों से संपूर्ण मामले की रिपोर्ट मांगी गई है। लेकिन यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या केवल चार लाख रुपये का मुआवजा देने से उन उजड़े हुए परिवारों की दुनिया वापस लौट आएगी? मुआवजा देना सरकार का दायित्व है, परंतु असली मुद्दा तो घटना के मुख्य दोषियों को कानून के शिकंजे में कसने का है।

पुलिस अब इस मामले की जांच में जुटी है कि इस जानलेवा घटना का वास्तविक दोषी कौन है। देर रात गुप्त तरीके से चेंबर की सफाई कराना ही इस हादसे का सबसे बड़ा और प्राथमिक कारण नजर आ रहा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियमों और श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ाकर बिना किसी सुरक्षा गियर के काम कराने वाले श्रीगंगा होटल के संचालक और जिम्मेदार प्रबंधन को तत्काल जांच के दायरे में लेकर सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

उज्जैन की जनता और पीड़ित परिवार अब यह मांग कर रहे हैं कि मामले को केवल कागजी जांच और खानापूर्ति तक सीमित न रखा जाए। श्रीगंगा होटल के मालिक और संबंधित जिम्मेदारों पर गैर-इरादतन हत्या और सुरक्षा नियमों के उल्लंघन की गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाए, ताकि भविष्य में कोई भी रसूखदार चंद पैसों के लिए किसी गरीब की जिंदगी से खिलवाड़ करने की हिम्मत न कर सके।