क्या गांधीधाम पुलिस और आर्य समाज के जिम्मेदारों की साठगांठ पर पर्दा डाल रहा है अंधा कानून?
विशेष ग्राउंड रिपोर्ट (अवंतिका के युवराज/गांधीधाम)। न्याय की देवी की आंखों पर तो पट्टी बंधी ही होती है, लेकिन जब कानून के रखवाले और पुलिस-प्रशासन खुद अपनी आंखों पर स्वार्थ और भ्रष्टाचार की काली पट्टी बांध लें, तो किसी बेबस और पीड़ित नागरिक का सत्याग्रह इतिहास बन जाता है। गुजरात के गांधीधाम स्थित न्यायालय परिसर के ठीक बाहर न्याय की आस में सफेद चादर में लिपटी और लकड़ी के एक अस्थाई ढांचे के पीछे खुद को कैद किए बैठी एक असहाय महिला की तस्वीर हर संवेदनशील नागरिक और प्रशासनिक व्यवस्था के मुंह पर एक जोरदार तमाचा है। सन 2019 में 27 नवंबर से शुरू हुआ यह अनिश्चितकालीन धरना आज वर्ष 2026 में भी बदस्तूर जारी है। अवंतिका के युवराज की ग्राउंड रिपोर्टिंग टीम ने जब मौके पर पहुंचकर पीड़ित परिवार का दर्द महसूस किया, तो गांधीधाम पुलिस तंत्र, ए-डिवीजन थाने के तत्कालीन अधिकारियों और आर्य समाज के कथित कर्ताधर्ताओं का एक खौफनाक गठजोड़ सामने आया।
गांधीधाम न्यायालय परिसर के बाहर जारी इस ऐतिहासिक सत्याग्रह का सबसे मर्माहत करने वाला पहलू यह है कि लकड़ी के संकरे ढांचे में सफेद चादर ओढ़कर बैठी पीड़िता वर्तमान में 7 माह (सात महीने) की गर्भवती हैं। जिस अवस्था में एक महिला को विशेष देखभाल, पोषण, मानसिक शांति और चिकित्सीय देखरेख की अत्यंत आवश्यकता होती है, उस नाजुक स्थिति में वह कड़कड़ाती धूप, धूल और मानसिक प्रताड़ना के बीच दिन-रात गुजारने पर मजबूर हैं। अपने आने वाले बच्चे और स्वयं के जीवन को जोखिम में डालकर अदालत के बाहर बैठी यह गर्भवती महिला गांधीधाम के प्रशासनिक तंत्र, पुलिस और न्याय प्रणाली की संवेदनहीनता को कटघरे में खड़ा करती है। क्या एक गर्भवती महिला के मानवाधिकारों और उसके गर्भ में पल रही नन्हीं जान की सुरक्षा के प्रति प्रशासन इतना अंधा हो चुका है? यदि इस विकट परिस्थिति में पीड़िता या उनके होने वाले शिशु के स्वास्थ्य को कोई नुकसान पहुँचता है, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी ए-डिवीजन पुलिस, निष्पक्ष जांच न करने वाले अधिकारियों और दमनकारी आर्य समाज के जिम्मेदार लोगों की होगी।
पूरे मामले का घटनाक्रम वर्ष 2012 से शुरू होता है जब योगीराज श्याम जी यानी श्याम बहादुर गन्नू गांधीधाम के आर्य समाज में आए और उन्होंने बच्चों व स्थानीय नागरिकों को निःशुल्क योग साधना, ध्यान और असाध्य रोगों के निवारण की निस्वार्थ विद्या सिखानी शुरू की। उनकी कार्यशैली और विद्या से प्रभावित होकर आर्य समाज के प्रधान वचोनिधि ने उन्हें संस्था में ध्यान सिखाने हेतु आधिकारिक रूप से नियुक्त किया। इसके पश्चात श्याम शक्ति योग साधना ट्रस्ट और वैदिक संस्कार केंद्र का विधिवत गठन किया गया, जिसमें योगीराज श्याम जी, उनकी पत्नी अनीता देवी, वचोनिधि तथा उनके परिवार के सदस्य शामिल थे। विवाद की नींव तब पड़ी जब योगसाधक द्वारा बच्चों के ध्यान के प्रचार-प्रसार हेतु शासन के शिक्षा विभाग से अनुमति प्राप्त पत्र लाया गया। आरोप है कि आर्य समाज के प्रधान वचोनिधि और उनके साथियों ने इस ईश्वरीय ध्यान विद्या पर फीस वसूलने का अनैतिक दबाव बनाया। जब योगीराज श्याम जी ने यह कहकर साफ मना कर दिया कि ईश्वरीय ध्यान विद्या बेची नहीं जा सकती और यह पूरी तरह निःशुल्क रहेगी, तो संस्था में विवाद शुरू हो गया। इसी अनैतिक जिद के चलते 25 अक्टूबर 2019 को योगीराज श्याम जी को बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के संस्था से बाहर निकालने की धमकी दी गई।
संस्था से बाहर निकालने की साजिश के तहत पहले आश्रम की बिजली-पानी का कनेक्शन काट दिया गया। इसके बाद 21 नवंबर 2019 की रात करीब साढ़े दस बजे 20 से 25 असामाजिक तत्वों को भेजकर आश्रम परिसर में हमला करवाया गया। उस समय योगीराज श्याम जी मौके पर मौजूद नहीं थे और केवल उनकी पत्नी अनीता देवी तथा वृद्ध माताजी घर में थीं। आरोप है कि इन असामाजिक तत्वों ने महिलाओं के साथ मारपीट की, उन्हें घसीटकर बाहर फेंका और सामान की तोड़ाफोड़ की। जब घटना की सूचना पर पुलिस आई, तो न्याय करने के बजाय गांधीधाम ए-डिवीजन पुलिस स्टेशन के तत्कालीन पुलिस निरीक्षक भाविन सुथार पर गंभीर सवाल उठे। पीड़ित का आरोप है कि पुलिस निरीक्षक भाविन सुथार ने निष्पक्ष कार्रवाई करने के बजाय उल्टा पीड़ित साधु को ही मारकर पुलिस अभिरक्षा में डाल दिया और उनका मेडिकल परीक्षण तक नहीं होने दिया। हद तो तब हो गई जब जेल के आधिकारिक रजिस्टर में पीड़ित का नाम तक दर्ज नहीं किया गया। इतना ही नहीं, पुलिस की जांच में विरोधाभासी बयान दर्ज किए गए जहां पुलिस अधिकारी ने अपनी गाड़ी में 6 आरोपियों को लाने का दावा किया, वहीं कथित आरोपियों व कंडक्टरों ने खुद बस से थाने पहुंचने की बात कही। प्रधान वचोनिधि के बयानों में भी बार-बार भारी विरोधाभास पाए गए, जो स्पष्ट रूप से एक रची गई प्रशासनिक साजिश की ओर इशारा करते हैं।
इस जघन्य अत्याचार और पुलिसिया बर्बरता के खिलाफ जब पीड़ित परिवार ने 27 नवंबर 2019 को अदालत का दरवाजा खटखटाया और कोर्ट के बाहर धरना शुरू किया, तब से लेकर आज वर्ष 2026 तक यह परिवार न्याय की गुहार लगा रहा है। न्यायालय के बाहर लगाए गए बोर्ड पर स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि आर्य समाज के प्रधान वचोनिधि और पुलिस इंस्पेक्टर भाविन सुथार के अत्याचारों और अनैतिक कार्यों के विरुद्ध धरना। माननीय न्यायालय के समक्ष चल रही जांच प्रक्रिया को लेकर भी पीड़ितों का दर्द छलक पड़ा। तीन से चार बार हुई पुलिस जांचों को जजों ने स्वयं अपूर्ण और त्रुटिपूर्ण पाया।
जजों की लगातार बदली और अधूरी पुलिस रिपोर्टों के कारण न्याय का यह इंतजार वर्षों में बदल गया। वर्तमान में पीड़िता सफेद चादर ओढ़कर, खुद को लकड़ी के संकरे पिंजरेनुमा ढांचे में कैद करके अमानवीय मानसिक व शारीरिक कष्ट सहते हुए मानवाधिकारों के हनन की जीती-जागती मिसाल बनी हुई हैं।
अवंतिका के युवराज सीधे तौर पर गुजरात के गृह विभाग, पुलिस महानिदेशक और जिला प्रशासन से यह तीखे सवाल पूछता है कि सात वर्षों से यानी 2019 से 2026 तक एक महिला अदालत के बाहर लकड़ी के ढांचे में कैद होकर सत्याग्रह कर रही है, तो क्या गांधीधाम प्रशासन की आंखों पर अंधा चश्मा चढ़ा हुआ है। जिस पुलिस अधिकारी पर आरोपियों से साठगांठ करने, फर्जी मामला बनाने और पीड़ित का मेडिकल न कराकर गैर-कानूनी ढंग से प्रताड़ित करने का आरोप है, उस पर विभागीय जांच कर दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई। धर्म और समाज सुधार का चोला ओढ़कर ध्यान विद्या को धंधा बनाने वाले और असहाय महिलाओं पर हमला करवाने वाले कथित प्रधान वचोनिधि और उनके साथियों को अब तक कानून का भय क्यों नहीं दिखाया गया। क्या किसी नागरिक को न्याय मांगने के लिए अपनी पूरी जिंदगी इस तरह पिंजरेनुमा ढांचे में गुजारनी पड़ेगी। यह मामला केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं है, बल्कि यह उस तंत्र का वीभत्स चेहरा है जहां रसूखदार और पुलिस की मिलीभगत के आगे आम इंसान का अस्तित्व रौंद दिया जाता है। अवंतिका के युवराज शासन-प्रशासन से मांग करता है कि इस मामले की उच्चस्तरीय स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराई जाए और पीड़ित परिवार को तत्काल सुरक्षा व न्याय प्रदान किया जाए।










