मासूमियत के चेहरे पर फरेब का नकाब

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बदनामी के दलदल में धकेली जा रही खाकी और कानून, चंद घंटों की देरी छुपाने के लिए रच दी अपहरण और गैंगरेप की खौफनाक स्क्रिप्ट

इंदौर। न्याय और कानून की व्यवस्था को अपने झूठ से बंधक बनाने और पुलिस प्रशासन को गुमराह करने का एक ऐसा सनसनीखेज और आपराधिक कृत्य सामने आया है, जिसने न केवल कानूनी मशीनरी का अमूल्य समय बर्बाद किया बल्कि समाज की अंतरात्मा को भी झकझोर कर रख दिया है। तिलक नगर थाना क्षेत्र की एक नाबालिग छात्रा ने अपनी व्यक्तिगत गलतियों और घर लौटने में हुई देरी को छुपाने के लिए न्याय प्रणाली का क्रूर मजाक उड़ाया। झूठी चोटें, फर्जी गवाह और मनगढ़ंत कहानी के सहारे कानून को ढाल बनाने की इस साजिश का जब पुलिसिया तफ्तीश की कसौटी पर परीक्षण किया गया, तो सच्चाई का वह बदरंग चेहरा सामने आया जिसने आधुनिक सामाजिक ताने-बाने और नैतिक पतन की पोल खोलकर रख दी।

कानूनी पैंतरेबाजी से एफआईआर का जाल, जीरो पर दर्ज मुकदमे से हिली तिलक नगर पुलिस, खुद को पीड़िता साबित करने के लिए हाथों पर खुद ही चला लिया ब्लेड

प्राप्त साक्ष्यों और प्रामाणिक घटनाक्रम के अनुसार, कथित रूप से खुद को किडनैपिंग और गैंगरेप जैसी जघन्य वारदात की शिकार बताने वाली दसवीं की छात्रा ने अत्यंत शातिराना अंदाज में कानूनी दांव-पेंच का सहारा लिया। उसने तिलक नगर क्षेत्र से खुद का अपहरण होना दर्शाया, लेकिन सीधे शिप्रा थाने पहुंचकर समूचे प्रशासनिक अमले को आपातकाल जैसी स्थिति में ला खड़ा किया। क्षेत्राधिकार का तकनीकी पेंच होने के बावजूद शिप्रा पुलिस ने संवेदनशीलता दिखाते हुए तत्काल शून्य (0) पर प्राथमिकी दर्ज कर मामले को तिलक नगर पुलिस के सुपुर्द किया। कानून की आंखों में धूल झोंकने की पराकाष्ठा तो तब देखने को मिली, जब इस कथित पीड़िता ने खुद को कानूनन बेदाग और सच साबित करने के लिए अपने ही हाथों पर गहरे कट लगा लिए, ताकि आत्मरक्षा के झूठे संघर्ष को साक्ष्य के रूप में अदालत और पुलिस के सामने पेश किया जा सके।

डिजिटल साक्ष्यों से बेनकाब हुआ फरेब, सीसीटीवी कैमरों की तीसरी आंख ने खोला राजगृह कॉलोनी का सच, होटल की अय्याशी छुपाने के लिए कानून से खिलवाड़

कथित घटना के बाद जब तिलक नगर पुलिस ने न्याय के सिद्धांतों और आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत तफ्तीश की दिशा आगे बढ़ाई, तो सबसे पहले उस कथित घटनाक्रम के उद्गम स्थल यानी राजगृह कॉलोनी के सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए। यहीं से इस पूरी साजिश के ताश के पत्ते बिखरना शुरू हुए। डिजिटल साक्ष्यों और कैमरों की फुटेज ने चीख-चीख कर गवाही दी कि किसी भी सफेदपोश कार या अज्ञात अपराधियों ने छात्रा का अपहरण नहीं किया था। छात्रा पूरी तरह अपनी मर्जी से, बिना किसी दबाव के अपनी स्कूटी पर सवार होकर अपने मित्र अंश से मिलने एक होटल पहुंची थी। घंटों तक होटल में समय व्यतीत करने के बाद जब छात्रा को घर लौटने में अत्यधिक देरी हो गई, तो अपने अभिभावकों के आक्रोश और नैतिक जवाबदेही से बचने के लिए उसने कानून की परिधि में एक ऐसी खौफनाक झूठी पटकथा तैयार की, जिसने सीधे तौर पर न्यायपालिका और खाकी की प्रतिष्ठा को चुनौती दे डाली।

स्वीकारोक्ति से ढहा झूठ का किला, देर रात तक चली पूछताछ में अंश और कथित पीड़िता ने उगला सच, सहानुभूति बटोरने की घिनौनी कोशिश का पर्दाफाश

जब वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी साक्ष्यों और सीसीटीवी फुटेज के अकाट्य प्रमाणों को आरोपी मित्र अंश और उस तथाकथित पीड़िता के सम्मुख रखकर कड़ाई से प्रतिपरीक्षण किया गया, तो उनके द्वारा निर्मित झूठ का किला ताश के महल की तरह ढह गया। दोनों ने पुलिस के आला अधिकारियों के समक्ष यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि समाज और परिवार में अपनी छवि बचाने और देर से आने का कोई ठोस बहाना न होने के कारण उन्होंने सामूहिक बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर आरोपों का सहारा लिया। यह कृत्य न केवल भारतीय न्याय संहिता के तहत एक दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है, बल्कि यह उन वास्तविक पीड़ितों के अधिकारों पर भी कुठाराघात है जो न्याय के लिए अदालतों के चक्कर काटते हैं। इस प्रकार की घिनौनी और मनगढ़ंत कहानियों से कानून व्यवस्था को पंगु बनाने वाले तत्वों के खिलाफ अब कठोर दंडात्मक कार्रवाई समय की सबसे बड़ी मांग बन चुकी है।