मेघपार बोरीची-कुंभार्डी सीवरेज योजना में महा-घोटाला

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कागजों में पूरी हो गई करोड़ों की योजना फर्जी प्रमाण पत्र से खुली गांधीधाम नगर निगम के भ्रष्ट तंत्र की पोल!


विशेष खोजी रिपोर्ट (अवंतिका के युवराज/गांधीधाम-कच्छ)। गांधीधाम नगर निगम का भ्रष्ट, लापरवाह और कानूनविहीन प्रशासन एक बार फिर बेनकाब हो चुका है। नगर निगम के अंतर्गत आने वाले मेघपार बोरीची और कुंभार्डी गांवों में जिस सीवरेज व पेयजल योजना की निविदा (टेंडर) प्रक्रिया आज तक अंतिम रूप भी नहीं ले पाई है, उस योजना का काम कागजों पर ‘सफलतापूर्वक पूरा’ भी घोषित कर दिया गया! एक निजी पीएमसी एजेंसी और नगर निगम के भ्रष्ट अधिकारियों की सांठगांठ से रचे गए इस फर्जीवाड़े ने प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है।

उत्तराखंड सरकार के ईमेल से फूटा घोटाले का गुब्बारा
घोटाले की परतें तब खुलीं जब गांधीधाम नगर निगम के तहत कार्यरत पीएमसी एजेंसी 3A ने देवभूमि उत्तराखंड में सरकारी निविदा प्रक्रिया में भाग लिया। उत्तराखंड में करोड़ों रुपये का नया ठेका हासिल करने के लिए इस एजेंसी ने एक ‘कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र’ (प्रोजेक्ट कंप्लीशन सर्टिफिकेट) प्रस्तुत किया। इसमें दावा किया गया कि उसने गांधीधाम के मेघपार बोरीची और कुंभार्डी क्षेत्र में सीवरेज का काम पूरी सफलता के साथ संपन्न कर लिया है। जब उत्तराखंड सरकार ने इस प्रमाण पत्र की सत्यता जांचने के लिए गांधीधाम नगर निगम को ईमेल भेजा, तब जाकर मौके पर पहुंचे अधिकारियों के होश उड़ गए। कागजों पर पूरा हो चुका काम धरातल पर शुरू ही नहीं हुआ था!

अफसरों और ठेकेदारों की सांठगांठ का खेल
सूत्रों के मुताबिक, जिस एजेंसी ने यह फर्जी प्रमाण पत्र लगाया है, उसने पहले भी गांधीधाम नगर निगम में कई काम किए हैं। इसी वजह से एजेंसी के इंजीनियरों और नगर निगम के बड़े प्रशासनिक आकाओं के बीच गहरे और मलाईदार संबंध हैं। इसी सिंडिकेट के दम पर निविदा प्रक्रिया में अटके काम का ‘कार्य पूर्णता’ प्रमाण पत्र आसानी से तैयार करवा लिया गया। अब इस बड़े घोटाले का खुलासा होने के बाद नगर निगम लॉबी और स्थानीय ठेकेदारों के बीच हड़कंप मचा हुआ है।

अवंतिका के युवराज के तीखे और सीधे सवाल

जिस काम की निविदा तक फाइनल नहीं हुई, उसका ‘काम पूरा हो गया’ का प्रमाण पत्र जारी करने के लिए किसके दस्तखत का इस्तेमाल हुआ?

ऐसी कौन सी बेबसी या मोटा लेन-देन था, जिसके चलते अधिकारियों ने सिर्फ कागजों पर सिमटे काम को पूरा बता दिया?

इस प्रकार के खुलेआम फर्जीवाड़े को अंजाम देने के लिए एजेंसी और दलालों को किस बड़े प्रशासनिक या राजनीतिक आका का संरक्षण मिल रहा है?

केवल ईमेल से जवाब देकर पल्ला झाड़ने का ड्रामा क्यों?
मामला खुलने के बाद नगर निगम ने उत्तराखंड सरकार को ईमेल से यह जवाब भेजकर पल्ला झाड़ लिया कि “हमने ऐसा कोई प्रमाण पत्र जारी नहीं किया है और काम पूरा नहीं हुआ है।” लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल एक ईमेल भेज देने से नगर निगम की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? यदि नगर निगम ने यह प्रमाण पत्र जारी नहीं किया, तो यह सीधे-सीधे जालसाजी, कूटरचित दस्तावेज बनाने और धोखाधड़ी का आपराधिक मामला है।

अगर जिम्मेदार अधिकारियों में थोड़ी भी नैतिकता बची है, तो आरोपी एजेंसी और फर्जी हस्ताक्षर करने वालों के खिलाफ तुरंत पुलिस में प्राथमिकी (FIR) दर्ज क्यों नहीं कराई जा रही? नगर आयुक्त को अपनी सुस्ती और खामोशी तोड़कर इस पूरे घोटाले की तह तक जाना चाहिए। ‘अवंतिका के युवराज’ यह स्पष्ट चेतावनी देता है कि यदि इस फर्जीवाड़े पर लीपापोती करने की कोशिश की गई, तो भ्रष्ट अफसरों के चेहरों को बेनकाब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।