महाकाल की भूमि पर अधर्म का तांडव, जाली दस्तावेजों से सरकारी मंदिर पर डाका

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अदालत को गुमराह करने वाला फर्जी नक्शा बेनकाब, पुलिस की झूठी खा़रजी को न्यायालय ने किया निरस्त

उज्जैन। धर्मधानी उज्जैन में सत्य की बलि चढ़ाने वाले भू-माफियाओं ने अब न्याय के मंदिर में भी सेंध लगा दी है। हमारी पड़ताल में उजागर हुआ है कि शासकीय गौरी शंकर महादेव मंदिर (सूची क्रमांक 216) की करोड़ों की ज़मीन हड़पने के लिए षड्यंत्रकारियों ने फर्जी सील और जाली हस्ताक्षरों से तैयार नक्शा अदालत के समक्ष पेश कर दिया। जब वास्तविक साक्ष्य सामने आए तो जालसाजों का झूठ का किला ढहने लगा। सवाल यह है कि जो लोग न्याय व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं, वे समाज के लिए कितने घातक साबित होंगे।

कम पढ़ी-लिखी विधवा के हक पर रसूखदारों की चोट

इस खूनी षड्यंत्र का शिकार हुई संतोष बाई योगी को बेदखल करने के लिए उनकी कम शिक्षा का सहारा लिया गया। पुजारी विश्वनाथ योगी के निधन के बाद महादेव की सेवा में जीवन समर्पित करने वाली इस महिला को आज अपनों के ही जुल्मों के कारण दर-दर भटकना पड़ रहा है। जिस महिला को तीस साल का पूजा-अर्चना का अनुभव है, उसे रसूखदार अपराधियों ने मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर मंदिर की संपत्ति से दूर करने का पाप किया है।

ताले काटकर डकैती और अवैध कब्जे का दुस्साहस
घटना का सबसे काला अध्याय वह है जब निर्मल योगी और उसके साथियों ने संतोष बाई की दुकान व घर के सात ताले काटकर सारा सामान चोरी कर लिया और दुकान पर अवैध कब्जा कर लिया। हैरानी की बात यह है कि इस सरेआम हुई लूट की रिपोर्ट लिखवाने के लिए पीड़िता को 17 दिन तक संघर्ष करना पड़ा। आज भी उस दुकान का दरवाजा संतोष बाई के घर के भीतर ही खुलता है, जो इस बात का जीवंत प्रमाण है कि दुकान का मालिकाना हक किसका है। लेकिन अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्होंने घर के अंदरूनी हिस्से तक में घुसपैठ कर ली है।

महाकाल थाने की संदिग्ध भूमिका,दो बार लगाई झूठी खा़रजी कोर्ट ने लगाई फटकार

इस पूरे प्रकरण में महाकाल थाने के जांच अधिकारियों की भूमिका सबसे अधिक संदिग्ध रही है। संतोष बाई के पास दुकान के मालिकाना हक के समस्त पुख्ता सरकारी दस्तावेज होने के बावजूद, जाँच अधिकारियों ने अपराधियों से सांठगांठ कर दो बार मामले में ‘झूठी खा़रजी’ लगा दी। पुलिस की इस कार्यप्रणाली से ऐसा प्रतीत होता है मानो वे रसूखदारों के निजी मुलाजिम बनकर काम कर रहे हों। हालांकि, सत्य को परेशान किया जा सकता है पराजित नहीं। माननीय न्यायालय ने पुलिस द्वारा पेश की गई इस फर्जी और झूठी खा़रजी रिपोर्ट को सिरे से निरस्त कर दिया है, जिससे पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

सरकारी रिकॉर्ड से मंदिर का अस्तित्व मिटाने का खेल

जालसाजी की हद तो देखिए कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज ‘गौरीशंकर महादेव’ का नाम बदलकर ‘गोपू बालेश्वर’ करने का प्रयास किया गया ताकि इसे निजी संपत्ति घोषित कर कब्जा किया जा सके। रजिस्ट्री कार्यालय के जिम्मेदारों की भूमिका भी यहाँ कटघरे में है, क्योंकि बिना जिलाधीश की अनुमति के सर्वे नंबर 2128/1 जैसी शासकीय भूमि का सौदा करना एक बड़े संस्थागत भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। क्या प्रशासन की नाक के नीचे सरकारी रिकॉर्ड के साथ ऐसी छेड़छाड़ स्वीकार्य है?

भोपाल तक पहुँची न्याय की पुकार, क्या अब होगा साक्ष्यों का परीक्षण?

स्थानीय स्तर पर रफा-दफा किए गए इस संवेदनशील मामले की गूँज अब भोपाल के गलियारों में सुनाई दे रही है। पीड़ित परिवार ने पुलिस महानिदेशक की जनसुनवाई में पहुँचकर न्याय की गुहार लगाई है। अपनी नौकरी और साख बचाने के लिए कथित रूप से नकाब बदलने वाले उन पुलिस अधिकारियों की भूमिका की अब क्या उच्च स्तरीय जांच की जाएगी? आखिर किसके दबाव में विधवा की हाय और महादेव की संपत्ति के साथ खिलवाड़ करने वालों के गिरेबान तक कानून के हाथ नहीं पहुँच पा रहे हैं?