प्रशासनिक संकुल कलेक्टर ऑफिस के बाहर लगी भीषण आग धू-धू कर जले बांस और हमलावर हुई मधुमक्खियां!

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सम्राट विक्रमादित्य प्रशासनिक संकुल के सुरक्षा घेरे में बड़ी सेंध, साजिश या लापरवाही? धुएं के गुबार में दफन हुई तंत्र की मुस्तैदी!

उज्जैन। जहाँ से पूरे जिले की कानून व्यवस्था और सुरक्षा की कमान संभाली जाती है, आज दोपहर उसी ‘सम्राट विक्रमादित्य प्रशासनिक संकुल भवन’ के मुख्य द्वार पर साक्षात काल का नंगा नाच देखने को मिला। जिले के राजा यानी कलेक्टर महोदय के दफ्तर के ठीक बाहर लगे बांस के विशाल पेड़ों में अचानक ऐसी भयानक आग भड़की जिसने कुछ ही मिनटों में विकराल रूप धारण कर लिया। आग की लपटें इतनी ऊँची और भयावह थीं कि उन्हें दूर-दूर से देखा जा सकता था और आसमान काले धुएं के गुबार से पूरी तरह ढंक गया। इस अग्निकांड ने न केवल प्राकृतिक हरियाली को राख किया, बल्कि संकुल की इमारत पर लगे मधुमक्खियों के लगभग छह बड़े छत्तों को भी अपनी चपेट में ले लिया। आग की तपिश से विचलित होकर हजारों मधुमक्खियां इधर-उधर भागने लगीं, जिससे वहाँ मौजूद आम जनता और कर्मचारियों में भगदड़ मच गई। रूह कँपा देने वाले इस मंजर ने संकुल की सुरक्षा व्यवस्था पर एक ऐसा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है जिसका जवाब देने वाला फिलहाल कोई नहीं है।

सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या यह आग महज़ एक इत्तेफाक है या किसी सोची-समझी साजिश का हिस्सा? आमतौर पर कलेक्टर ऑफिस के बाहर लोग बीड़ी-सिगरेट पीने के लिए इकट्ठा होते हैं और जलती हुई तीलियाँ या टुकड़े लापरवाही से फेंक देते हैं। क्या इसी लापरवाही ने आज एक बड़े हादसे की नींव रखी? आग लगने के बाद लगभग आधे घंटे तक बांस के पेड़ सुलगते रहे और लपटें तांडव करती रहीं, लेकिन फायर ब्रिगेड को पहुँचने में जो समय लगा, उसने आपातकालीन सेवाओं की सक्रियता की पोल खोलकर रख दी है। एक घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद दमकल कर्मियों ने आग पर काबू तो पा लिया, लेकिन तब तक बांस के पेड़ जलकर पूरी तरह खाक हो चुके थे। जिस परिसर में सुरक्षा के नाम पर भारी अमला तैनात रहता है, वहाँ इतनी भीषण आग का लग जाना और आधे घंटे तक लपटों का बेकाबू रहना प्रशासन के गाल पर एक करारा तमाचा है।

इस घटना ने प्रशासनिक संकुल के भीतर काम करने वाले अधिकारियों और वहाँ अपनी फरियाद लेकर आने वाले गरीब ग्रामीणों के जीवन को भी खतरे में डाल दिया था। संकुल भवन के प्रवेश द्वार पर धुआं इतना खतरनाक और दमघोंटू हो गया था कि लोगों का सांस लेना तक दूभर हो गया। यदि यह आग मधुमक्खियों के हमले के साथ किसी बड़ी जनहानि में बदल जाती, तो इसका जिम्मेदार कौन होता? क्या प्रशासन को अब यह समझ नहीं आता कि संकुल जैसे संवेदनशील स्थानों पर बीड़ी-सिगरेट और कूड़ा जलाने जैसी गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध की आवश्यकता है? हमारा समाचार पत्र सीधे तौर पर यह सवाल पूछता है कि क्या कलेक्टर ऑफिस के बाहर की यह आग किसी बड़ी घटना का ‘ट्रेलर’ है या फिर जिम्मेदारों की लापरवाही का एक और काला अध्याय? मामले की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इस आग के पीछे किसी शरारती तत्व का हाथ है या फिर यह तंत्र की अपनी ही लापरवाही का नतीजा है। हमारी टीम इस मामले की तह तक जाएगी और सुरक्षा में हुई इस गंभीर चूक के असली दोषियों को बेनकाब करेगी।