न्याय के मंदिर में अन्याय का जाली नक्शा! जालसाजों ने कोर्ट की आँखों में भी झोंकी धूल
उज्जैन। धर्मधानी उज्जैन में जहाँ सत्य का बोलबाला होना चाहिए, वहाँ भू-माफियाओं ने न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी बाँधने का दुस्साहस कर डाला है। अवंतिका के युवराज की पड़ताल में यह सनसनीखेज तथ्य सामने आया है कि शासकीय गौरी शंकर महादेव मंदिर (सर्वे नंबर 216) की करोड़ों की भूमि को हड़पने के लिए षड्यंत्रकारियों ने न केवल जाली नक्शे गढ़े बल्कि उन पर फर्जी सील और अधिकारियों के जाली हस्ताक्षर ठोक कर उसे माननीय न्यायालय के समक्ष पेश कर दिया। सूत्रों की मानें तो जब पीड़ित पक्ष ने ओरिजिनल नक्शा कोर्ट के सामने रखा तो इन नकाबपोश अपराधियों की बोलती बंद हो गई और उनका रचित झूठ का किला ढहने लगा। सवाल यह खड़ा होता है कि जो लोग न्याय के मंदिर के साथ छल कर सकते हैं, वे समाज के लिए कितने घातक होंगे….?
बुजुर्ग विधवा को अनपढ़ बताकर बेघर करने का पाप, क्या भक्ति और न्याय के लिए अब डिग्री की ज़रूरत होगी….?
षड्यंत्र की पराकाष्ठा तो देखिए एक बुजुर्ग और बेसहारा महिला संतोष बाई योगी को मंदिर से केवल इसलिए बेदखल करने की साजिश रची गई क्योंकि वह पढ़ी-लिखी नहीं है। इन सफेदपोश अपराधियों ने कौन से ग्रंथ का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला कि अनपढ़ होना सेवा या न्याय के अयोग्य बनाता है…? जिस महिला के पति की मृत्यु के बाद उसने अपना जीवन महादेव की सेवा में समर्पित कर दिया, उसे आज अपनी जान बचाने के लिए रिश्तेदारों के यहाँ छुपकर शरण लेनी पड़ रही है। माननीय न्यायालय को गुमराह कर, एक गरीब महिला के हक पर डाका डालने वाले इन कथित शिक्षित राक्षसों का असली चेहरा अब जनता के सामने आना ही चाहिए।
सरकारी नौकरी बचाने को बदला नाम और बदला नकाब, पाप का दाग कैसे छुपाओगे…..?
इस पूरे खेल के पीछे वे सफेदपोश चेहरे सक्रिय हैं जो शासन का नमक खाते हैं और उसी की संपत्ति को चूना लगाते हैं। अपनी सरकारी नौकरी और सामाजिक साख बचाने के लिए इन लोगों ने रजिस्ट्री और दस्तावेजों में अपने नाम तक बदल लिए ताकि विभाग की गाज न गिरे। नौकरी सरकारी और काम भू-माफिया जैसा—यह इन चेहरों की असलियत है। रजिस्ट्री में उल्लेखित फर्जी नाम और उनकी असली सरकारी पहचान के बीच का यह पर्दाफाश प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक गहरा जख्म है। क्या शासन ऐसे भ्रष्ट मुलाजिमों को अभयदान देता रहेगा…..?
रजिस्ट्री कार्यालय, जहाँ जांच नहीं जुगाड़ का सिक्का चलता है!
जब अवंतिका के युवराज ने रजिस्ट्री कार्यालय के जिम्मेदारों से तीखे सवाल किए, तो जवाब मिला—दस्तावेज पूरे थे इसलिए रजिस्ट्री कर दी। यह जवाब उज्जैन प्रशासन के मुँह पर करारा तमाचा है! क्या करोड़ों की शासकीय भूमि का सौदा बिना कलेक्टर की अनुमति के संभव है? क्या सर्वे 216 के शासकीय होने का सच रजिस्टर की आँखों से ओझल था…? बिना गहन जांच के शासकीय मंदिर की रजिस्ट्री करना प्रशासनिक अक्षमता नहीं बल्कि एक सुनियोजित मैनेजमेंट की ओर इशारा करता है, जिसमें कई बड़े मगरमच्छ शामिल हैं।
साख बचाने की कवायद, पुलिस की रहस्यमयी चुप्पी और फाइलों में कैद आवेदन!
जब रजिस्ट्रार कार्यालय पर गाज गिरी, तो उन्होंने अपनी खाल बचाने के लिए माधव नगर थाने को निर्देशित किया। लेकिन अफसोस! पुलिस ने आवेदक के पत्रों को मानो ‘घोलकर पी’ लिया। जब अधिकारी कोर्ट में खड़े हुए, तो वहाँ भी साफ़ मुकर गए। आखिर किसके दबाव में माधव नगर पुलिस अपराधियों को संरक्षण दे रही है..? क्यों कलेक्टर के निर्देश रद्दी की टोकरी में पड़े हैं…? 6 साल से पीड़ित परिवार हर दफ्तर की चौखट घिस चुका है, लेकिन जवाब में सिर्फ आश्वासन मिले।
राजधानी की दहलीज पर गूँजी पीड़ित की चीख, डीजीपी की जनसुनवाई में पहुँचा मामला
प्रशासनिक उपेक्षा और स्थानीय पुलिस की संलिप्तता से त्रस्त होकर हार मान चुके पीड़ित पक्ष ने अब भोपाल की ओर रुख किया है। बीते मंगलवार को यह पीड़ित परिवार भोपाल में डीजीपी की जनसुनवाई में पहुँचा और न्याय की गुहार लगाई। यह मामला अब केवल उज्जैन का नहीं, बल्कि प्रदेश की न्याय व्यवस्था के लिए चुनौती बन चुका है। जिस मंदिर की संपत्ति पर आज भू-माफिया किराए से दुकानें और होटल संचालित कर रहे हैं, वहाँ महादेव के भक्तों को दर्शन तक नहीं करने दिया जा रहा।
बेनकाब होंगे सफेदपोश चेहरे, क्या अगले अंक में फटेगा महा-धमाके का बम…..?
जालसाजी और भ्रष्टाचार के इस घिनौने खेल से रहस्य का पर्दा अभी पूरी तरह नहीं उठा है। अवंतिका के युवराज की पड़ताल अभी जारी है और हमारे पास उन नकाबपोशों की पूरी कुंडली तैयार है जो दिन में सरकारी कुर्सी तोड़ते हैं और रात में भू-माफियाओं के साथ मिलकर विधवा की हाय बटोरते हैं। आखिर वे कौन से विशिष्ट विभाग के मुलाजिम हैं जिन्होंने अपनी नौकरी बचाने के लिए दस्तावेजों में अपना नाम तक गिरवी रख दिया? क्यों करोड़ों की इस शासकीय संपत्ति पर महाकाल प्रशासक की आँखों पर पट्टी बँधी हुई है? क्या प्रशासन को किसी बड़ी अनहोनी का इंतज़ार है? अपनी साख बचाने के लिए अधिकारियों ने कोर्ट में जो झूठ परोसा है, उसकी एक-एक परत हम अगले अंक में उधेड़ेंगे। सावधान रहिये, क्योंकि हमारी कलम अब उन बड़े नामों के गिरेबान तक पहुँचने वाली है जिन्होंने इस अधर्म को संरक्षण दिया है। (क्रमशः…)










