उज्जैन। नगर पालिक निगम के हुक्मरानों की संवेदनहीनता ने उज्जैन के सबसे व्यस्ततम इलाकों में से एक, देवासगेट बस स्टैंड को एक बड़े हादसे के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। 24 घंटे यात्रियों, श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों की आवाजाही से गुलजार रहने वाले इस क्षेत्र में, 1970 के दशक में निर्मित नगर निगम लॉज की यह जर्जर इमारत अब मौत का पैगाम लिख रही है। वर्षों से बदहाली और उपेक्षा का शिकार यह बहुमूल्य सरकारी संपत्ति न केवल निगम की लापरवाही का जीवंत प्रमाण है, बल्कि अधिकारियों की उस कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करती है जहाँ सरकारी संपत्तियों को केवल कागजों पर ‘सुरक्षित’ माना जाता है।

10 साल से रखरखाव का अकाल, सीढ़ियां तोड़ीं पर मरम्मत करना भूले साहब, धूल फांक रही करोड़ों की संपत्ति
लगभग एक दशक पहले इस होटल को खाली करवाने के नाम पर इसकी ऊपर जाने वाली सीढ़ियों को तोड़ दिया गया था। प्रशासन ने उस वक्त तो फुर्ती दिखाई, लेकिन उसके बाद से लेकर आज तक इस इमारत की एक ईंट भी सुधारने की जहमत नहीं उठाई गई। टूटी हुई सीढ़ियाँ, दरकती दीवारें और हवा में लटकता जर्जर प्लास्टर—यह सब इस इमारत की भयावह हकीकत है। पिछले 10 सालों से यह प्राइम लोकेशन वाली बिल्डिंग रखरखाव के अभाव में खंडहर में तब्दील हो चुकी है। क्या नगर निगम के अधिकारी किसी ‘मुहूर्त’ का इंतज़ार कर रहे हैं या फिर उन्हें शहर की संपत्तियों की बर्बादी से कोई सरोकार नहीं है?

सैकड़ों व्यापारियों और यात्रियों की जान दांव पर नीचे चल रहा है करोड़ों का व्यापार, ऊपर मंडरा रहा है मौत का साया
इस जर्जर बिल्डिंग की सबसे खौफनाक हकीकत इसके नीचे स्थित दुकानें हैं। होटल की हालत बद से बदतर हो चुकी है, लेकिन नगर निगम इन दुकानों से अपनी वसूली करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। नीचे व्यापार कर रहे छोटे और मध्यमवर्गीय व्यापारियों की जान पर हर पल खतरा मंडरा रहा है। यह क्षेत्र श्रद्धालुओं और यात्रियों से हमेशा भरा रहता है; ऐसे में अगर ऊपर से कोई हिस्सा गिरता है, तो उसकी चपेट में आने वाले मासूमों की जान का जिम्मेदार कौन होगा? क्या नगर निगम के अधिकारी किसी बड़े हादसे के बाद ही अपनी ‘कुंभकरणी नींद’ से जागेंगे?
लापरवाही की इंतहा, सरकारी खजाने को चूना और जनता को खतरा आखिर किसका इंतज़ार कर रहा है प्रशासन?
देवासगेट बस स्टैंड जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्र में, जहाँ हर पल हज़ारों लोगों का जमावड़ा रहता है, वहाँ इतनी बड़ी सरकारी संपत्ति को लावारिस छोड़ देना किसी बड़े अपराध से कम नहीं है। यह लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति को ‘सुनियोजित’ तरीके से बर्बाद होने देने की ढील प्रतीत होती है। एक तरफ निगम आर्थिक तंगी का रोना रोता है, वहीं दूसरी ओर करोड़ों की यह बिल्डिंग अधिकारियों की नाकामी की भेंट चढ़ रही है।
क्षेत्र के बुद्धिजीवियों और बस चालकों ने दी चेतावनी,क्या किसी शव के गिरने के बाद ही गिरेगा इस बिल्डिंग का जर्जर ढांचा?
देवासगेट बस स्टैंड क्षेत्र के बुद्धिजीवी बुजुर्गों और अनुभवी बस चालकों का स्पष्ट रूप से कहना है कि यह इमारत अब किसी भी दिन बड़े हादसे की वजह बन सकती है। सालों से यहाँ अपनी सेवाएं दे रहे बस चालकों ने बताया कि दरकती दीवारें अब और वजन सहने की स्थिति में नहीं हैं और ऊपर से गिरते पत्थर हर पल खतरे का संकेत दे रहे हैं। स्थानीय जागरूक लोगों का मानना है कि प्रशासन को केवल वसूली से मतलब है, उन्हें आम आदमी की जान की कोई परवाह नहीं है। लोगों ने दोटूक शब्दों में आगाह किया है कि यदि इस बिल्डिंग का तत्काल तकनीकी मुआयना कर इसे ध्वस्त नहीं किया गया या इसका पूर्ण जीर्णोद्धार नहीं हुआ, तो होने वाली किसी भी जनहानि की पूरी जिम्मेदारी सीधे तौर पर नगर निगम प्रशासन की होगी। जनता अब खोखले आश्वासनों के बजाय सुरक्षा के ठोस कदम चाहती है।










