
उज्जैन। अपनी छत और रोजी-रोटी बचाने की जंग अब सड़कों से निकलकर सत्ता के गलियारों तक पहुँच गई है। इंदिरा नगर चौराहे से हरिफाटक तक के व्यापारियों और रहवासियों ने सोमवार सुबह उस वक्त प्रशासन की नींद उड़ा दी, जब वे सुबह 7 बजे ही मुख्यमंत्री आवास के बाहर जाकर बैठ गए। अनिश्चितता के बीच एक घंटे तक चली प्रतीक्षा के बाद आखिरकार मुख्यमंत्री से मुलाकात हुई। यह मुलाकात उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद की एक किरण है जिनके मकानों और दुकानों पर प्रशासन ने ‘विनाश’ की लाल लकीरें खींच दी थीं। मुख्यमंत्री ने आश्वासन तो दिया है, लेकिन क्या यह आश्वासन वाकई हकीकत बनेगा या केवल आक्रोश को शांत करने का एक राजनीतिक पैंतरा?

एक घंटे के इंतजार के बाद पिघली सत्ता की बर्फ, सीएम ने कहा—होगा पुनर्विचार, मुआवजा या नक्शे में बदलाव पर विचार संभव
मुख्यमंत्री आवास के बाहर जमा हुए व्यापारियों और रहवासियों के चेहरे पर बरसों की मेहनत उजड़ने का खौफ साफ दिख रहा था। करीब एक घंटे के इंतजार के बाद जब मुलाकात का दौर शुरू हुआ, तो पीड़ितों ने अपनी व्यथा मुख्यमंत्री के सामने रखी। व्यापारियों की गुहार सुनने के बाद मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को योजना पर ‘पुनर्विचार’ करने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि यदि योजना आगे बढ़ती है, तो या तो उचित मुआवजा दिया जाएगा या फिर निर्माण के दायरे को कम कर रोड की चौड़ाई घटाई जाएगी ताकि व्यापारियों का कम से कम नुकसान हो।

मुआवजा मिलेगा या ‘छोटा’ होगा रोड? मुख्यमंत्री के दावों के बीच उलझी व्यापारियों की तकदीर।
मुख्यमंत्री की ओर से आए दो प्रमुख विकल्पों ने अब चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। पहला विकल्प ‘उचित मुआवजे’ का है, लेकिन क्या जमीन की वर्तमान बाजार दर के हिसाब से करोड़ों का मुआवजा देना प्रशासन के लिए संभव होगा? दूसरा विकल्प रोड की चौड़ाई कम करने का है। यदि प्रशासन अपनी हठधर्मिता छोड़कर रोड को छोटा करता है, तो निश्चित रूप से व्यापारियों को बड़ी राहत मिलेगी। हालांकि, ये दावे किस हद तक धरातल पर उतरेंगे, यह सबसे बड़ा वैचारिक प्रश्न है। क्या प्रशासन वाकई व्यापारियों के हितों के लिए अपने ‘प्रोजेक्ट’ के डिजाइन में बदलाव करेगा?
‘विकास’ के नाम पर फिर छल तो नहीं? आश्वासन की चाशनी में लिपटी प्रशासनिक तानाशाही पर अब भी संशय।
मुख्यमंत्री के आश्वासन के बाद व्यापारियों में थोड़ी राहत जरूर है, लेकिन संशय अब भी बरकरार है। इतिहास गवाह है कि कई बार बड़े आंदोलनों को दबाने के लिए ऐसे आश्वासन दिए जाते हैं और बाद में ‘तकनीकी कारणों’ का हवाला देकर बुलडोजर चला दिया जाता है। व्यापारियों ने दो टूक कह दिया है कि उन्हें सिर्फ ‘पुनर्विचार’ का आश्वासन नहीं, बल्कि लिखित में ठोस गारंटी चाहिए। अगर मुआवजा और रोड की चौड़ाई कम करने की बात केवल कागजों तक सीमित रही, तो यह आंदोलन मुख्यमंत्री आवास से निकलकर पूरे उज्जैन की सड़कों पर फैल जाएगा।

रेलवे और बस स्टैंड की जमीन का विकल्प अब भी खुला: क्या प्रशासन वाकई गरीबों का आशियाना बचाना चाहता है?
मुलाकात के दौरान भी यह बात प्रमुखता से उठी कि जब रेलवे और बस स्टैंड की सरकारी जमीन उपलब्ध है, तो फिर रिहायशी और व्यावसायिक इलाकों को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है? मुख्यमंत्री के पाले में अब गेंद है—उन्हें यह साबित करना होगा कि उनकी सरकार ‘गरीब और व्यापारी हितैषी’ है। यदि वाकई ‘पुनर्विचार’ की मंशा है, तो प्रशासन को अपने पुराने जिद्दी रुख को छोड़कर जनहित में लचीलापन दिखाना होगा।
आश्वासन से पेट नहीं भरता साहब, फैसला व्यापारियों के हक में होना चाहिए।
मुख्यमंत्री जी, व्यापारियों का भरोसा आपकी बातों पर है, लेकिन उनकी नजरें आने वाले दिनों की प्रशासनिक गतिविधियों पर टिकी हैं। यदि आश्वासन के बाद भी किसी गरीब की दुकान पर हथौड़ा चला, तो यह विश्वासघात होगा। 3000 परिवारों की दुआएं लेनी हैं या बद्दुआएं, यह फैसला अब पूरी तरह सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को करना है। विकास की बलि बेगुनाह व्यापारी नहीं होने चाहिए।










