आज जब मैं सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में कुछ रील देख रहा था, तभी अचानक मेरी नजरों के सामने एक ऐसा वीडियो आया जिसने मेरी धड़कनों को एक पल के लिए थाम दिया। उस वीडियो को देखते ही मेरी आंखें भर आईं और अंतरात्मा से एक आवाज निकली कि यह सिर्फ एक वीडियो नहीं, बल्कि एक बेटे के कलेजे का टुकड़ा है। मेरी कलम ने मुझसे कहा कि यह मर्मस्पर्शी घटना हर उस व्यक्ति तक पहुंचनी चाहिए जो अपनों को खोने के इस दौर से गुजरा हो। फिर क्या था, अवंतिका के युवराज की यह कलम भला पीछे कैसे हटती? मैंने अपनी नम आंखों से गिरते आंसुओं को ही आज स्याही बना लिया है और इस हृदयविदारक समाचार को शब्दों के मोतियों में पिरोकर आपके सामने रख रहा हूं।
घटना एक युवक की हल्दी की रस्म की है। घर के आंगन में मंगल गीत गाए जा रहे थे, सगे-संबंधी दूल्हे को हल्दी लगा रहे थे और चारों तरफ हंसी-ठिठोली का माहौल था। लेकिन इसी बीच एक ऐसा मंजर उभरा जिसने सबको सुन्न कर दिया। बदन पर चढ़ती पीली हल्दी के बीच जैसे ही उस युवक को अपने पिता की कमी का अहसास हुआ, उसका गला भर आया। बिना किसी ताम-झाम या माइक के, अपनी सिसकियों को दबाते हुए उसने रुंधे गले से वे पंक्तियां कहीं जो सीधे रूह को चीरती हुई निकल गईं। उसने रोते हुए कहा कि “मैं कामयाबी की राह में यूं लड़खराता रहा, हर मोड़ पर मैं उनकी कमी को पाता रहा, कामयाबी मिली तो आंखें नम हो गईं, जिसको दिखाना था वह आंखें बंद हो गईं, यूं तो सब हैं खुशी मनाने को, पर जिसको दिखाना था वह नहीं है मुझे गले लगाने को।”
जैसे ही ये शब्द उसके होंठों से निकले, वहां मौजूद हर शख्स का कलेजा मुंह को आ गया। दूल्हे की आंखों से गिरते आंसुओं ने हल्दी के रंग को और भी गहरा और गमगीन कर दिया। वह पल इतना भारी था कि खुशियों का शोर पल भर में खामोशी में बदल गया। सबसे हृदयविदारक दृश्य तब उत्पन्न हुआ जब अपने बेटे को इस तरह टूटते देख उसकी मां के सब्र का बांध टूट गया। मां का वह फूट-फूट कर रोना और बेटे का अपने पिता के साये के लिए तड़पना, वहां मौजूद हर रिश्तेदार की आंखों को सावन की झड़ी की तरह बरसा गया।
सोशल मीडिया पर यह वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है और यह उन तमाम लोगों के जख्मों को हरा कर रहा है जिन्होंने अपने सिर से पिता का साया उठते देखा है। यह समाचार हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि इंसान चाहे कितनी भी बड़ी कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ जाए, चाहे उसके पास दुनिया की हर सुख-सुविधा हो, लेकिन अपने माता-पिता की वो एक शाबाशी और उनका गले लगाना किसी भी कोहिनूर हीरे से कहीं ज्यादा कीमती होता है। अवंतिका के युवराज की यह कलम आज बस यही कहना चाहती है कि दुनिया का हर जश्न उस पिता के बिना अधूरा है, जिसकी उंगली पकड़कर हमने कभी चलना सीखा था।










