अमृतसर। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में 13 अप्रैल की तारीख महज एक कैलेंडर का पन्ना नहीं, बल्कि वह लहू से लिखा गया अध्याय है जिसे याद करते ही आज भी हर देशभक्त का हृदय कांप उठता है और आंखें नम हो जाती हैं। साल 1919 का वह बैसाखी का दिन, जो खुशियों और उमंगों का प्रतीक होना था, अंग्रेजी हुकूमत की बर्बरता के कारण भारतीय इतिहास के सबसे काले और वीभत्स नरसंहार में तब्दील हो गया। अमृतसर का जलियांवाला बाग उस दिन केवल एक मैदान नहीं रह गया था, बल्कि वह एक ऐसी कत्लगाह बन गया था जहाँ निहत्थे, मासूम और बेगुनाह भारतीयों पर ब्रिटिश क्रूरता ने अपनी सारी हदें पार कर दी थीं। आज इतने दशकों बाद भी जब हम उस घटना का स्मरण करते हैं, तो वह मंजर आंखों के सामने जीवंत हो उठता है कि किस तरह जनरल डायर के एक क्रूर आदेश ने हंसते-खेलते परिवारों को हमेशा के लिए खामोश कर दिया था।
उस दिन की त्रासदी का विवरण रोंगटे खड़े कर देने वाला है क्योंकि वहां मौजूद हजारों की भीड़ में शामिल लोग किसी हिंसक आंदोलन के लिए नहीं, बल्कि रौलट एक्ट के विरोध और अपने नेताओं की रिहाई की मांग को लेकर शांतिपूर्ण सभा कर रहे थे। जलियांवाला बाग के उस संकरे रास्ते को जब डायर की फौज ने घेरा, तो वहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता शेष नहीं बचा था। बिना किसी चेतावनी के, बिना किसी पूर्व सूचना के, अंधाधुंध गोलियों की बौछार शुरू कर दी गई जिसने देखते ही देखते पूरे मैदान को लाशों के ढेर में बदल दिया। लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे, मासूम बच्चे अपनी मां की गोद में दम तोड़ रहे थे और बूढ़े-बुजुर्ग उस दीवार को फांदने की नाकाम कोशिश कर रहे थे जो आज भी उन गोलियों के निशानों को अपने सीने पर संजोए खड़ी है।
शहादत का वह मंजर इतना खौफनाक था कि जब बचने का कोई रास्ता नहीं दिखा, तो सैकड़ों लोगों ने मैदान में मौजूद उस गहरे कुएं में छलांग लगा दी, जिसे आज ‘शहीदी कुआं’ कहा जाता है। वह कुआं देखते ही देखते इंसानी जिस्मों से भर गया, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत की बंदूकें तब तक नहीं रुकीं जब तक कि उनका बारूद खत्म नहीं हो गया। सरकारी आंकड़े भले ही कुछ और कहें, लेकिन हकीकत यह थी कि उस दिन हजारों भारतीयों ने अपनी मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दी थी। उस दिन की शाम जब अमृतसर की गलियां खामोश थीं, तब जलियांवाला बाग की मिट्टी अपनों को खोने वालों के विलाप से गूंज रही थी। वह एक ऐसा घाव था जिसने पूरे देश के भीतर सोए हुए ज्वालामुखी को जगा दिया और आज़ादी की लड़ाई को एक नई और उग्र दिशा दे दी।
आज जब हम उस पावन मिट्टी को नमन करते हैं, तो हमें यह अहसास होता है कि हमारी आज़ादी की कीमत कितनी भारी रही है। जलियांवाला बाग के शहीदों का वह बलिदान व्यर्थ नहीं गया, क्योंकि उनके रक्त की हर बूंद ने गुलामी की बेड़ियों को काटने का संकल्प पैदा किया था। आज भी वहां की दीवारों पर मौजूद गोलियों के निशान ब्रिटिश साम्राज्य के उस कलंक की गवाही देते हैं जिसे इतिहास कभी माफ नहीं कर सकता। 13 अप्रैल का दिन हमें बार-बार यह याद दिलाता है कि राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए हमारे पूर्वजों ने किस तरह हंसते-हंसते मौत को गले लगाया था। उन महान आत्माओं की स्मृति में आज पूरा देश नतमस्तक है और यह संकल्प दोहराता है कि उनके बलिदानों की गरिमा को हम युगों-युगों तक सुरक्षित रखेंगे।










