बिजली पेंशनरों के साथ महंगाई राहत के नाम पर सरकारी मजाक!

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“उम्र भर शहर को रोशन किया, अब खुद के बुढ़ापे में अंधेरा!”

58 हजार परिवारों को 3% की खैरात रिकॉर्ड तोड़ महंगाई में कैसे कटेगा बुढ़ापा?

मध्यप्रदेश की विद्युत कंपनियों ने प्रदेश के करीब 59 हजार पेंशनरों के लिए महंगाई राहत (DR) की घोषणा तो कर दी है, लेकिन यह राहत कम और पेंशनरों के जख्मों पर नमक ज्यादा नजर आ रही है। जहाँ बाजार में दाल, तेल और दवाइयों की कीमतें आसमान छू रही हैं, वहाँ सरकार ने 7वें वेतनमान में मात्र 3 प्रतिशत की वृद्धि का झुनझुना थमा दिया है। सरकारी आंकड़ों के भारी-भरकम जाल में उलझाकर यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि खजाना लुटाया जा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि यह मामूली वृद्धि बुजुर्गों के एक दिन की दवाई का खर्च भी पूरा नहीं कर पाएगी।

चुनावी वादों और हकीकत के बीच पिसते ‘बिजली प्रहरी

विद्युत मंडल से 31 मई 2025 तक सेवानिवृत्त हुए उन बुजुर्गों को शामिल करने का दावा किया गया है जिन्होंने अपनी पूरी जवानी प्रदेश को रोशन करने में लगा दी। आज जब उन्हें सहारे की जरूरत है, तब एम.पी. ट्रांसको ने 55% की जगह 58% डीआर देने का आदेश जारी किया है। सवाल यह उठता है कि क्या 3 प्रतिशत की यह ‘मदद’ उस भारी भरकम ओवरड्यू और बिजली बिलों के बोझ को कम कर पाएगी जो खुद विभाग इन पेंशनरों से वसूलता है? सरकार 468 लाख रुपये प्रतिमाह अतिरिक्त व्यय का ढिंढोरा पीट रही है, लेकिन यह नहीं बता रही कि करोड़ों का लाभ कमाने वाली कंपनियां अपने ही रिटायर्ड कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन देने में कंजूसी क्यों कर रही हैं?

80 पार के बुजुर्गों को भी कागजी राहत का झांसा

आदेश में बड़े गर्व से लिखा गया है कि 80 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों को भी अतिरिक्त पेंशन पर यह राहत मिलेगी। लेकिन प्रशासन यह भूल गया कि इस उम्र में स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च किस कदर बढ़ चुका है। ‘पुनरीक्षित महंगाई राहत’ का यह आदेश 1 जनवरी 2026 से प्रभावी होने की बात कही गई है, यानी पिछले महीनों का बकाया और उस पर चढ़ी महंगाई का हिसाब कौन देगा? जब नेताओं के भत्ते और वेतन बढ़ते हैं तो प्रतिशत दहाई के आंकड़ों में होता है, लेकिन जब बात उन पेंशनरों की आती है जो किराए के मकान और किस्तों के बोझ तले दबे हैं, तो सरकार केवल ‘अंश’ की गणना में उलझा देती है।

प्रशंसा बटोरने वाला विज्ञापन या वास्तव में राहत?

जनसंपर्क विभाग ने इसे एक बड़ी सफलता के रूप में पेश किया है, लेकिन धरातल पर पेंशनर इसे केवल ‘कागजी खानापूर्ति’ मान रहे हैं। समर्पण (कम्यूटेशन) से पूर्व की मूल पेंशन पर गणना करने का नियम भी पेंशनरों की जेब काटने का एक और तरीका है। ‘अवन्तिका के युवराज’ सीधे तौर पर सवाल करता है कि क्या यह आदेश केवल वाहवाही लूटने के लिए है या सरकार वास्तव में उन बुजुर्गों का दर्द समझती है जो आज भी अपने हक के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं? बिजली कंपनियों का यह ‘राहत’ वाला करंट पेंशनरों की जेब में उजाला कम और अंधेरा ज्यादा कर रहा है।