करोड़ों का टर्नओवर वीआईपी कल्चर और धूल-धूसरित आम आदमी
उज्जैन विश्व प्रसिद्ध महाकाल लोक बनने के बाद उज्जैन का नाम पूरी दुनिया में चमका है, लेकिन इस चमक के पीछे की कड़वी हकीकत यह है कि शहर का आम नागरिक आज अपने ही शहर में ‘दोयम दर्जे’ का नागरिक बन गया है। जहाँ मंदिर के आसपास की सड़कों पर मखमली अहसास है, वहीं मात्र 500 मीटर की दूरी पर स्थित पुरानी बस्तियों और गलियों में आज भी कीचड़, सीवेज और धूल का साम्राज्य है। प्रशासन का पूरा ध्यान केवल ‘वीआईपी’ प्रोटोकॉल और कॉरिडोर की साज-सज्जा पर है, जबकि उज्जैन का मूल निवासी टूटी सड़कों और बंद पड़े नालों के बीच अपनी किस्मत को रो रहा है।
स्मार्ट सिटी के कागजी दावों और धरातल की खस्ताहाली का सच
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत उज्जैन में सैकड़ों करोड़ रुपये बहाए जा चुके हैं, लेकिन बारिश के मामूली झोंके ही नगर निगम के विकास के दावों की पोल खोल देते हैं। गेबी हनुमान क्षेत्र में मकान गिरना कोई इकलौती घटना नहीं है बल्कि यह उस जर्जर व्यवस्था का प्रतीक है जिसे प्रशासन सड़क चौड़ीकरण के नाम पर बिना सुरक्षा मानकों के खोद रहा है। शहर के मध्य क्षेत्रों में सीवेज लाइन का काम सालों से अधूरा पड़ा है, जिससे गंदा पानी लोगों के घरों की नींव में रिस रहा है। क्या स्मार्ट सिटी का मतलब केवल ‘लाइटिंग और पेंटिंग’ है, या नागरिक सुरक्षा भी इसका हिस्सा है?
पार्किंग का खेल और श्रद्धालुओं से लूट की खुली छूट
बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए उज्जैन अब एक महंगा शहर बनता जा रहा है। अवैध पार्किंग स्टैंड्स और ऑटो चालकों की मनमानी ने शहर की छवि धूमिल की है। प्रशासन द्वारा निर्धारित दरों से कई गुना ज्यादा वसूली सरेआम हो रही है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी एसी कमरों में बैठकर ऑल इज वेल का राग अलाप रहे हैं। स्थानीय व्यापारियों का धंधा भी बेतरतीब ट्रैफिक और प्रशासनिक अव्यवस्था के कारण चौपट हो रहा है। सवाल यह है कि इस भारी-भरकम राजस्व का लाभ उज्जैन के विकास में क्यों नहीं दिख रहा?
स्वास्थ्य और शिक्षा चमचमाते कॉरिडोर के पीछे ‘बीमार अस्पताल
एक तरफ महाकाल लोक की भव्यता है, तो दूसरी तरफ जिला अस्पताल की बदहाली, जहाँ गरीब मरीज स्ट्रेचर और दवाइयों के लिए दर-दर भटकते हैं। सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छिपी नहीं है। प्रशासन का पूरा अमला केवल इवेंट मैनेजमेंट में व्यस्त है। अवन्तिका के युवराज पूछता है कि क्या उज्जैन की पहचान केवल मंदिर तक सीमित रहेगी, या यहाँ के नागरिकों को भी मूलभूत सुविधाएं—जैसे साफ पानी, अच्छी शिक्षा और सुरक्षित घर—मिल पाएंगे?










