कानून को सरेआम चुनौती,अवंतिका के युवराज’ की खबर से बौखलाई कब्जाधारी महिला, IDA का नोटिस फाड़ा, सरकारी ताले पर चलाया हथौड़ा!

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इन्दौर। मूसाखेड़ी स्कीम नंबर 94 में अवैध कब्जे का मामला अब महज़ एक ‘अतिक्रमण’ नहीं, बल्कि ‘जंगलराज’ की पराकाष्ठा बन चुका है। ‘अवंतिका के युवराज’ द्वारा उजागर किए गए इस महा-घोटाले के बाद जब इंदौर विकास प्राधिकरण की टीम ने कार्रवाई की हिम्मत दिखाई, तो कब्जाधारी महिला और उसके गिरोह ने कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए जो तांडव मचाया, उसने प्रशासन के इकबाल पर तमाचा जड़ दिया है। सूचना मिलते ही मौके पर पहुँची टीम द्वारा चस्पा किए गए सरकारी नोटिस को न केवल फाड़कर कचरे के ढेर में फेंक दिया गया, बल्कि दबंगई की सारी हदें पार करते हुए सरकारी संपत्ति पर लगे ताले को सरेआम तोड़ दिया गया। यह सीधा-सीधा शासन-प्रशासन और न्यायपालिका को ठेंगा दिखाने जैसा कृत्य है।



वर्दी और कलम का डर खत्म? सरेराह ‘अवैध’ महिलाओं का हाई-वोल्टेज ड्रामा, डरी सहमी मल्टी!

मल्टी के रहवासियों के मुताबिक, जैसे ही आईडीए की टीम वहां से नोटिस चिपकाकर रवाना हुई, अनिता पटेल और उसके साथ खड़ी अन्य महिलाओं ने ‘अवंतिका के युवराज’ की खबर और सरकारी आदेश के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। प्रशासन के नोटिस को ‘गोभी’ की तरह फाड़कर हवा में उछाल दिया गया, जैसे कि वह कोई कागज का टुकड़ा न होकर आईडीए के सीईओ का आदेश नहीं, बल्कि उनकी जूती की नोक पर हो। इतना ही नहीं, जो ताला प्रशासन ने अपनी मुहर के साथ लगाया था, उसे बेरहमी से हथौड़ों से तोड़ दिया गया। मल्टी की गलियों में सरेआम दी जा रही धमकियों और गाली-गलौज ने शरीफ परिवारों का जीना मुहाल कर दिया है। क्या इंदौर जैसे शहर में अब सरकारी कागजों की कीमत रद्दी के बराबर रह गई है?


सरकारी तंत्र की नपुंसकता या ‘सुपरवाइजर’ की शह? आखिर पुलिस के सामने ताला तोड़ने की हिम्मत कहाँ से आई?

सवाल यह उठता है कि एक अवैध कब्जाधारी महिला में इतनी शक्ति कहाँ से आई कि वह सीधे ‘भारतीय दंड संहिता’ (IPC) की धाराओं वाले नोटिस को फाड़ने का दुस्साहस कर सके? क्या अब भी वही ‘विभीषण’ सुपरवाइजर पर्दे के पीछे से इन्हें ऑक्सीजन दे रहा है? ‘अवंतिका के युवराज’ इस बात की कड़ी निंदा करता है कि जब शासन का आदेश फाड़ा जा रहा था, तब विभाग का जमीनी अमला कहाँ सोया था? सरकारी ताला तोड़ना और नोटिस फाड़ना सीधे तौर पर राजकार्य में बाधा और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का गंभीर अपराध है। यदि आज इन पर रासुका (NSA) जैसी कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो कल कोई भी अपराधी किसी भी सरकारी दफ्तर में घुसकर ताले तोड़ने लगेगा।

अब आर-पार की जंग,अवंतिका के युवराज का प्रशासन से सीधा सवाल—क्या ढह जाएगा अपराधियों का यह अहंकार?

प्रशासन ने 72 घंटे का अल्टीमेटम दिया था, लेकिन कब्जाधारियों ने 1 घंटे में ही जवाब दे दिया है कि उन्हें कानून की कोई परवाह नहीं है। अब गेंद इंदौर विकास प्राधिकरण और पुलिस प्रशासन के पाले में है। क्या सीईओ महोदय इस अपमान को पी जाएंगे या फिर बुलडोजर और पुलिस की भारी टुकड़ी के साथ इस ‘अवैध साम्राज्य’ को मिट्टी में मिलाएंगे? ‘अवंतिका के युवराज’ की पैनी नजर अब इस बात पर है कि क्या इन महिलाओं पर एफआईआर दर्ज कर इन्हें सलाखों के पीछे भेजा जाता है, या फिर प्रशासन अपनी ही बेइज्जती कराकर खामोश बैठ जाएगा। यह लड़ाई अब केवल एक मकान की नहीं, बल्कि इंदौर की कानून व्यवस्था के सम्मान की लड़ाई बन चुकी है।