8वीं पास’ अंगूठा छाप का महा-घोटाला, फर्जी मार्कशीट वाले पंचर पुत्र ने आरटीओ को बनाया अपनी ससुराल, क्या साहबों ने शर्म बेच खाई है?

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देवास। क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय की साख अब सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि दलाली की उन काली गलियों में दफन हो चुकी है जहाँ नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाना बाएं हाथ का खेल बन गया है। ‘अवंतिका के युवराज’ के पास मौजूद तथ्य इस बात की गवाही दे रहे हैं कि कभी चटाई बिछाकर दलाली करने वाला सुभाष पंचर वाला आज पूरे महकमे का अघोषित आका बन बैठा है। जो शख्स कभी किराए के कमरे के लिए तरसता था, आज उसने भ्रष्टाचार की ऐसी सीढ़ी चढ़ी है कि करोड़ों के आलीशान बंगले से वह पूरे सरकारी सिस्टम को अपनी उंगलियों पर नचा रहा है, मानो “अंधेर नगरी चौपट राजा” वाली कहावत यहाँ चरितार्थ हो रही हो।

सरकारी आईडी पर ‘डाका’ और जिम्मेदार अधिकारियों का मौन समर्पण

विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, देवास आरटीओ के जिम्मेदार अधिकारियों ने अपने पद की गोपनीयता को ताक पर रखकर अपनी विभागीय आईडी और पासवर्ड सुभाष के सिंधी कॉलोनी स्थित निवास पर गिरवी रख दिए हैं। वहाँ सुभाष का एक बेहद करीबी साथी, जिसका नाम ‘रूप’ और ‘ऐश’ का संगम (रुपेश) बताया जाता है, दिन-रात कंप्यूटर स्क्रीन पर अपनी उंगलियां चलाकर नई गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन का खेल खेल रहा है। अधिकारियों के मोबाइल पर आने वाले ओटीपी अब सीधे इन निजी कंप्यूटरों तक पहुँच रहे हैं, जिसे देखकर लगता है कि यहाँ “सैयां भए कोतवाल, अब डर काहे का” की तर्ज पर सरकारी गोपनीयता का सरेआम चीरहरण किया जा रहा है। अधिकारियों की यह चुप्पी साबित करती है कि “दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।

चटाई से सोफे तक का सफर, सुख-सुविधाओं की भेंट चढ़ी विभागीय मर्यादा

पुराने जानकारों की मानें तो इसी दफ्तर के बाहर कभी सुभाष जमीन पर चटाई बिछाकर बैठता था, लेकिन आज उसने जिम्मेदारों को ऐसी ‘सुख-सुविधाओं’ का चस्का लगा दिया है कि पूरा महकमा उसके सामने भीगी बिल्ली बना रहता है। कमरा नंबर-2 की चाबी आज भी उसी ‘पंचर वाले’ की जेब में रहती है, जहाँ वह किसी सुल्तान की तरह राजाओं वाली जिंदगी जी रहा है और जिम्मेदार अधिकारी “गुड़ खाएं और गुलगुले से परहेज करें” जैसी स्थिति में रहकर अपनी मर्यादा भूल चुके हैं। खबर का असर होने पर जब एक जिम्मेदार ने पीड़ित को फोन लगाया, तो उनकी बातों से हमदर्दी कम और सुभाष का खौफ ज्यादा छलक रहा था, जिससे साफ है कि “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाला मुहावरा यहाँ पूरी तरह फिट बैठता है।

आगर तक फैला दलाली का जाल, सीमाएं लांघ चुका है भ्रष्टाचार का अजगर

चर्चा तो यहाँ तक है कि इस डिजिटल सिंडिकेट के तार केवल देवास तक सीमित नहीं हैं। सुगबुगाहट है कि पड़ोसी जिले आगर के परिवहन कार्यों की डोर भी इसी सिंधी कॉलोनी वाले ‘कंट्रोल रूम’ से खिंची जा रही है। हालाँकि, ‘अवंतिका के युवराज’ इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं करता, लेकिन “जहाँ धुआँ है वहाँ आग जरूर होगी” वाली बात यहाँ सटीक बैठती है कि एक प्राइवेट व्यक्ति दो-दो जिलों के सरकारी पोर्टल का स्वामी कैसे बन गया? बिना वाहन को देखे, बिना किसी भौतिक सत्यापन के, घर बैठे-बैठे रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी कर दी जाती है, क्योंकि इस सिंडिकेट के लिए “बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपैया” ही एकमात्र सिद्धांत है।

फॉरेंसिक जांच से कतराते साहब, खुद के बेनकाब होने का डर

आज समय की मांग है कि सिंधी कॉलोनी के उस संदिग्ध घर के कंप्यूटरों की तत्काल फॉरेंसिक जांच होनी चाहिए और अधिकारियों की आईडी के लॉग्स खंगाले जाने चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। इससे यह साफ हो जाएगा कि किस समय और किस आईपी एड्रेस से पोर्टल पर लॉगिन किया गया, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी “बगल में छुरी और मुँह में राम-राम” जपते हुए ऐसी जांच से बच रहे हैं। कड़वा सच यह है कि वे खुद इस भ्रष्टाचार की मलाई में डूबे हुए हैं और जांच होने पर उन साहबों के चेहरे भी बेनकाब हो जाएंगे जो सुभाष के साथ मिलकर इस लूट में बराबर के साझीदार हैं। उन्हें डर है कि अगर जांच हुई तो “एक तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी” का उनका यह खेल खत्म हो जाएगा।

पीड़ित की बद्दुआ और ‘पंचर वाले’ का अहंकार, न्याय की घड़ी दूर नहीं

उस गरीब पीड़ित की आँखों से निकले आंसू और उसके परिवार की बद्दुआएं बेकार नहीं जाएंगी क्योंकि “भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं।” 8वीं की फर्जी मार्कशीट के दम पर साम्राज्य खड़ा करने वाला सुभाष भले ही आज खुद को कानून से ऊपर समझ रहा हो, लेकिन “काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती” और अन्याय की नींव पर बनी यह इमारत ज्यादा दिन नहीं टिकेगी। जिम्मेदार अधिकारी जो आज मूकदर्शक बने हुए हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि उनकी चुप्पी भी इस अपराध में बराबर की भागीदारी है। कलम की ताकत अभी खत्म नहीं हुई है, हर उस कड़ी को उजागर किया जाएगा जो सिंधी कॉलोनी के उस ‘भ्रष्टाचार के केंद्र’ को सरकारी दफ्तर से जोड़ती है।