अक्षय नगर का मातम, खाकी की खामोशी और सिस्टम की करंट मारती क्रूरता!

0
3

उज्जैन। मानवता को शर्मसार कर देने वाली एक ऐसी घटना उज्जैन के नानाखेड़ा स्थित अक्षय नगर से सामने आई है, जहाँ एक गरीब मजदूर परिवार की जीवन भर की कमाई को बिजली की चिंगारी ने पल भर में राख के ढेर में तब्दील कर दिया। गिरधारी पिता बोदा जी का परिवार, जो 1 मार्च को अपनी छोटी बेटी के घर हुई गमी में शामिल होने गया था, जब 5 मार्च को वापस लौटा तो उसके पास न घर था, न छत और न ही पेट पालने का कोई सहारा। नीलगंगा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले इस इलाके में प्रशासन की ऐसी संवेदनहीनता देखने को मिली है कि आवेदन देने के बावजूद पुलिस की गाड़ी ने घटनास्थल तक जाने की जहमत तक नहीं उठाई। आखिर उन मासूम बच्चों के बहते आंसुओं का हिसाब कौन देगा, जो आज अपनों के उतरन पहनकर कड़कड़ाती रातों में इंसाफ की भीख मांग रहे हैं?


कसाई बनी वसूली मशीन गरीबों की बिजली काटने में नंबर वन जिम्मेदारी लेने में जीरो विद्युत मंडल!

विद्युत मंडल के खिलाफ जनता का आक्रोश सातवें आसमान पर है। जो विभाग बिल की एक किश्त बकाया होने पर गरीबों के घर का अंधेरा करने के लिए गिद्ध की तरह झपटता है, आज उसी विभाग की जर्जर लाइनों और शॉर्ट सर्किट ने एक हंसते-खेलते परिवार को सड़क पर ला खड़ा किया है। चर्चा है कि यहाँ के वेतनभोगी कर्मचारी एक छोटा सा वायर जोड़ने के भी अवैध पैसे वसूलने से बाज नहीं आते, लेकिन जब उनकी तकनीकी लापरवाही ने एक मजदूर की ₹40,000 की जमा पूंजी और घर का सारा सामान भस्म कर दिया, तो साहबों की जुबान पर ताला लग गया है। क्या गौरव विद्युत मंडल के पास इस बात का जवाब है कि उस मासूम बच्चे के ‘मान’ के लिए जो पैसा एक-एक पाई जोड़कर इकट्ठा किया गया था, उसका हर्जाना कौन भरेगा? क्या गरीबों का खून चूसने वाला यह तंत्र अब इस राख के ढेर की जिम्मेदारी लेगा?

वर्दी का ठंडा खून, जलते घर की राख पर तमाशा देख रही नीलगंगा पुलिस!

किसी भी सभ्य समाज के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि एक पीड़ित व्यक्ति 5 मार्च को अपनी बर्बादी की लिखित शिकायत थाने में दर्ज कराता है, लेकिन पुलिस प्रशासन के पास घटनास्थल देखने तक का वक्त नहीं है। गिरधारी और उनकी पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है, बिस्तर तक जल चुके हैं, तन पर जो कपड़े हैं वो भी दूसरों की खैरात हैं। पुलिस की यह चुप्पी अपराधियों को संरक्षण देने जैसी प्रतीत होती है, क्योंकि जब तक पंचनामा और जांच नहीं होगी, तब तक इस गरीब को सहायता कैसे मिलेगी? रसूखदारों के लिए पलक पांवड़े बिछाने वाली खाकी, एक मजदूर की सिसकियों पर इतनी बहरी कैसे हो गई? क्या खाकी की नैतिकता भी उस आग में जलकर भस्म हो चुकी है?

राख के ढेर पर सुबकता भविष्य, आखिर कब जागेगा सोया हुआ प्रशासन?

आज अक्षय नगर का यह परिवार समाज के प्रतिष्ठित लोगों और शासन-प्रशासन से एक ही सवाल पूछ रहा है—’हमारी खता क्या थी?’ मजदूरी करके, पेट काटकर जो गृहस्थी बनाई गई थी, उसे सिस्टम की लापरवाही निगल गई। पड़ोसियों का कहना है कि आग रात में लगी थी, लेकिन किसी ने फोन तक नहीं किया। अपनों की बेरुखी और सरकारी तंत्र की निर्दयता के बीच यह परिवार आज दाने-दाने को मोहताज है। यदि जल्द ही इस मामले में विद्युत मंडल के दोषी अधिकारियों पर गाज नहीं गिरी और पुलिस ने सक्रियता नहीं दिखाई, तो यह माना जाएगा कि उज्जैन का प्रशासनिक ढांचा पूरी तरह खोखला हो चुका है। अब देखना यह है कि क्या कोई ‘समाज सेवक’ या ‘प्रशासक’ इन बहते आंसुओं को पोंछने आगे आता है या फिर एक और गरीब परिवार सिस्टम की इस आग में घुट-घुट कर दम तोड़ देगा।