खाकी की खाल ओढ़े सो रहा सिस्टम सात महीने से लापता है घर का चिराग, क्या बुझने का इंतजार कर रहा प्रशासन?

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सहजनवा का सन्नाटा दे रहा सत्ता को चुनौती

सहजनवा के वार्ड नंबर 16 में पसरा सन्नाटा अब केवल दुख नहीं, बल्कि गोरखपुर पुलिस की कार्यशैली पर एक खौफनाक तमाचा है। श्यामसुंदर सहल का पुत्र सौरभ सहल 26 सितंबर 2025 को लखनऊ परीक्षा देने गया था, लेकिन वह परीक्षा सिस्टम की संवेदनहीनता की भेंट चढ़ गया या किसी साजिश का शिकार हुआ, इसका जवाब देने वाला कोई नहीं है। आज 17 अप्रैल 2026 की तारीख गवाह है कि सात महीनों से एक परिवार हर रोज अपनी मौत मर रहा है। पिता की पथराई आंखें और बहन का करुण क्रंदन चीख-चीख कर पूछ रहा है कि आखिर आधुनिक पुलिसिंग का दावा करने वाला महकमा एक मोबाइल लोकेशन तक क्यों नहीं खंगाल सका?
आधुनिक सर्विलांस का ढोल हुआ पूरी तरह फुस्स
पुलिस प्रशासन आखिर किस बात की देर कर रहा है और उसकी जांच का पहिया किस दलदल में फंसा है? 26 सितंबर की रात 8:30 बजे सौरभ ने अंतिम बार बात की थी कि वह भोजन कर स्टेशन जा रहा है, उसके बाद से उसका मोबाइल बंद होना और आज तक सुराग न मिलना पुलिस की घोर लापरवाही को उजागर करता है। क्या सर्विलांस और साइबर सेल केवल कागजों पर शेर हैं? सात महीने का समय कम नहीं होता, लेकिन सहजनवा थाना अध्यक्ष की ‘तहरीर मिली है’ वाली रटी-रटाई दलील उस बेबस पिता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी है।
बहन की सिसकियां और पुलिस का ठंडा रवैया
एक बहन का अपनी कलाई के लिए भाई को मांगना पत्थर को भी पिघला दे, लेकिन गोरखपुर के रसूखदार महकमे के दिल में शायद संवेदना का कतरा तक नहीं बचा है। “मेरे भाई की कलाई ला दो” यह पुकार आज हवाओं में गूंज रही है, मगर सत्ता के मद में चूर जिम्मेदार लोग शायद किसी अनहोनी की खबर का इंतजार कर रहे हैं। जिस परिवार का जवान बेटा गायब हो, उस घर के चूल्हे की आग भी अब आंसुओं से बुझ चुकी है। यह समाचार नहीं, बल्कि उन हुक्मरानों की सोई हुई आत्मा को जगाने के लिए एक तीखा प्रहार है जो जनता की सुरक्षा के नाम पर भारी-भरकम वेतन डकार रहे हैं।

अगर आज पुलिस जागृत होती और सक्रियता दिखाई होती, तो सौरभ आज अपने परिवार के बीच होता। हर मिनट की देरी पुलिस की विफलता की कहानी लिख रही है। अब यह केवल गुमशुदगी का मामला नहीं रहा, बल्कि यह लड़ाई उस व्यवस्था के खिलाफ है जो आम आदमी को कीड़ा-मकौड़ा समझकर छोड़ देती है। पुलिस प्रशासन को यह कान खोलकर सुन लेना चाहिए कि एक परिवार के चिराग को बुझाने की साजिश या लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सौरभ की सुरक्षित वापसी ही अब इस आक्रोश को शांत कर सकती है, वरना जनता की अदालत में जवाबदेही तय होना निश्चित है।