सड़क से सोशल मीडिया तक गूंजी छात्रों की आवाज: पेपर लीक और बिगड़ी शिक्षा व्यवस्था पर सलमान खान ने तोड़ी चुप्पी, क्या तंत्र से सवाल पूछना ही बन गया है गुनाह?

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विशेष रिपोर्ट (अवंतिका के युवराज/उज्जैन)। देश के भविष्य यानी नौजवान छात्रों का गुस्सा अब केवल परीक्षा केंद्रों या किताबों के पन्नों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह व्यवस्था की दीवारों को झकझोर रहा है। पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में धांधली और चरमराती शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ देश का शिक्षित युवा वर्ग पिछले कई दिनों से राजधानी के जंतर-मंतर पर डटा हुआ है। कड़कड़ाती धूप और भूख-प्यास के बीच अपनी जायज मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे इन छात्र-छात्राओं का आंदोलन अब एक राष्ट्रव्यापी जनांदोलन का रूप ले चुका है। इसी कड़ी में बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान ने भी अपनी चुप्पी तोड़ते हुए सोशल मीडिया के जरिए छात्रों का पुरजोर समर्थन किया है, जिससे इस आंदोलन को और मजबूती मिली है।
शिक्षा और छात्रों के मुद्दे को राजनीतिक रंग न दें: सलमान खान की दोटूक टिप्पणी


फिल्म अभिनेता सलमान खान ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर पोस्ट साझा करते हुए छात्रों के इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए लिखा कि एक शांतिपूर्ण आंदोलन का हिंसक रूप लेना अत्यंत दुखद है, और उनकी संवेदनाएं प्रभावित छात्रों व उनके परिजनों के साथ हैं। सलमान खान ने जोर देकर कहा कि पेपर लीक एक बेहद गंभीर समस्या है और यह देखकर गर्व होता है कि देश का युवा एक बेहतर शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए एकजुट हुआ है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा पूरी तरह से विद्यार्थियों और शिक्षा व्यवस्था के बीच का है, इसे राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। सलमान खान ने उम्मीद जताई कि सरकार छात्रों की जायज मांगों पर सकारात्मक निर्णय लेगी और भारत को एक ऐसा वैश्विक शैक्षिक केंद्र बनाएगी जहां पूरी दुनिया से लोग पढ़ने आएं।
जंतर-मंतर पर सत्याग्रह और सियासत: हक मांगने पर मिला टुकड़े-टुकड़े गैंग का ठप्पा?

जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को लेकर अड़े विद्यार्थियों का आरोप है कि लोकतंत्र में अपनी ही चुनी हुई सरकार से सवाल पूछना आज सबसे बड़ा जोखिम बन गया है। जब छात्र भूख-प्यास सहकर शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने, निष्पक्ष जांच कराने और पीड़ित परिवारों के लिए न्याय व उचित मुआवजे की मांग कर रहे हैं, तो सत्ता पक्ष के कुछ घटकों और कतिपय संगठनों द्वारा उन पर “टुकड़े-टुकड़े गैंग” या “विदेशी फंडिंग से संचालित गिरोह” जैसे गंभीर और अनर्गल आरोप मढ़े जा रहे हैं। अवंतिका के युवराज की विशेष पड़ताल में यह बात सामने आई है कि जब भी युवा अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं, तो प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में उस आंदोलन की दिशा मोड़ने के प्रयास शुरू हो जाते हैं।

सबसे विचारणीय बिंदु यह है कि जब विपक्ष के नेता या अन्य दलों के प्रतिनिधि अपनी दलीय प्रतिबद्धताओं को दरकिनार कर छात्रों के बीच पहुंचे, तो पूरे घटनाक्रम को ‘राजनीतिक साजिश’ करार देकर मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने का प्रयास किया गया। सवाल यह उठता है कि जिस जनता ने वोट देकर जनप्रतिनिधियों को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाया, क्या उसी जनता और युवाओं का सवाल पूछना देशद्रोह या आतंकवाद की श्रेणी में आता है?
कागजों में सिमटता विकास और मुख्यधारा मीडिया की खामोशी पर उठे गंभीर सवाल

छात्रों का यह विरोध केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नीतिगत विफलताओं के खिलाफ सुलगता हुआ आक्रोश है। स्वास्थ्य और शिक्षा—जो किसी भी राष्ट्र की बुनियादी रीढ़ होते हैं—उनकी जमीनी हकीकत आज किसी से छिपी नहीं है। उदाहरण के तौर पर, मध्य प्रदेश के औद्योगिक शहर इंदौर में वर्षों पहले बड़े-बड़े अस्पतालों के निर्माण के दावे किए गए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर आज भी बंजर जमीनें और अधूरे कागजी प्रोजेक्ट्स ही नजर आते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया की भूमिका पर भी गहरे सवाल खड़े हो रहे हैं। अवंतिका के युवराज समाचार पत्र सदैव निष्पक्षता और जन सरोकार की पत्रकारिता के लिए कटिबद्ध रहा है। आरोप लग रहे हैं कि मुख्यधारा के टीवी चैनल्स और विज्ञापन संचालित मीडिया घराने छात्रों के इस वास्तविक दर्द और शांतिपूर्ण सत्याग्रह को प्रमुखता से दिखाने के बजाय सत्ता के सुर में सुर मिला रहे हैं। जब मुख्यधारा की मीडिया अपनी जिम्मेदारी से भटकती है, तब देश के प्रबुद्ध नागरिक, पूर्व मुख्यमंत्री और फिल्मी हस्तियां सोशल मीडिया के जरिए अपनी आवाज बुलंद करने पर मजबूर होती हैं।
नैतिक जवाबदेही और सुधार का समय: आश्वासनों के परे अब ठोस कार्रवाई की दरकार

कानूनशास्त्र और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुसार, जन-आक्रोश को दबाना या बल प्रयोग कर तितर-बितर करना किसी समस्या का स्थाई समाधान नहीं है। यदि देश का युवा वर्ग इतने व्यापक स्तर पर सड़कों पर उतरकर व्यवस्था परिवर्तन और इस्तीफे की मांग कर रहा है, तो सरकार को इसे अपनी प्रतिष्ठा का विषय बनाने के बजाय आत्ममंथन करना चाहिए।

लोकतंत्र में जनता और युवाओं की आवाज ही सर्वोपरि होती है। सरकार को चाहिए कि वह छात्रों के प्रतिनिधियों से सीधा संवाद स्थापित करे, धांधली में शामिल दोषियों पर नकेल कसे, प्रभावित परिवारों को उचित आर्थिक राहत दे और शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी बनाए। जब तक व्यवस्था की इस गहरी खराबी का जड़ से इलाज नहीं होगा, तब तक युवाओं का यह वैचारिक संघर्ष थमने वाला नहीं है।