इलाज के दौरान दूसरे भाई की मौत से मातम में बदला शहर, निष्पक्ष जांच व पक्षपात के आरोपों के बीच उलझी पुलिस

उज्जैन। नीलगंगा थाना क्षेत्र स्थित दरबार फूड रेस्टोरेंट के सामने शनिवार रात करीब 11 बजे हुई सरेराह खूनी वारदात ने अब दोहरे हत्याकांड का भयावह रूप ले लिया है। पासी और गोरकर परिवार के बीच बीते होली के त्योहार से सुलग रही रंजिश में शनिवार देर रात ताबड़तोड़ चार राउंड फायरिंग, लाठी-डंडों, तलवारों और पत्थरों से जानलेवा हमला हुआ था। इस हिंसक झड़प में छोटे भाई लोकेश गोरकर की गोली लगने से मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई थी, जबकि गंभीर रूप से घायल बड़े भाई जय गोरकर ने भी रविवार सुबह निजी अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी भारी बल के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी नरेश पासी को शॉर्ट एनकाउंटर के बाद गिरफ्तार कर लिया है। इसके साथ ही उसकी निशानदेही पर लोकेश, राकेश, बंटी और मंजू बाई सहित कुल 5 आरोपियों को हिरासत में लिया जा चुका है, जबकि सन्नी, रोशन और दुर्गेश की सरगर्मी से तलाश जारी है। दो सगे भाइयों की मौत के बाद परिवार में अब केवल उनकी बुजुर्ग मां बची हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में शोक और भारी आक्रोश का माहौल है।

अपराध और उत्पीड़न के बीच फंसा न्याय, क्या पुलिसिया अनसुनी और एकतरफा रुख ने दिया हिंसक टकराव को जन्म?
इस दोहरे हत्याकांड के बाद जब मीडिया टीम ने घटनास्थल और आसपास के रहवासियों से निष्पक्ष चर्चा की, तो मामले की एक बेहद संवेदनशील और चौकाने वाली पृष्ठभूमि निकलकर सामने आई। स्थानीय लोगों के अनुसार, जिस पक्ष पर आज इस जघन्य हत्याकांड को अंजाम देने का संगीन आरोप है, उनके घर की नाबालिग/युवती को फरियादी पक्ष से जुड़ा एक युवक काफी समय से मानसिक रूप से परेशान कर रहा था।
क्षेत्रवासियों की मानें तो अपनी बेटी और परिवार की मर्यादा की रक्षा के लिए यह पक्ष पिछले करीब एक साल से लगातार पुलिस थाने के चक्कर काट रहा था। परंतु, न्यायशास्त्र के समक्ष सबसे दुखद पहलू यह रहा कि जब भी यह परिवार अपनी गुहार लेकर थाने पहुंचता, उल्टा इन्हीं के खिलाफ मुकदमे दर्ज कर दिए जाते थे। पुलिस का यह पूर्वाग्रहग्रस्त रवैया कथित तौर पर आरोपियों के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड के कारण था। यदि कोई व्यक्ति अतीत में किसी अपराध में लिप्त रहा हो, तो क्या तंत्र उसे सुधरने का मौका देने के बजाय उसकी जायज शिकायतों को भी नजरअंदाज करता रहेगा? कानूनविदों का स्पष्ट मानना है कि जब पीड़ित की सुनवाई के सारे वैधानिक रास्ते बंद हो जाते हैं, तो यही अनसुनी आगे चलकर ऐसे आत्मघाती और हिंसक विस्फोट का रूप ले लेती है।

राजनीतिक रसूख और प्रशासनिक उदासीनता के बीच पिसा कानून का इकबाल
आसपास के लोगों द्वारा दबी जुबान में यह बात बार-बार दोहराई जा रही है कि फरियादी पक्ष के राजनीतिक प्रभाव और सत्ता से जुड़ाव के कारण पुलिस दूसरे पक्ष (जो पूर्व में खुद प्रताड़ित होने का दावा कर रहा था) की जायज शिकायतों को लगातार ठंडे बस्ते में डालती रही। बताया जाता है कि फायरिंग की पूर्व घटनाओं की शिकायत करने पर भी पुलिस ने साक्ष्य लाने के नाम पर उन्हें टाल दिया, जिससे उनका प्रशासनिक व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह उठ गया।
न्यायालयीन सिद्धांतों के अनुसार, पुलिस प्रशासन का दायित्व केवल घटना घटने के बाद हथियार जब्त करना या एनकाउंटर करना ही नहीं है, बल्कि अपराध की जड़ और शुरुआती शिकायतों पर निष्पक्षता से वैधानिक कदम उठाना है। यदि नीलगंगा पुलिस ने एक साल पहले मिली शिकायतों पर बिना किसी राजनीतिक या पूर्व-ग्रह के दबाव के निष्पक्ष जांच की होती, तो आज दो-दो युवाओं की असमय बलि न चढ़ती और न ही कई जिंदगियां सलाखों के पीछे पहुंचतीं।

दोषियों को मिले कठोरतम सजा, लेकिन व्यवस्था को भी करना होगा गहरा आत्ममंथन
एक जिम्मेदार और निष्पक्ष समाचार पत्र के रूप में हमारा यह स्पष्ट मानना है कि दो सगे भाइयों की हत्या एक अत्यंत जघन्य और अक्षम्य अपराध है। जो लोग आज कानून हाथ में लेकर हत्या के आरोपी बने हैं, उन पर भारतीय न्याय संहिता के तहत कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए और उन्हें अदालत से सख्त सजा मिलनी चाहिए।
लेकिन इसके साथ ही यह घटना पुलिस तंत्र को भी एक कड़ा सबक देती है। पुलिस को यह समझना होगा कि केवल बड़े हादसों के बाद जागना और बुलडोजर या एनकाउंटर जैसी तात्कालिक कार्रवाइयों से वाहवाही लूटना ही कानून-व्यवस्था की बहाली नहीं है। जब तक थाने की चौखट पर आने वाले हर नागरिक—चाहे उसका अतीत कैसा भी हो—की बात को निष्पक्षता से नहीं सुना जाएगा, तब तक समाज में अपराध का यह काला चक्र रुकने वाला नहीं है।










