शासकीय बाल गृह की सुरक्षा व्यवस्था तार-तार, कड़े पहरे को धता बताकर फिर फरार हुआ मासूम, कागजी दावों के बीच 2026 में चौथी बार दागदार हुई विभाग की साख

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उज्जैन। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा संचालित शासकीय बाल गृह (बालक) एक बार फिर बच्चों की सुरक्षा और बेहद लचर प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में आ खड़ा हुआ है। सुरक्षा के बड़े-बड़े और खोखले दावों के बीच कुछ दिन पूर्व इस अति-संवेदनशील सरकारी संस्था से एक और मासूम बालक के रहस्यमयी ढंग से भागने की सनसनीखेज खबर सामने आई है। इस साल 2026 में यह चौथी बार है जब इस गृह से बच्चे फरार होने में कामयाब रहे हैं। यह बार-बार दोहराई जा रही लापरवाही सीधे तौर पर यह दर्शाती है कि जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर विषय को लेकर कितने उदासीन और बेपरवाह बने हुए हैं।

सुरक्षा के कड़े पहरे के बीच गायब हुआ मासूम, कागजों में सिमटी सुरक्षा व्यवस्था और दावों की खुली पोल

इस पूरे घटनाक्रम ने विभागीय कार्यप्रणाली के ऊपर एक बहुत बड़ा और तीखा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। बताया जा रहा है कि यह बच्चा पूरी तरह से नाबालिग था और वह पहले कभी भी इस संस्था या इस क्षेत्र में नहीं आया था। ऐसे में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह उठता है कि जो बच्चा यहां के रास्तों और भूगोल से पूरी तरह अनजान था, वह इतनी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था और तैनात अमले को चकमा देने में आखिर कैसे कामयाब हो गया? यह घटना साफ तौर पर बयां करती है कि बाल गृह की सुरक्षा को लेकर किए जाने वाले ऊंचे-ऊंचे दावे जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं और केवल कागजों पर ही चमकते दिखाई देते हैं। जब संस्था के भीतर ही बच्चे सुरक्षित नहीं हैं, तो बाहर की दुनिया में उनके साथ क्या न्याय होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

लापरवाही पर पर्दा डालने का खेल, जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते जिम्मेदार, एक-दूसरे पर बात टालने की मची होड़

इस बेहद संवेदनशील मामले में सबसे ज्यादा हैरान कर देने वाला रवैया संस्था के शीर्ष अधिकारियों का सामने आया है। हमारे बेहद गहरे और विश्वसनीय सूत्रों से मिली प्रामाणिक जानकारी के अनुसार, जब इस पूरी घटना की सच्चाई जानने के लिए विभाग के लोकेंद्र सिंह सोलंकी से संपर्क साधा गया, तो उन्होंने सीधे तौर पर बात को घुमाते हुए संस्था अधीक्षक महताब सिंह परस्ते से बात करने की सलाह दे डाली। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इस विषय की पूरी जानकारी अधीक्षक महताब सिंह परस्ते साहब से ही ली जाए, क्योंकि वे वर्तमान में अपने बच्चों के उपचार के सिलसिले में बाहर हैं।

परंतु प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि सच्चाई कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। सूत्र बताते हैं कि जब मामले की गंभीरता को लेकर अधीक्षक महताब सिंह परस्ते को कई बार फोन मिलाया गया, तो उन्होंने अवकाश के दिनों की अपनी व्यक्तिगत व्यस्तताओं को प्राथमिकता देते हुए पत्रकारों के फोन उठाना तक जरूरी नहीं समझा। हैरानी की बात यह है कि इस बच्चे को वापस लाकर समिति के समक्ष पेश करने की विधिक प्रक्रिया में ये दोनों ही जिम्मेदार अधिकारी खुद व्यक्तिगत रूप से उपस्थित थे। इसके बावजूद, अब मीडिया के तीखे सवालों के सामने एक-दूसरे पर बात टालकर ये अधिकारी आखिर क्या साबित करना चाहते हैं? जनता और समाज के प्रति जवाबदेही से इस तरह मुंह मोड़ना प्रशासनिक शिथिलता की पराकाष्ठा है।

साख बचाने के लिए आनन-फानन में ढूंढ कर लाए बच्चा, बड़ा सवाल—यही अप्रिय घटना हो जाती तो क्या जवाब देते जिम्मेदार?

जैसे ही संस्था से नाबालिग बच्चे के फरार होने की खबर उच्च अधिकारियों तक पहुंची, विभाग में हड़कंप मच गया था। अपनी साख और नौकरी बचाने की जद्दोजहद में जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी तुरंत सक्रिय हुए। आनन-फानन में बच्चे की खोजबीन की गई और उसे ढूंढकर वापस लाया गया। इसके बाद बच्चे को बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश कर कागजी औपचारिकताएं पूरी की गईं और सुरक्षित होने का दावा किया गया।

लेकिन इस पूरी कवायद के बीच एक बेहद डरावना और बुनियादी सवाल यह उठता है कि जब वह मासूम बच्चा बाहर अकेला भटक रहा था, उस दौरान यदि उसके साथ कोई गंभीर या अप्रिय अनहोनी घटित हो जाती, या कोई असामाजिक तत्व उसे अपना शिकार बना लेता, तो यह लापरवाह जिम्मेदार अधिकारी उसके परिवार और कानून को क्या जवाब देते? क्या किसी मासूम की जान की कीमत इतनी सस्ती है कि उसे बार-बार व्यवस्था की लापरवाही की वेदी पर चढ़ा दिया जाए?

न्यायशास्त्रीय और सामाजिक दृष्टिकोण,कड़े प्रशासनिक रिमांड और सप्लायर नेटवर्क की जांच जैसी सख्ती की है दरकार

एक सजग समाज और वरिष्ठ अधिवक्ताओं के कानूनी दृष्टिकोण से देखा जाए, तो बाल गृह जैसी संवेदनशील संस्थाओं में बार-बार ऐसी घटनाओं का होना केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि किशोर न्याय अधिनियम के बुनियादी सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है। बुद्धिजीवियों का मानना है कि इस मामले में केवल छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराकर इतिश्री नहीं की जानी चाहिए।

इस गंभीर लापरवाही के लिए जिम्मेदार उच्च पदस्थ अधिकारियों से विभागीय स्तर पर कड़ी और सघन पूछताछ होनी चाहिए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या इस लापरवाही के पीछे कोई अंदरूनी सांठगांठ या कोई बड़ा नेटवर्क तो काम नहीं कर रहा है। जब तक व्यवस्था की इस गहरी लापरवाही की जड़ पर कड़ा प्रहार नहीं होगा, तब तक शासकीय बाल गृहों से बच्चों का गायब होना बंद नहीं होगा। महिला एवं बाल विकास विभाग को अब कागजी खानापूर्ति छोड़कर जमीनी स्तर पर कड़े विधिक और सुरक्षात्मक कदम उठाने होंगे, ताकि अवंतिका नगरी की इस प्रतिष्ठित संस्था पर लगा यह दाग हमेशा के लिए साफ हो सके।