सरहद पर मुस्तैद जवान… मंदसौर में बेबस परिवार

मंदसौर। चिराग तले अंधेरा और पर उपदेश कुशल बहुतेरे वाली कहावतें आज मंदसौर पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर पूरी तरह सटीक बैठती हैं। देश की सरहद पर, जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर जैसे सबसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण इलाके में ऑन-ड्यूटी तैनात देश के रक्षक, सब इंस्पेक्टर (कमांडो) मोहनलाल आर्य आज गहरे मानसिक तनाव में हैं। तनाव सरहद का नहीं, बल्कि अपने पैतृक गांव नैनौरा (तहसील मल्हारगढ़) में गुंडों और दबंगों के खौफ के साए में जी रहे अपने परिवार का है। पूरी दुनिया मानसून की आमद के बाद खेतों में खुशी-खुशी बोनी कर रही है, लेकिन देश के इस सिपाही की पत्नी आज दबंगों की गुंडागर्दी के कारण अपनी खुद की 5 बीघा जमीन पर बीज बोने के लिए तरस रही है।
उज्जैन में जो सिंघम थे, वे मंदसौर के कप्तान बनकर मौन क्यों हैं?
उज्जैन में एडिशनल एसपी के पद पर रहते हुए जिन अधिकारी ने गुंडों और बदमाशों की रीढ़ तोड़कर खूब वाहवाही लूटी थी, आज वही साहब मंदसौर जिले के पुलिस अधीक्षक की कमान संभाल रहे हैं। मंदसौर के कप्तान साहब की कड़क छवि के चर्चे पूरे प्रदेश में हैं, लेकिन सवाल यह है कि आखिर क्या वजह है कि एक पीड़ित सैनिक की पत्नी को न्याय के लिए उनकी चौखट पर बार-बार एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है? बीते 16 जून 2026 को खुद पीड़िता निर्मला बाई ने एसपी साहब की जनसुनवाई में पहुंचकर अपनी जान-माल की सुरक्षा और खेती करने के लिए लिखित आवेदन दिया था। परंतु, दिन बीत जाने के बाद भी स्थानीय पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा देना तो दूर, सुध तक नहीं ली। साहब, सैनिक की पत्नी आपके आश्वासन की आस में कब तक भटकती रहेगी?
“हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े-लिखे को फारसी क्या”—नारायणगढ़ कोर्ट के आदेश को भी ठेंगा
पीड़िता निर्मला बाई की यह जमीन कोई विवादित जमीन नहीं है। खसरा नंबर 49/4, 54/1, 57/2/2 (कुल रकबा 123 आरी यानी 5 बीघा) की इस पुश्तैनी कृषि भूमि का केस वे बकायदा नारायणगढ़ कोर्ट से जीतकर मालिकाना हक प्राप्त कर चुकी हैं। पूर्व में राजस्व विभाग द्वारा सीमांकन (नापती) कर जेसीबी मशीन से खाई भी खुदवाई गई थी और 18 नवंबर 2025 को तत्कालीन एसडीएम और टीआई की मौजूदगी में राजीनामा भी हुआ था। लेकिन कानून के रक्षकों की सुस्ती को देखकर गांव के ही कुछ नामजद आरोपी—गोवर्धन लाल, देवीलाल, रामनिवास और अन्य—नारायणगढ़ कोर्ट के आदेश और शासकीय निर्देशों को ठेंगा दिखा रहे हैं। “जाको राखे साइयां मार सके न कोय” की आस में जी रही महिला को सरेआम गाली-गलौज, मारपीट और जान से मारने की धमकियां दी जा रही हैं।
सरहद से फौजी का दर्द “साहब, पूरे गांव में बोनी हो गई, मेरे खेत खाली पड़े हैं!”
श्रीनगर बॉर्डर पर माइनस डिग्री तापमान और दुश्मनों की गोलियों के बीच खड़े कमांडो भाई ने सरहद से सीधे संदेश भेजकर अपनी पीड़ा व्यक्त की है। जवान का कहना है कि “साहब, मैं जम्मू-कश्मीर में देश की रक्षा में तैनात हूँ। मैंने 16 जून 2026 को ही एसपी साहब को आवेदन दिलवाया था। गांव के सभी किसानों की बोनी हो चुकी है, लेकिन प्रशासन की मदद न मिलने के कारण मेरे खेत खाली पड़े हैं। कृपया मेरे परिवार की रक्षा करें।” यह संदेश पढ़कर क्या मंदसौर प्रशासन का दिल नहीं पसीजता? देश का जवान वहां सरहद पर इसलिए खड़ा है ताकि देश का आम नागरिक चैन की नींद सो सके, लेकिन यहाँ उसके खुद के परिवार को गुंडों के डर से नींद नसीब नहीं हो रही है।
“गेहूं के साथ घुन भी पिसता है”—क्या गुंडों के रसूख के आगे बेबस है पुलिस?
स्थानीय पिपलिया मंडी पुलिस की सुस्ती का आलम यह है कि पुलिस के आते ही आरोपी झूठ बोलकर पल्ला झाड़ लेते हैं और पुलिस के जाते ही फिर से गुंडागर्दी और वसूली का जाल फैला देते हैं। दबंगों की इस हरकतों के कारण फौजी के परिवार को हर साल 2 लाख रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। अब जनता यह पूछ रही है कि जो पुलिस आम अपराधियों पर बुलडोज़र चलाने और कड़क कार्रवाई का दावा करती है, वह इन नामजद दबंगों पर कानूनी हंटर चलाने में इतनी ढील क्यों दे रही है? क्या रक्षक ही भक्षकों को अप्रत्यक्ष संरक्षण दे रहे हैं?
अब देखना यह है कि उज्जैन के पूर्व सिंघम और वर्तमान मंदसौर एसपी साहब इस फौजी भाई के संदेश और उसकी बेबस पत्नी की पुकार पर क्या कड़ा एक्शन लेते हैं। क्या देश की रक्षा करने वाले के परिवार को अपनी ही जमीन पर खेती करने का हक मिलेगा, या फिर गुंडों के आगे सिस्टम इसी तरह लाचार बना रहेगा? समझदार को इशारा ही काफी है, यदि देश के जवान का परिवार सुरक्षित नहीं, तो व्यवस्था का इक़बाल पूरी तरह से ध्वस्त माना जाएगा।










