उज्जैन। “खोदा पहाड़, निकली चुहिया” और “हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और”—ये कहावतें आज नगर पालिक निगम उज्जैन की कार्यप्रणाली पर शत-प्रतिशत सटीक बैठती हैं। बीते दिनों जयसिंहपुरा स्थित मां पीताम्बरा होटल रेजिडेंसी में ऑन-ड्यूटी प्रभारी फायर अधिकारी लक्ष्मण प्रसाद साहू को सरेआम 4 चांटे मारना और उनका शासकीय वायरलेस सेट तोड़ना होटल संचालक के रसूखदार बेटे विजेंद्र सिंह उर्फ विकास आरोण्या को कितना ‘महंगा’ पड़ा, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नगर निगम का पूरा अमला बुलडोज़र और लश्कर लेकर मौके पर तो पहुंचा, लेकिन 3 घंटे के हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद बिना कोई बड़ा एक्शन लिए बैरंग वापस लौट आया।
भूल सुधार या प्रशासनिक विफलता? केवल झुनझुना थमाकर शांत हुआ अमला
पूर्व में ऐसा प्रतीत हो रहा था कि अपने साथी अधिकारी पर हुए हिंसक हमले से आक्रोशित होकर नगर निगम इस बार “ईंट का जवाब पत्थर से” देगा और अवैध निर्माण को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर देगा। परंतु, धरातल पर जो हुआ, उसने नगर निगम की बची-कुची साख को भी मिट्टी में मिला दिया। अतिक्रमण हटाने गई गैंग ने केवल औपचारिकता निभाते हुए होटल को सील कर दिया और अपने ही कर्मचारियों का मन समझाने वाली एक मामूली कार्रवाई करके वापस लौट आई। सवाल यह उठता है कि आखिर पर्दे के पीछे ऐसी कौन सी गोटियां फिट हुईं, जिससे नगर निगम के बड़े-बड़े सूरमाओं के हौसले पस्त हो गए? आखिर रसूखदारों ने निगम के आला अधिकारियों को ऐसी कौन सी जड़ी-बूटी पिला दी या कौन सा ‘झुनझुना’ हाथ में थमा दिया कि वे भारी-भरकम बुलडोज़र खड़ा रखकर मूकदर्शक बने रहे?
वह बाल सुधार गृह के बेसहारा बच्चे नहीं थे, पर यहाँ तो तंत्र ही लाचार निकला!
आरोपी महोदय शायद इस मुगालते में थे कि वे अपनी कुर्सी और रसूख के दम पर किसी को भी अपनी जागीर समझकर प्रताड़ित कर सकते हैं। वे भूल गए थे कि यह बाल सुधार गृह (सम्प्रेषण गृह) के वो बेजुबान, लाचार और बेसहारा मासूम बच्चे नहीं थे, जिन्हें बंद कमरों में बेरहमी से डराया-धमकाया जाता था। यहाँ सड़क पर उनका सामना एक जिम्मेदार सरकारी अमले से था। लेकिन अफ़सोस, जिस नगर निगम के कंधे पर पूरे शहर की सुरक्षा और कानून का इक़बाल बुलंद रखने का जिम्मा है, उसके खुद के अधिकारी को बीच सड़क पर जोरदार तमाचा मारा गया, और यह महकमा अपमान का कड़वा घूंट पीकर बिना किसी बड़ी तोड़फोड़ के उल्टे पैर वापस आ गया। “थूककर चाटना” किसे कहते हैं, यह आज उज्जैन की जनता ने प्रशासनिक अमले की इस घुटने टेकने वाली कार्रवाई में साफ़ देख लिया।
आखिर किसका आशीर्वाद बचा रहा है इस अवैध साम्राज्य को?
शहर के प्रबुद्ध वर्ग के बीच आज यह तीखा सवाल तैर रहा है कि आखिर ऐसा कौन सा ‘अदृश्य वीतो’ या राजनीतिक आशीर्वाद है, जिसके आगे नगर निगम की बड़ी-बड़ी मशीनें और कड़क तेवर ढीले पड़ गए? जो नगर निगम आम जनता के छोटे-मोटे अतिक्रमणों पर पल भर में पीला पंजा चला देता है, वही निगम एक ऑन-ड्यूटी क्लास-2 स्तर के अधिकारी के सम्मान की रक्षा करने में इतना लाचार क्यों दिखाई दिया? 3 घंटे तक चले इस पूरे नाटक ने यह साफ़ कर दिया है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
नगर निगम द्वारा की गई यह दिखावे की सीलिंग की कार्रवाई केवल जनता की आंखों में धूल झोंकने और मामले को रफा-दफा करने का एक प्रशासनिक पैंतरा मात्र है। जब तक एक ऑन-ड्यूटी कर्मचारी पर हाथ उठाने वाले इस तथाकथित माननीय के अवैध निर्माण पर वास्तविक हथौड़ा नहीं चलता और उसे जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, तब तक व्यवस्था का इक़बाल कभी लौट नहीं सकता। अब देखना यह है कि इस शर्मनाक विफलता के बाद क्या प्रशासन अपनी नींद से जागेगा, या फिर रसूखदारों की इस गुंडागर्दी के आगे कानून इसी तरह नतमस्तक होता रहेगा।










