3 जून को ही बेकाब किया था किशोर न्याय बोर्ड के सदस्य का असली चेहरा, तब चेत जाता प्रशासन तो न पिटता सरकारी अधिकारी

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उज्जैन। बोए पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय। प्रशासनिक लापरवाही और रसूखदारों को संरक्षण देने का जो बबूल महिला एवं बाल विकास विभाग के आला अधिकारियों ने पाल-पोसकर बड़ा किया था, आज उसने अपना असली ज़हरीला रूप दिखा दिया है। बीते दिनों नगर निगम के प्रभारी फ़ायर अधिकारी लक्ष्मण प्रसाद साहू को सरेआम 4 थप्पड़ जड़ने वाला किशोर न्याय बोर्ड का माननीय सदस्य विजेंद्र सिंह उर्फ विकास आरोण्या कोई नया खिलाड़ी नहीं है। अवंतिका के युवराज ने आज से ठीक 1 महीने पहले, यानी 3 जून को ही अपने मुख्य समाचार में इस बात का ढोल पीट-पीटकर पर्दाफ़ाश किया था कि बाल सम्प्रेषण गृह में इस सदस्य और तत्कालीन अधिकारियों की कैसी तानाशाही चल रही है। परंतु, प्रशासनिक तंत्र ने उस समय हमारी खबर को ठंडे बस्ते में डाल दिया, जिसका नतीजा आज सबके सामने है।

बाल संप्रेषण गृह में न्याय के मंदिर की नाक के नीचे बच्चों का मानसिक और शारीरिक शोषण, मयखाने में तब्दील हुआ परिसर, अधिकारियों की सांठगांठ से भ्रष्टाचारियों को मिल रहा संरक्षण


3 जून की वह खबर… जो आज सच साबित हुई
याद दिला दें कि 3 जून को प्रकाशित समाचार में साफ़ तौर पर उजागर किया गया था कि किस प्रकार बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉक्टर निवेदिता शर्मा के औचक निरीक्षण के दौरान सम्प्रेषण गृह के बच्चों ने विकास आरोण्या और तत्कालीन अमले के खिलाफ मारपीट, गाली-गलौज और बर्बरता के गंभीर आरोप लगाए थे। उस समय स्थिति को देखकर आयोग अध्यक्ष इस कदर नाराज़ हुई थीं कि बिना पौधारोपण किए ही लौट गई थीं। हमने स्पष्ट लिखा था कि न्याय के मंदिर की नाक के नीचे बच्चों से झाड़ू-पोछा लगवाया जा रहा है और रक्षक ही भक्षक बने बैठे हैं। जो व्यक्ति बंद कमरों में बेसहारा बच्चों पर हाथ उठाता था, जब प्रशासन ने उस पर कोई कार्रवाई नहीं की, तो उसका हौसला इस कदर बढ़ गया कि उसने दिन के उजाले में, सीसीटीवी कैमरे के सामने एक क्लास-2 अधिकारी पर हाथ उठाने की जुर्रत कर दी।

कार्रवाई के नाम पर कुर्सी बदलने का नाटक पड़ा महंगा
3 जून को आयोग की सख्ती के बाद अगर जिला कार्यक्रम अधिकारी (DPO) और महिला बाल विकास विभाग ने दोषियों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज कर उन्हें जेल भेजा होता, तो आज नगर निगम के अधिकारी को यह दिन न देखना पड़ता। लेकिन साहब ने तो केवल कुर्सी बदलने का म्यूजिकल चेयर खेला। बच्चों को प्रताड़ित करने वाले प्रभारियों को दंड देने के बजाय बाल गृह भेजकर पुरस्कृत कर दिया गया। जब व्यवस्था ही अपराधियों को ढाल देने लगे, तो अपराधियों के हौसले बुलंद होना लाज़मी है। “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे” की तर्ज़ पर, आज भी विभाग के भीतर बैठे कुछ चाटुकार इस बात की जांच में जुटे हैं कि सूचनाएं बाहर कैसे जा रही हैं, बल्कि उन्हें जांच इस बात की करनी चाहिए थी कि उनका बोर्ड सदस्य खुलेआम गुंडागर्दी पर उतारू है।

सूचना के अधिकार से डर और काली दाल का सच
इस संस्थान में फैले भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब-जब सूचना के अधिकार के तहत नियम-कायदों और खर्चों का हिसाब मांगा गया, अधिकारियों ने कानून को ही ठेंगा दिखा दिया। निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी आज तक जानकारियां दबाकर रखी गई हैं। जानकारी छुपाने की यह छटपटाहट साफ़ साबित करती है कि भीतर कोई बहुत बड़ा राज छुपा है। जब आप सूचना छुपाएंगे, दोषियों का तबादला कर उन्हें बचाएंगे, तो ऐसे ‘विजेंद्र सिंह’ जैसे लोग शहर के बीचों-बीच अधिकारियों को थप्पड़ मारते घूमेंगे ही।


अब तो जागिए साहब! जनता मांग रही है बर्खास्तगी
3 जून की हमारी खबर चीख-चीख कर कह रही थी कि दाल पूरी काली है। आज नगर निगम अधिकारी के चश्मे के साथ-साथ इस प्रशासनिक तंत्र का इकबाल भी टूटकर बिखर गया है। ‘अवंतिका के युवराज’ आज फिर सीधे शब्दों में पूछ रहा है कि क्या अब भी इस हिंसक सदस्य को किशोर न्याय बोर्ड से बर्खास्त नहीं किया जाएगा? क्या महाकाल की नगरी में रसूखदारों के आगे कानून हमेशा घुटने टेकता रहेगा? अब समय आ गया है कि कागजी खानापूर्ति बंद की जाए और इस पूरे घपले-घोटाले और गुंडागर्दी के सिंडिकेट को नेस्तनाबूद किया जाए।