सभ्य समाज के माथे पर महाकलंक, 12 वर्ष की मासूम से दरिंदगी की पराकाष्ठा क्या इस तंत्र में हमारी बेटियां सुरक्षित हैं?

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श्रीगंगानगर/राजस्थान। राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले से सामने आई अमानवीयता और दरिंदगी की एक ऐसी दास्तान, जिसने देश के विवेक को पूरी तरह सुन्न कर दिया है। मात्र 12 वर्ष की एक अबोध बच्ची, जिसके हाथों में अभी खिलौने और किताबें होनी चाहिए थीं, उसे 4 दिनों तक बंधक बनाकर 18 से अधिक नरपिशाचों ने अपनी हवस का शिकार बनाया। भरी आँखों और नम दिल से जब इस कड़वे सच को पन्नों पर उतारा जा रहा है, तो प्रशासनिक दावों और सुरक्षा के खोखले नारों की धज्जियां उड़ती साफ दिखाई दे रही हैं। अवंतिका के युवराज आज व्यवस्था से सीधा सवाल पूछता है कि क्या उस मासूम का छीना गया बचपन कभी वापस लौट पाएगा?

भरोसे से शुरू हुआ और हैवानियत पर खत्म हुआ सफर
पूरा मामला बेहद दर्दनाक और विचलित करने वाला है। जांच अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार, इस नाबालिग बच्ची की सामाजिक स्यूमीडिया (सोशल मीडिया) पर एक लड़के से जान-पहचान हुई थी। उसी से मिलने के लिए वह 18 जून को श्रीगंगानगर से लगभग 100 किलोमीटर दूर विजयनगर गई थी। वहाँ उस कथित मित्र ने उस मासूम के भरोसे का कत्ल करते हुए पहली बार उसके साथ कुकृत्य किया।

इसके बाद जब बच्ची डरी-सहमी स्थिति में बस से वापस रात के समय श्रीगंगानगर बस स्टैंड पहुँची, तो उसे क्या पता था कि शहर की सड़कों पर रक्षक नहीं, बल्कि भक्षक घूम रहे हैं। उसने घर जाने के लिए एक रिक्शा किया। वह रिक्शा चालक उसे घर छोड़ने के बजाय एक होटल में ले गया। उस रिक्शा चालक ने स्वयं भी रात भर रुककर उस बच्ची के साथ दरिंदगी की और उसे हैवानों के एक ऐसे जाल में धकेल दिया जहाँ से निकलना नामुमकिन हो गया।

3 होटलों में बंधक बनाकर किया गया व्यापार: कहाँ सोया था प्रशासन?
होटल के भीतर उस मासूम को 4 दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया। 18 जून की रात से लेकर 22 जून की दोपहर के बीच, उसे 1 नहीं बल्कि 3 अलग-अलग होटलों में ले जाया गया, जहाँ उसके साथ बार-बार सामूहिक ज्यादती की गई। बच्ची के बयानों के आधार पर इस घिनौने कृत्य में 20 से 25 लोग शामिल थे।

अवंतिका के युवराज यहाँ प्रशासन और पुलिस तंत्र पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है कि शहर के बीचों-बीच चल रहे इन होटलों में एक 12 वर्ष की बच्ची को बंधक बनाकर देह व्यापार का गंदा खेल खेला जा रहा था, और स्थानीय खुफिया तंत्र तथा गश्ती पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी? होटलों में आने-जाने वालों का कोई हिसाब क्यों नहीं था? क्या प्रशासन केवल तब जागता है जब किसी मासूम की जिंदगी पूरी तरह तबाह हो जाती है?

माँ की तड़प और पुलिस की कागजी फुर्ती

जब बच्ची घर नहीं पहुँची, तो उसकी माँ ने अपनी क्षमता के अनुसार हर जगह, हर रिश्तेदारी में उसे तलाशा। जब कोई सुराग नहीं मिला, तो 22 जून को वह थक-हारकर पुलिस थाने पहुँची। हालांकि, पुलिस का दावा है कि माँ के पहुँचने से पहले ही उन्हें कुछ भनक लग चुकी थी और उन्होंने बच्ची को रेस्क्यू (मुक्त) कराकर अभियुक्तों को हिरासत में ले लिया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए महिला थाना पुलिस ने पॉक्सो अधिनियम, बाल न्याय अधिनियम और देह व्यापार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। वर्तमान में 18 अभियुक्तों को गिरफ्तार किया जा चुका है और वे न्यायिक हिरासत में जेल में हैं। सीसीटीवी फुटेज की जांच के आधार पर अभी 3 से 4 और गिरफ्तारियां होना शेष हैं। जिला प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए उन 3 होटलों पर बुलडोजर चलाकर उन्हें ढहा दिया है, जहाँ यह कृत्य हुआ था।

बुलडोजर की गर्जना से क्या मानसिक घाव भर पाएंगे?
होटलों को ढहाना जनता के आक्रोश को शांत करने का एक प्रशासनिक तरीका हो सकता है, लेकिन असली चुनौती उस मानसिक आघात की है जिससे वह बच्ची जीवन भर जूझेगी। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी कम उम्र में इस तरह के भयानक नरक से गुजरने के बाद बच्चे ‘पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर’ यानी गहरे मानसिक सदमे की स्थिति में चले जाते हैं। इससे आत्मविश्वास पूरी तरह समाप्त हो जाता है, समाज और अपनों पर से भरोसा उठ जाता है, और बच्चा एक अघोषित खामोशी की जेल में कैद हो जाता है। लंबी थेरेपी और दवाइयों के बाद भी क्या वह बच्ची कभी एक सामान्य जीवन जी पाएगी? क्या अपराधियों को केवल जेल भेज देना ही न्याय है?

सड़कों पर फूटा जनता का गुस्सा, व्यवस्था को खुली चुनौती
इस घटना के बाद से ही श्रीगंगानगर की जनता सड़कों पर उतरकर उग्र प्रदर्शन कर रही है। लोगों की मांग है कि इन दरिंदों को ऐसी कड़े-से-कड़ी सजा दी जाए जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बने। अपराधियों के मन से कानून का डर इस कदर गायब हो चुका है कि उन्हें एक अबोध बच्ची को देखकर अपनी माँ-बहन का ख्याल तक नहीं आया।

अवंतिका के युवराज इस दुखद घड़ी में पीड़ित परिवार के साथ खड़ा है। जब हमारी कलम चलती है, तो व्यवस्था को मिर्ची लगती है, लेकिन हम पीछे नहीं हटेंगे। समाज के कथित ठेकेदारों और प्रशासन को यह सोचना होगा कि एनकाउंटर के नाम पर पैर तोड़ना या केवल भवनों पर बुलडोजर चलाना अपराध का स्थायी समाधान नहीं है। जब तक हर चौराहे, हर होटल और हर सड़क पर कानून का ऐसा खौफ नहीं होगा जो अपराधियों की रूह कंपा दे, तब तक हमारी बेटियां सुरक्षित नहीं हो सकतीं। यह समाचार केवल एक घटना का ब्योरा नहीं है, बल्कि इस बहरे और अंधे तंत्र को जगाने के लिए आंसुओं से लिखी गई एक चेतावनी है।