बाल संप्रेषण गृह में न्याय के मंदिर की नाक के नीचे बच्चों का मानसिक और शारीरिक शोषण, मयखाने में तब्दील हुआ परिसर, अधिकारियों की सांठगांठ से भ्रष्टाचारियों को मिल रहा संरक्षण

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उज्जैन। धार्मिक और पवित्र नगरी उज्जैन के मालनवासा स्थित बाल संप्रेषण गृह में चल रहे गंभीर घोटालों, बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार और प्रशासनिक भ्रष्टाचार का एक ऐसा वीभत्स चेहरा सामने आया है जिसने समूचे प्रशासनिक तंत्र को झकझोर कर रख दिया है। किशोर न्यायालय परिसर के ठीक भीतर संचालित होने वाले इस संप्रेषण गृह में कानून की रक्षक ही भक्षक बन बैठी है। हाल ही में उज्जैन प्रवास पर आईं बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉक्टर निवेदिता शर्मा के औचक निरीक्षण के दौरान जब इस संस्थान की कलई खुली, तो वहां की भयावह स्थिति को देखकर वह इस कदर भड़क गईं कि बिना पौधारोपण किए ही बैरंग लौट गईं। आयोग अध्यक्ष ने जिला कार्यक्रम अधिकारी ब्रजेश त्रिपाठी को कड़ी फटकार लगाते हुए तत्काल दोषियों पर दंडात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ऊपरी दिखावे की कार्रवाई के पीछे भ्रष्टाचार की एक बहुत बड़ी ढाल काम कर रही है जो असली गुनहगारों को बचाने में जुटी है।

संस्थान के भीतर से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, किशोर न्याय बोर्ड के सदस्य विकास आरोण्या और तत्कालीन अधीक्षक मेहताब सिंह परस्ते की जुगलबंदी ने इस सरकारी संस्थान को अपनी जागीर बना लिया है। विकास आरोण्या तय नियमों और अपनी न्यायिक सीमाओं को ताक पर रखकर सुबह से शाम तक संप्रेषण गृह में डेरा जमाए रहते हैं और संस्थान के संसाधनों का सरेआम दुरुपयोग करते हुए सरकारी खर्चे पर शाही भोजन और नाश्ते का लुत्फ उठाते हैं। हद तो तब हो जाती है जब सुधार के उद्देश्य से लाए गए अनाथ और बेसहारा नाबालिग बच्चों के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करने के बजाय उनके साथ गाली-गलौज और बर्बरता की जाती है। इस काले धंधे में सुरक्षा में तैनात नगर सैनिकों को खुली छूट दे रखी है, जो इन मासूम बच्चों के साथ मारपीट करते हैं, उन्हें डराते-धमकाते हैं और उनके परिजनों से अवैध रूप से मोटी रकम की मांग करते हैं। यदि कोई आवाज उठाने की कोशिश करता है, तो सदस्य और अधीक्षक के संरक्षण में पल रहे ये वर्दीधारी अपनी गुंडागर्दी और वसूली का जाल और मजबूत कर देते हैं।

इससे भी ज्यादा शर्मनाक और चौंकाने वाला पहलू यह है कि इस बाल संप्रेषण गृह परिसर को रात होते ही मयखाने में तब्दील कर दिया जाता है। विभागीय सूत्रों ने दबी जुबान में इस काले सच का पर्दाफाश किया है कि प्रभारी के शासकीय निवास पर हर रात महफिल सजती है, जहां अधीक्षक और बोर्ड सदस्य मिलकर रंगरलियां मनाते हैं। इस अनैतिक कृत्य के लिए शराब, कबाब और अन्य तमाम तरह के इंतजामों की जिम्मेदारी इन्हीं नगर सैनिकों के कंधों पर होती है, जो दिन में बच्चों को प्रताड़ित करते हैं और रात में साहबों की अय्याशी का सामान जुटाते हैं। पूरे सरकारी स्टाफ पर इस कदर धौंस जमाई जाती है कि कोई भी कर्मचारी इन अनैतिक और गैर-कानूनी कामों के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत नहीं कर पाता। न्याय के मंदिर की नाक के नीचे किशोर न्याय अधिनियम की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और रक्षक ही भक्षक बनकर मासूमों का भविष्य अंधकार में धकेल रहे हैं।

इस महाघोटाले और प्रताड़ना के खेल को दबाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर जो सांठगांठ चल रही है, उसकी बानगी तब देखने को मिली जब आयोग की सख्ती के बाद कार्रवाई के नाम पर केवल कुर्सी बदलने का नाटक किया गया। बच्चों के साथ हुई मारपीट और प्रताड़ना में सीधे तौर पर संलिप्त तत्कालीन प्रभारी अधीक्षक मेहताब सिंह परस्ते को दंड देने के बजाय उच्च अधिकारियों ने एक बार फिर पुरस्कृत कर दिया। उन्हें बाल संप्रेषण गृह से हटाकर बाल गृह का प्रभारी बना दिया गया, जबकि लोकेंद्र सिंह सोलंकी को बाल गृह से हटाकर संप्रेषण गृह का प्रभार सौंप दिया गया। यह फेरबदल प्रशासनिक शुचिता पर एक बड़ा तमाचा है। सवाल यह उठता है कि क्या पूर्व के भ्रष्ट प्रभारियों की तरह मेहताब सिंह परस्ते पर भी आपराधिक मामला दर्ज कर जेल भेजा जाएगा, या फिर उच्च अधिकारियों की मिलीभगत और ले-दे के खेल से इस पूरे मामले को हमेशा के लिए रफा-दफा कर दिया जाएगा।

इस संस्थान में फैले भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि जब इस संबंध में सूचना के अधिकार के तहत नियम कायदों और खर्चों का हिसाब मांगा गया, तो प्रशासन में हड़कंप मच गया। जवाबदेही से बचने के लिए अधिकारियों ने कानून को ही ठेंगा दिखा दिया और सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई महत्वपूर्ण जानकारियों को दबाकर बैठ गए। निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी अब तक कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है, जो यह साफ दर्शाता है कि भीतर कोई बहुत बड़ा राज छुपा है जिसे बाहर आने से रोकने के लिए पूरा महकमा एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है। सूचना छुपाने की यह छटपटाहट ही साबित करती है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। अब देखना यह है कि बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष के कड़े रुख के बाद क्या वास्तव में इन भ्रष्टाचारियों पर कोई बड़ी गाज गिरती है या फिर उज्जैन का यह बाल संप्रेषण गृह इसी तरह घोटालों और अय्याशी का अड्डा बना रहेगा।