बुलडोजर और बंदूक का खूनी न्याय, देशभक्त भरत तिवारी के एनकाउंटर से लेकर गरीबों के उजड़ते आशियानों तक खाकी की इस शॉर्ट-कट थ्योरी पर सुलगते सवाल

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भोजपुर/पटना। क्या अपने हक की लड़ाई लड़ना, व्यवस्था की कमियों के खिलाफ आवाज उठाना और अपने गांव की दबी-कुचली जनता का हक मांगना इस दौर का सबसे बड़ा अपराध बन चुका है? क्या आज के आधुनिक और लोकतांत्रिक तंत्र में न्याय की परिभाषा केवल बंदूकों की नाल और बुलडोजर के टायरों से तय होगी? ये वो तीखे और रूह को झकझोर देने वाले सवाल हैं, जो भरत तिवारी की संदिग्ध और खौफनाक मौत के बाद आज हर आम और खास इंसान के जेहन में तैर रहे हैं। एक ऐसा जांबाज युवा, जो अपराधियों की फेहरिस्त में शामिल होने के लिए नहीं, बल्कि अपने गांव की सिसकियों और प्रशासनिक अनदेखी के खिलाफ एक बुलंद आवाज बनकर उभरा था, उसे पुलिस की बंदूकों ने हमेशा के लिए खामोश कर दिया। खाकी की ओर से इसे भले ही ‘एनकाउंटर’ का नाम देकर अपनी पीठ थपथपाई जा रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत और दबी जुबान में उठ रही जन-आवाज इस पूरी कहानी को एक सोची-समझी साजिश और फर्जी एनकाउंटर का खूनी खेल बता रही है।

भरत तिवारी की इस तथाकथित मुठभेड़ और मौत की तुलना आज हर देशभक्त और संवेदनशील नागरिक महान क्रांतिकारी शहीद-ए-आजम भगत सिंह की शहादत से कर रहा है। जिस तरह भगत सिंह ने किसी निजी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि देश की सोई हुई हुकूमत को जगाने और गूंगी-बहरी ब्रिटिश सरकार के कानों तक जनता की आवाज पहुंचाने के लिए असेंबली में बम फेंका था और हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था, ठीक उसी तरह भरत तिवारी भी अपने गांव के विकास, वहां के लोगों पर हो रहे अत्याचार और भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार सिस्टम से लोहा ले रहा था। वह कोई पेशेवर अपराधी या डकैत नहीं था जो समाज के लिए खतरा बनता, बल्कि वह तो सत्ता और प्रशासन की आंख में चुभने वाली वो सच्चाई था जिसे दबाना रसूखदारों के लिए बेहद जरूरी हो गया था। भरत ने अपनी जान की परवाह किए बिना उस लचर व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी थी, जिसके चलते आज वो खाकी के इस शॉर्ट-कट न्याय की भेंट चढ़ गया। प्रशासन ने बिना सोचे-समझे भरत को भी अपराधियों की गिनती में खड़ा किया और उसकी आवाज को हमेशा के लिए दफन कर दिया। हम यहाँ किसी पर सीधा आरोप नहीं लगा रहे हैं, बल्कि इस सभ्य समाज की ओर से केवल कुछ नीतिगत सवाल उठा रहे हैं जो आज हर नागरिक पूछना चाहता है।

अब तक पुलिस प्रशासन ने जितने भी एनकाउंटर किए हैं, क्या वे सब भी इसी एक जैसी संदिग्ध पटकथा की कहानी नहीं दर्शाते? अपराधियों को सुधारने या कानून के दायरे में लाने के बजाय सीधे उनका शॉर्ट एनकाउंटर (पैर में गोली मारना) या फुल एनकाउंटर (जान ले लेना) कर देने की एक अघोषित होड़ सी मची हुई है। लेकिन इस अंधाधुंध व्यवस्था की मार सबसे ज्यादा उन गरीब और लाचार परिवारों पर पड़ती है, जिनका बेटा अगर राह से भटक भी गया हो, तो पूरा परिवार जीते-जी नर्क भुगतने को मजबूर हो जाता है। पुलिसिया रौब में आकर अपराधियों के घरों पर जो बुलडोजर चलाकर उन्हें जमींदोज कर दिया जाता है, क्या प्रशासन ने कभी यह सोचने की जहमत उठाई कि वह घर उस कथित अपराधी की काली कमाई से बना है या उसके बूढ़े माता-पिता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई से? उन लाचार मां-बाप से जाकर पूछो कि उन्होंने कैसे तिनका-तिनका जोड़कर, भूखे पेट रहकर अपने बच्चों के सिर छुपाने के लिए एक अदद मकान खड़ा किया था। यदि उनका बेटा बिगड़ैल या अपराधी निकल भी गया, तो उसकी सजा पूरे बेकसूर परिवार को क्यों दी जा रही है? पूरे के पूरे आशियाने को नष्ट करके क्या न्याय की स्थापना हो रही है?

इस बुलडोजर संस्कृति ने गरीब परिवारों के सामने आजीविका का संकट खड़ा कर दिया है और उनके सिर से छत तक छीन ली है। समाजशास्त्रियों और कानूनविदों का मानना है कि इस तरह के दमनकारी कदमों से अपराध कम होने के बजाय और ज्यादा बढ़ता है। जब एक परिवार के पास रहने को छत नहीं बचेगी, खाने को दाना नहीं होगा और समाज में केवल दुत्कार मिलेगी, तो वही बेघर लोग दोबारा सिर छुपाने की एक छत बनाने के लिए मजबूरन अपराध की अंधी दुनिया में कदम नहीं बढ़ाएंगे? रिकॉर्ड उठाकर देख लीजिए, अब तक जितने भी शॉर्ट एनकाउंटर हुए हैं और जितने भी अपराधियों के मकानों को धूल में मिलाया गया है, उससे जमीनी स्तर पर कितना क्राइम कम हुआ है? सच तो यह है कि अपराध का ग्राफ घटने के बजाय अपराधियों के तौर-तरीके और खौफनाक होते जा रहे हैं।

इस पूरे सिस्टम की विडंबना देखिए कि जो बड़े-बड़े सफेदपोश अपराधी और रसूखदार माफिया राजनेताओं के सीधे संरक्षण में पलते हैं, उन्हें तो पुलिस थानों की दहलीज से ही चाय-पानी पिलाकर ससम्मान छोड़ दिया जाता है। ऐसे वीआईपी अपराधियों के खिलाफ दर्जनों संगीन केस थानों की फाइलों में सालों-साल लंबित पड़े धूल खा रहे हैं, लेकिन उन पर न तो कभी कोई बंदूक तानता है और न ही उनके आलीशान बंगलों पर कोई बुलडोजर गरजता है। दूसरी ओर, अपनी गुड बुक और वाहवाही की लिस्ट में टॉप पर आने के लिए यह प्रशासन कैसे-कैसे अमानवीय और कानून-विरोधी हथकंडे अपना रहा है, यह बेहद निंदनीय और सोचनीय है। क्या हम इस तरह की अंधेरगर्दी से अपने देश के सिस्टम को सुधारेंगे या यहाँ पनप रहे अपराधियों को सही रास्ते पर लाएंगे? भरत तिवारी की शहादत ने खाकी महकमे की इस खोखली थ्योरी को पूरी तरह नंगा कर दिया है। हमारा समाचार पत्र इस पूरी दमनकारी नीति के खिलाफ और भरत तिवारी की संदिग्ध मौत के पीछे छिपे सच को उजागर करने के लिए लगातार सवाल उठाता रहेगा, क्योंकि बंदूक और बुलडोजर कभी भी न्याय का विकल्प नहीं हो सकते।