बाल संप्रेक्षण गृह में मासूमों का शिकार,वर्दी की आड़ में जुल्म ढहाने वाले किरदारों पर क्यों मेहरबान है प्रशासन…?

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उज्जैन। देश के संविधान और किशोर न्याय अधिनियम ने जिस बाल संप्रेक्षण गृह को मासूमों के सुधार और संरक्षण की पवित्र वेदी माना था, उज्जैन के मालनवासा में वह वेदी अब अमानवीयता और संस्थागत क्रूरता का कड़वा सच बन चुकी है। कानून की चौखट और मानवाधिकारों की दुहाई देने वाले बुद्धिजीवियों और देश की सर्वोच्च अदालत के विधिक सिद्धांतों की नजर से देखें, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि राज्य द्वारा पोषित एक गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। कानूनी प्रक्रिया के बाद इस तथाकथित सुधार गृह के नर्क से बाहर आए तराना क्षेत्र के बारह, तेरह और चौदह साल के अबोध बच्चों ने जो रूह कंपा देने वाली आपबीती सुनाई है, उसने पूरे प्रशासनिक अमले के साथ-साथ सभ्य समाज के जमीर को भी झकझोर कर रख दिया है। मासूमों ने अपने माता-पिता के सामने रोते हुए जिस दर्द को बयां किया, उसे सुनकर किसी भी संवेदनशील इंसान का कलेजा मुंह को आ जाए। सुधार गृह के भीतर सुरक्षा की आड़ में इन बच्चों के साथ इंसानों जैसा नहीं, बल्कि बंधुआ मजदूरों और जानवरों जैसा सुलूक किया जा रहा था, जिसने प्रशासन के दोहरे चरित्र को पूरी तरह नंगा कर दिया है।

अवंतिका के युवराज की विशेष पड़ताल में यह सनसनीखेज सच सामने आया है कि इस घिनौने कृत्य को अंजाम देने वाले दो प्रमुख सुरक्षाकर्मी अपनी वर्दी की धौंस पर पूरा समानांतर साम्राज्य चला रहे थे, जिनके नाम विभागीय गलियारों में पूरी तरह गूंज रहे हैं। इनमें से एक किरदार ऐसा है जिसकी नाम राशि बॉलीवुड के उस दिग्गज अभिनेता दिनेश हिंगू से मेल खाती है जो परदे पर तो लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाते हैं, लेकिन सुधार गृह का यह प्रजापति नाम राशि वाला वर्दीधारी किरदार अपनी लाठियों के दम पर मासूमों को खून के आंसू रुला रहा था। वहीं जो दूसरा वर्दीधारी शिकारी है, उसकी नाम राशि अमर अकबर एंथनी जैसी ऐतिहासिक फिल्म के महानायक मोहन बाबू से जुड़ती है, लेकिन इस श्रीवास्तव नाम राशि वाले शख्स ने सेवा भाव को ताक पर रखकर बच्चों को कालकोठरी जैसी यातनाएं देने का काम किया। पीड़ित बच्चों के माता-पिता ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए बताया कि ये वर्दीधारी प्रताड़क रोजाना रेकी के नाम पर मासूमों को जबरन बाथरूम के भीतर ले जाते थे और वहां उनके साथ बेरहमी से मारपीट करते थे, ताकि बाहर मुख्य कमरों में लगे कैमरों या किसी अन्य की नजर में उनकी यह हैवानियत सामने न आ सके। ताज्जुब की बात यह है कि जब बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष ने औचक निरीक्षण के दौरान होमगार्ड के पूरे बल को तत्काल प्रभाव से हटाने और कड़े कदम उठाने के सख्त निर्देश जारी किए थे, तब भी इन विशेष नाम राशि वाले किरदारों पर आंच तक नहीं आई और इन्हें बिना किसी ठोस दंडात्मक कार्रवाई के सुरक्षित बचा लिया गया।

इस गंदे खेल की परतें यहीं नहीं खुलतीं, बल्कि अंदरखाने चल रहे एक बड़े सिंडिकेट और रिश्वतखोरी के साम्राज्य की गवाही भी खुद इन बच्चों ने दी है। पीड़ित बच्चों के मुताबिक, इस संप्रेक्षण गृह के भीतर जो पुराने और शातिर बच्चे हैं, उनके लिए यह रिश्वतखोर अमला सर्वसुविधा युक्त माहौल तैयार करके रखता है। चंद रुपयों के लालच और सांठगांठ के दम पर वहां बंद रसूखदार बच्चों को बीड़ी, सिगरेट, गुटखा और पाउच जैसी हर नशीली सामग्री आसानी से उपलब्ध कराई जाती है, जबकि गरीब और सीधे बच्चों को प्रताड़ना का शिकार बनाया जाता है। बुद्धिजीवियों और कानूनविदों के जेहन में अब यह तीखा सवाल उठ रहा है कि सरकार ने करोड़ों रुपए की लागत से यह आलीशान इमारत बच्चों को सुधारने के लिए बनाई है या फिर उन्हें आदतन अपराधी बनाने और बिगाड़ने का ट्रेनिंग सेंटर खोल रखा है। दबी जुबान से यह आवाज भी सुनने में आई है कि इन मासूम बच्चों से सुधार गृह के भीतर बड़े अधिकारियों और कर्मचारियों के हाथ-पैर दबवाए जाते हैं, उनसे बर्तन धुलवाए जाते हैं और परिसर में झाड़ू-पोंछा समेत तमाम घरेलू काम करवाए जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने इन रसूखदार कर्मचारियों को अपने निजी एश-ओ-आराम के लिए मुफ्त के बंधुआ मजदूर सौंप दिए हैं, वरना अगर कानून का खौफ होता तो ये बच्चों का उपयोग अपने घरों पर भी करवा लेते। यहां किसको क्या खाना मिलेगा, किसे भूखा तड़पाया जाएगा, किसे मारना है और किसके चरण चुंबन करने हैं, यह सब इन प्रताड़कों के एक काले मैनुअल के हिसाब से तय होता है।

इस पूरे मामले में पुलिस और महिला एवं बाल विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल अब सीधे तौर पर प्रशासनिक संरक्षण की ओर इशारा कर रहे हैं। पीड़ित परिवार आज भी यह सवाल उठा रहा है कि आखिर इतने गंभीर और नामजद आरोपों के बाद भी ये दोनों मुख्य किरदार अब तक खुलेआम क्यों घूम रहे हैं, और क्या एक गरीब परिवार को इंसाफ पाने के लिए इसी तरह दर-दर भटकना पड़ेगा। जब सीधे तौर पर मासूमों की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मी ही रक्षक से भक्षक की भूमिका में आ जाएं और उन पर कोई एफआईआर तक दर्ज न हो, तो आम जनता का इस समूचे सिस्टम से भरोसा उठना लाजिमी है। ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस और विभाग के बीच एक मजबूत जुगलबंदी चल रही है, जिसके तहत पहले तो विभागीय आरटीआई आवेदनों को तकनीकी कारणों का हवाला देकर दस्तावेजों को छुपाया गया और अब इन नामजद किरदारों को बचाने के लिए पूरी फाइल को ही दबाने की पटकथा लिखी जा रही है। पीड़ित परिवारों ने अब इस दोहरे प्रशासनिक रवैये के खिलाफ सीधे तौर पर न्यायालय की शरण लेने का मन बना लिया है और कोर्ट की चौखट पर इन दोनों वर्दीधारी किरदारों के कारनामों के पुख्ता साक्ष्य पेश करने की तैयारी पूरी हो चुकी है। अब जनता के बीच यह तीखा सवाल पूरी तरह गूंज रहा है कि क्या खुद को कानून से ऊपर समझने वाले इन सुरक्षाकर्मियों पर न्यायालय के आदेश के बाद कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई होगी, या फिर बड़े अधिकारियों के वरदहस्त के चलते ये दोनों किरदार आगे भी इसी तरह मासूमों के भविष्य से खिलवाड़ करते रहेंगे। हमारे समाचार पत्र की पैनी नजर इन दोनों किरदारों की हर एक गतिविधि और उन्हें बचाने में जुटे सफेदपोशों पर लगातार बनी हुई है।