उज्जैन।मासूमों के संरक्षण और सुधार के नाम पर संचालित सरकारी संस्थान अब प्रताड़ना के कड़वे सच और अमानवीयता के सुरक्षित केंद्र बनते जा रहे हैं।

उज्जैन के बाल संप्रेक्षण गृह मालनवासा से कानूनी प्रक्रिया के बाद बाहर आए तीन बच्चों ने जो दर्दनाक आपबीती सुनाई है, उसने पूरे प्रशासनिक अमले को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है और उनके परिजनों ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए बताया कि सुधार गृह के भीतर मासूमों को बेरहमी से पीटा गया, रस्सी से मारा गया और कई-कई घंटों तक शौचालय में बंद करके रखा गया। यह वही संस्थान है जहां कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष ने औचक निरीक्षण किया था और वहां फैली भारी अव्यवस्थाओं तथा बच्चों की सीधी शिकायत के बाद तत्कालीन अधीक्षक को हटाने और तैनात होमगार्ड के पूरे बल को तत्काल बदलने के कड़े निर्देश जारी किए थे। लेकिन जमीनी स्तर पर बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या सिर्फ चेहरों को इधर से उधर बदल देने से अंदर का सड़ चुका सिस्टम सुधर गया।
उज्जैन में सरकारी और गैर-सरकारी बाल गृहों में मासूमों के साथ होने वाली क्रूरता और फिर उस पर पर्दा डालने का इतिहास बेहद पुराना और दागदार रहा है। पूर्व में हुए सेवाधाम आश्रम के उस खौफनाक मामले को जनता आज तक नहीं भूली है, जहां इंदौर से स्थानांतरित किए गए बच्चों में से चौदह महीनों के भीतर सत्रह मासूमों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। उस वक्त भी प्रशासनिक अधिकारियों ने मल्टी-ऑर्गन फेलियर और बीमारियों का खोखला बहाना बनाकर पूरे मामले को रफा-दफा करने की पुरजोर कोशिश की थी। उस दौरान रोशन नाम के एक बच्चे के अचानक गायब होने के रहस्य को भी सरकारी फाइलों में हमेशा के लिए दफन कर दिया गया और न्यायालय की सख्ती के बाद जो जांच रिपोर्ट बंद लिफाफे में शासन तक पहुंची थी, वह आज तक जनता के सामने उजागर नहीं हो सकी। उस समय भी प्रशासन जांच का ढोंग रचकर पूरी तरह चुप्पी साधकर बैठ गया था और रसूखदारों को बचाते हुए सेवाधाम के उस बेहद गंभीर मामले को हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। ठीक वही पुराना और आजमाया हुआ लीपापोती का रवैया बाल संप्रेक्षण गृह के इस नए मामले में भी साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। जब बच्चों के साथ मारपीट और अमानवीय दुर्व्यवहार में संस्थान के जिम्मेदार अधिकारी की संलिप्तता जगजाहिर हुई, तो उन पर कोई कठोर दंडात्मक या कानूनी कार्रवाई करने के बजाय अधिकारियों ने उन्हें एक बार फिर पुरस्कृत करते हुए बाल गृह का मुख्य प्रभारी बना दिया, यानी एक जगह से शिकायत आई तो दूसरी संवेदनशील जगह की मलाईदार कुर्सी सौंप दी गई।
इस पूरे मामले के पीछे छुपा प्रशासनिक भ्रष्टाचार और सच को दबाने की छटपटाहट उस समय और साफ हो गई जब हमारे समाचार पत्र द्वारा महिला एवं बाल विकास विभाग में एक आरटीआई (सूचना का अधिकार) लगाकर इस पूरे काले कारनामे के दस्तावेज मांगे गए। विभाग के आला अधिकारियों ने पारदर्शिता दिखाने के बजाय अजीबोगरीब नियमों और तकनीकी कारणों का हवाला देकर हमें जरूरी दस्तावेज देने से साफ तौर पर मना कर दिया। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी न देना और दस्तावेजों को दबाना सीधे तौर पर इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि विभाग की बंद फाइलों के भीतर कोई बहुत बड़ा और नया राज दफन है, जिसे उजागर होने से अधिकारी हर कीमत पर बचाना चाहते हैं। यदि विभाग पाक-साफ है और अंदर कुछ गलत नहीं हुआ, तो फिर आखिर किस डर से इन दस्तावेजों को छुपाया जा रहा है और जनता के सामने सच आने से रोका जा रहा है।
तराना क्षेत्र के रहने वाले पीड़ितों के परिजनों के मुताबिक, पड़ोस के एक मामूली विवाद के बाद नाबालिग बच्चों को इस बाल संप्रेक्षण गृह में भेजा गया था। न्यायालय के आदेश पर जब ये बच्चे बाहर आए, तो उन्होंने जेल जैसी प्रताड़ना की खौफनाक दास्तान बयां की जिसके बाद अब पीड़ित परिवार और उनके वकील इस क्रूरता के खिलाफ जिला न्यायाधीश और बाल न्यायालय के समक्ष लिखित शिकायत दर्ज कराने की तैयारी कर चुके हैं। जनता के जेहन में अब यह तीखा सवाल तैर रहा है कि क्या पूर्व के मामलों की तरह इस बार भी दोषी अधिकारियों पर कानूनी शिकंजा कसते हुए कोई ठोस एफआईआर दर्ज की जाएगी, या फिर महिला एवं बाल विकास विभाग की मिलीभगत और फाइलों में दफन राज के सहारे इस पूरे मामले को भी ले-देकर सेवाधाम की तरह ही रफा-दफा कर दिया जाएगा। हमारे समाचार पत्र की पैनी नजर इस पूरे घटनाक्रम और आरटीआई के जरिए छुपाए जा रहे सच पर लगातार बनी हुई है।










