महाकाल के दर पर अदृश्य रसीद का खेल आम श्रद्धालुओं को धक्के तो खास चेहरों के लिए गर्भगृह के पट खुले वीआईपी कल्चर के आगे बौना साबित हुआ प्रशासन

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उज्जैन। विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकालेश्वर मंदिर में आम श्रद्धालुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ और वीआईपी संस्कृति का एक ऐसा नग्न रूप सामने आ रहा है, जिसने मंदिर प्रशासन की दोहरी व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। आजकल सोशल मीडिया से लेकर मंदिर के गलियारों तक सिर्फ एक ही तीखा सवाल गूंज रहा है कि आखिर गर्भगृह में जाने का कितना पैसा लगता है, जरा जिम्मेदार खुलकर बताएं तो सही! जब आम जनता के लिए गर्भगृह में प्रवेश पूरी तरह वर्जित कर दिया गया है, तो फिर कुछ तथाकथित रसूखदार और खास चेहरे नियमों को ठेंगा दिखाकर बाबा के बिल्कुल करीब कैसे पहुंच रहे हैं? देश के कोने-कोने से आने वाले गरीब और आम श्रद्धालु जो भीषण गर्मी, कड़कती धूप और लंबी कतारों में घंटों खड़े रहने के बाद सिर्फ एक झलक पाने की आस लेकर आते हैं, उन्हें बैरिकेड्स से धक्के देकर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। दूसरी ओर, वीआईपी दर्शन के नाम पर आम जनता से मोटी रकम वसूलने के बाद भी उन्हें सुलभ दर्शन नसीब नहीं हो रहे हैं, जिससे ठगा हुआ महसूस कर रहे श्रद्धालुओं में अब भारी आक्रोश पनपने लगा है।

सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि मंदिर की इस कथित ‘स्पेशल’ व्यवस्था के आगे शहर के जनप्रतिनिधि, पार्षद और यहां तक कि कई मंत्री भी कतार में नजर आते हैं और नियमों के दायरे में रहकर दर्शन करते हैं। ऐसे में यह बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा होता है कि आखिर वे कौन सी बड़ी हस्तियां हैं, जो इन सभी जनप्रतिनिधियों और स्थापित नियमों से भी ऊपर हो गई हैं? दूर-दूर से अपनी जमा पूंजी लगाकर आने वाले गरीब भक्तों में अब दबी जुबान में यह तीखी चर्चा आम हो चुकी है कि आम आदमी को ऐसी कौन सी तिकड़म या गादी अपनानी पड़ेगी जिससे उसे भी गर्भगृह में जाने की एंट्री मिल सके? जब एक आम इंसान को नंदी हॉल तक जाने और स्पेशल प्रोटोकॉल का लाभ लेने के लिए ढाई सौ रुपए की बकायदा रसीद कटवानी पड़ती है, तो फिर गर्भगृह के भीतर तक का रास्ता नापने के लिए आखिर कितने हजार या लाख की रसीद कट रही है, इसका सच सामने आना ही चाहिए। आखिर वह कौन सा रसूखदार हाथ या अधिकारी है जो इन चुनिंदा लोगों को नियम विरुद्ध अंदर तक लेकर गया और पूरी व्यवस्था को मूकदर्शक बना दिया?

बाबा महाकाल के दरबार में अमीर और गरीब का यह खुला भेद पूरी तरह अनुचित और आस्था पर गहरी चोट है, क्योंकि भगवान के लिए हर भक्त एक समान होता है। वीआईपी कल्चर के नाम पर चलाई जा रही इस समानांतर व्यवस्था से आम जनता को जो मानसिक और शारीरिक तकलीफ होती है, उसका अंदाजा बंद कमरों में बैठकर नियम बनाने वाले अफसरों को कभी नहीं हो सकता। दर्शन के नाम पर होने वाली इस कथित अवैध वसूली और भेदभाव को तुरंत बंद कर गर्भगृह की व्यवस्था को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाना चाहिए, ताकि किसी भी गरीब श्रद्धालु को बाबा के द्वार से निराश और अपमानित होकर न लौटना पड़े। हमारे समाचार पत्र की पैनी नजर इस पूरे घालमेल और इसके पीछे जिम्मेदार चेहरों पर लगातार बनी हुई है, और जब तक आम भक्तों को उनका अधिकार नहीं मिल जाता, यह आवाज पूरी प्रखरता के साथ उठती रहेगी।