देवास। क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय में भ्रष्टाचार का एक ऐसा संगठित साइबर सिंडिकेट सक्रिय है जिसने सरकारी तंत्र को दलाल की जागीर बना दिया है। अवंतिका के युवराज के हाथ लगे सनसनीखेज दस्तावेजों ने उस काले साम्राज्य को बेनकाब कर दिया है, जिसका रिमोट कंट्रोल आरटीओ दफ्तर के बजाय सिंधी कॉलोनी स्थित एक आलीशान बंगले से चल रहा है। सबसे गंभीर और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि बैंक द्वारा सीज की गई गाड़ियों के मालिकाना हक को बदलने के लिए सरकारी पोर्टल की सुरक्षा में सेंध लगाई जा रही है। बाबू की अति-गोपनीय आईडी का उपयोग कर जिस तरह से आधी रात के सन्नाटे और सरकारी छुट्टियों के दिन ‘जादुई खेल’ खेला जा रहा है, वह न केवल विभाग की साख पर कालिख पोत रहा है, बल्कि सीधे तौर पर करोड़ों रुपये की राजस्व चोरी और जालसाजी का मामला है।

रविवार की छुट्टी और आधी रात का ऑपरेशन डकैती जब प्रशासन सोता है तब दलाल का कीबोर्ड चलता है!
सरकारी पोर्टल और डेटा की सुरक्षा को ठेंगा दिखाते हुए सिंधी कॉलोनी के उस बंगले से ‘डिजिटल डकैती’ का नया मॉडल संचालित हो रहा है। साक्ष्य के तौर पर MP20.DA0687 नंबर की JCB को देखिए—यह मशीन बैंक द्वारा सीज की गई थी। नियम विरुद्ध तरीके से 18 जनवरी (रविवार) की रात 10:45 बजे बिना किसी ओटीपी के खुद ही आवेदन लगा दिया जाता है और आधी रात को 12:21 बजे उसे सरकारी आईडी से वेरीफाई भी कर दिया जाता है। आखिर एक निजी व्यक्ति के पास वह कौन सा ‘सुपर पावर’ है कि वह छुट्टी के दिन सरकारी पोर्टल खोलकर बैठ जाता है? इसी तरह MP20.ZF2427, MP20.CG9080, MP20.CD9311 जैसी लग्जरी कारों के मामले में भी रात के 11 से 12 बजे के बीच वही खेल दोहराया गया। यह महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित षड्यंत्र है जिसमें वाहन मालिक और बैंकों की सहमति के बिना उनके डेटा के साथ ‘420’ की जा रही है।
सीजिंग और नीलामी का महा-घोटाला 3 महीने की कानूनी प्रक्रिया को चंद मिनटों में किया बाईपास!
नियमों के मुताबिक, बैंक द्वारा सीज की गई गाड़ियों (सीजिंग वाहन) के मामले में फॉम नंबर 36 के तहत एक लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, जिसमें बैंकों के एनओसी से लेकर भौतिक सत्यापन तक कम से कम 3 महीने का समय लगता है। लेकिन दलाल सुभाष जैन की ‘डिजिटल चाबी’ ने इस पूरी प्रक्रिया को चंद मिनटों में समेट कर रख दिया है। बैंक सीजिंग की इन गाड़ियों को सीधे खरीदार के नाम करने के लिए प्रति गाड़ी 25,000 से 30,000 रुपये का ‘अवैध सेवा शुल्क’ वसूला जा रहा है। इस खेल में न तो विक्रेता का ओटीपी लिया जाता है और न ही नियमानुसार प्रक्रिया का पालन होता है। यह सीधे तौर पर एक ऐसा फ्रॉड है जिसे विभाग के भीतर बैठे कुछ ‘विभीषणों’ की मिलीभगत के बिना अंजाम देना असंभव है।
60 लाख की मंथली और भ्रष्टाचार का फिक्स रेट कार्ड, हर क्लिक पर बरस रहे हैं नोट!
देवास आरटीओ में भ्रष्टाचार अब किसी सिस्टम नहीं, बल्कि एक ‘ठेके’ के रूप में चल रहा है। चर्चा है कि एक नीलामी वाहन को गुपचुप तरीके से पास कराने के लिए ऊपर से नीचे तक ‘दक्षिणा’ का हिस्सा पहले से तय है। बैंक सीजिंग जैसी विवादित गाड़ियों पर यह दलाली लाखों तक पहुँच जाती है। विश्वसनीय सूत्रों का दावा है कि साल 2021 में जो खेल 30 लाख रुपये प्रति माह के ‘ठेके’ से शुरू हुआ था, वह अब 60 लाख रुपये प्रति माह के जादुई आंकड़े को पार कर चुका है। यह पैसा किसी सरकारी खजाने में जाने के बजाय सिंधी कॉलोनी के उस बंगले की विलासिता और बेनामी संपत्तियां खड़ी करने में झोंका जा रहा है। आम आदमी एक छोटे से काम के लिए दफ्तर के चक्कर लगा-लगाकर जूते घिस देता है, वहीं दलाल के घर पर सरकारी आईडी नोट छापने की मशीन बनी हुई है।
होम लॉगिन का खौफनाक सच सरकारी डेटा की गोपनीयता दांव पर!
सबसे बड़ा सवाल आरटीओ प्रशासन और साइबर सुरक्षा पर खड़ा होता है कि आखिर सरकारी आईडी और पासवर्ड एक निजी दलाल के ड्राइंग रूम तक कैसे पहुँचे? पोर्टल के नियमों के अनुसार, जिले के बाहर की गाड़ियों का ट्रांसफर और फाइनेंस हटाने की प्रक्रिया क्रमानुसार होनी चाहिए, लेकिन इस दलाल सिंडिकेट के पास वो ‘मास्टर की’ है कि वह दोनों काम एक साथ क्रिएट कर खुद ही वेरीफाई भी कर देता है। 600 किलोमीटर दूर जबलपुर की गाड़ियों का काम देवास के एक बंद कमरे में बैठकर निपटाना यह साबित करता है कि विभाग में ‘सब चंगा है’ का दावा महज एक धोखा है। यदि इन गाड़ियों की लॉग हिस्ट्री और लॉगिन आईपी एड्रेस की उच्च स्तरीय जांच की जाए, तो पूरा प्रशासन कटघरे में खड़ा नज़र आएगा।
निशा चौहान के लिए अग्निपरीक्षा, क्या इन ‘डिजिटल डकैतों’ को जेल भेजेगा प्रशासन?
आरटीओ निशा चौहान की कार्यशैली ने उम्मीदें तो जगाई हैं, लेकिन दलाल का यह ‘समानांतर सिस्टम’ उनकी ईमानदारी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। ‘अवंतिका के युवराज’ द्वारा उजागर किए गए ये तकनीकी साक्ष्य इस बात की गवाही दे रहे हैं कि विभाग के भीतर एक समानांतर सरकार चल रही है। यदि प्रशासन में थोड़ी भी संवेदनशीलता बची है, तो उसे तुरंत इन संदिग्ध गाड़ियों के रिकॉर्ड फ्रीज करने चाहिए और उस बंगले की जांच करनी चाहिए जहाँ से आधी रात को सरकारी सिस्टम ऑपरेट किया गया। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इन साक्ष्यों के आधार पर दलाल को सलाखों के पीछे पहुँचाता है या फिर भ्रष्टाचार की इस 60 लाख की गंगा में हाथ धोना जारी रखता है।










