चंद रुपयों के लालच में मासूमों का ‘पंचर’ कर रहे सौदागर
भोपाल। झीलों की नगरी भोपाल की चमकती सड़कों के किनारे एक ऐसी काली हकीकत पनप रही है, जो भविष्य की नींव को खोखला कर रही है। शहर के चौराहों, रेलवे पटरियों और सुनसान गलियों में कचरा बीनने वाले मासूम हाथों में आज रोटी नहीं, बल्कि मौत का सामान ‘सिलोचन’ नजर आ रहा है। टायर-ट्यूब का पंचर सुधारने वाला यह चिपचिपा पदार्थ अब नन्हे फेफड़ों में जहर घोल रहा है, और विडंबना देखिए कि चंद रुपयों के मुनाफे के लिए शहर के कुछ बेरहम कारोबारी इन बच्चों को साक्षात यमराज का पता दे रहे हैं।
यह मंजर रूह कंपा देने वाला है, जहाँ दस-बारह साल के बच्चे फटे हाल कपड़ों में चेहरे पर पन्नी लगाए सुध-बुध खोए बैठे मिलते हैं। जिस उम्र में इन बच्चों को स्कूल की बेंच पर होना चाहिए था, उस उम्र में वे सिलोचन की तीखी गंध के जरिए नशे की अंधी खाई में उतर रहे हैं। ये बच्चे कूड़ा-करकट बेचकर जो चंद पैसे कमाते हैं, उन्हें अपनी भूख मिटाने के बजाय इन दुकानदारों की तिजोरी में डाल देते हैं। बेचने वालों की संवेदनाएं इस कदर मर चुकी हैं कि उन्हें इन मासूमों की धंसी हुई आंखें और कांपते शरीर नजर नहीं आते। उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि उनका यह ‘सामान’ किसी मां की गोद सूनी कर रहा है या किसी का बचपन लील रहा है।
सबसे बड़ा सवाल उन व्यापारियों पर उठता है जो जानते हुए भी कि यह बच्चा पंचर सुधारने के लिए नहीं बल्कि नशे के लिए सिलोचन मांग रहा है, उसे सहजता से यह जहर थमा देते हैं। यह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के खिलाफ संगठित अपराध है। प्रशासन की नाक के नीचे चल रहा यह ‘सफेद जहर’ का काला खेल न केवल इन बच्चों के जिस्म को गला रहा है, बल्कि उन्हें अपराध की दुनिया की ओर भी धकेल रहा है। अगर समय रहते इन सौदागरों पर नकेल नहीं कसी गई और इन मासूमों को इस दलदल से बाहर नहीं निकाला गया, तो राजधानी की सड़कों पर बिखरता यह बचपन कल एक ऐसी तबाही लेकर आएगा जिसकी भरपाई कोई कानून नहीं कर पाएगा।










