भ्रष्टाचार का समानांतर सचिवालय: कमरा नंबर-2 से चलती है आरटीओ की हुकूमत, सरकारी बाबुओं ने गिरवी रखी अपनी गरिमा

देवास क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) की दहलीज पर कदम रखते ही नियम-कायदे दम तोड़ देते हैं। यहाँ कहने को तो सरकार के नुमाइंदे बैठते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि पूरे दफ्तर की लगाम एक बाहरी शख्स सुभाष जैन के हाथों में है। भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘अवंतिका के युवराज’ की मुहिम में जो तथ्य सामने आए हैं, वे रोंगटे खड़े करने वाले हैं। आरटीओ का कमरा नंबर-2 अब किसी सरकारी दफ्तर का हिस्सा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का अघोषित ‘सचिवालय’ बन चुका है। यहाँ बैठकर सुभाष जैन किसी समानांतर परिवहन अधिकारी की तरह आदेश जारी करता है। सबसे शर्मनाक पहलू तो यह है कि सरकारी कर्मचारियों ने अपनी पद की गरिमा को ताक पर रखकर अपनी लॉग-इन आईडी और गोपनीय ओटीपी तक इस बाहरी व्यक्ति को सौंप दिए हैं। यह न केवल सरकारी गोपनीयता भंग करने का संगीन अपराध है, बल्कि सीधे तौर पर शासन की आंखों में धूल झोंकने जैसा है। आखिर किसके रसूख के दम पर एक गैर-सरकारी व्यक्ति पूरे विभाग को अपनी निजी जागीर की तरह हांक रहा है?

एटीएस पर तालाबंदी का असली मास्टरमाइंड, अपनी मलाई कटी तो सुभाष ने पूरी व्यवस्था के गले में डाल दिया फंदा
देवास के स्वचालित परीक्षण केंद्र (एटीएस) का छह महीने के लिए निरस्त होना कोई प्रशासनिक प्रक्रिया मात्र नहीं है, बल्कि इसके पीछे सुभाष जैन के आर्थिक हितों की कड़वी दास्तान छिपी है। सूत्रों के मुताबिक, जब तक इस केंद्र से सुभाष की जेबें गरम होती रहीं, तब तक तंत्र सुचारू रूप से चलता रहा। जैसे ही स्थितियां उसके नियंत्रण से बाहर हुईं, षड्यंत्र रचकर पूरी व्यवस्था को ही ताले में जड़ दिया गया। प्रशासन की नाक के नीचे एक बाहरी व्यक्ति इतना ताकतवर कैसे हो गया कि वह सरकारी सुविधाओं और निजी कंपनियों के भविष्य का फैसला करने लगा? जांच का विषय यह है कि आखिर इस केंद्र की गतिविधियों में सुभाष जैन का दखल किस आधार पर था और इस बंदी से उसे क्या लाभ हुआ?

कागजी फिटनेस का खूनी सिंडिकेट: सड़कों पर दौड़ रही ‘मौत की एम्बुलेंस’, पैसों के लिए इंसानी जान से खिलवाड़
‘अवंतिका के युवराज’ की पैनी नजर ने उस काले सच को उजागर किया है जो किसी बड़े हादसे को दावत दे रहा है। नवंबर 2024 में बिना एक भी वाहन को आरटीओ परिसर में लाए, महज फाइलों पर ही 40 एम्बुलेंस की फिटनेस जारी कर दी गई। यह सीधा-सीधा मासूम मरीजों की जान से खिलवाड़ है। सुभाष जैन के इस ‘फिटनेस सिंडिकेट’ ने उन खटारा वाहनों को भी सड़क पर दौड़ने का लाइसेंस दे दिया है जो कबाड़ के ढेर में होने चाहिए थे। जब ये जर्जर वाहन सड़कों पर काल बनकर दौड़ेंगे और किसी की जान जाएगी, तो क्या प्रशासन इस बाहरी सौदागर पर हत्या का मुकदमा दर्ज करेगा? यह भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि सुनियोजित हत्या की साजिश है।

तबादलों की मंडी और रसूख की धौंस: ईमानदारों की नो-एंट्री, ‘कमाऊ पूत’ बाबुओं की हरदम चांदी
सुभाष जैन का रसूख आरटीओ की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें सत्ता के गलियारों में इतनी गहरी हैं कि वह अधिकारियों के तबादले तक रुकवाने का दम रखता है। आरटीओ में कौन सा बाबू टिकेगा और किसे बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा, यह सुभाष की रजामंदी से तय होता है। लाखों रुपये की पेशगी और राजनीतिक रसूख के दम पर इसने एक ऐसा अभेद्य दुर्ग बना लिया है जहाँ ईमानदारी को प्रवेश की अनुमति नहीं है। जो कर्मचारी इसके सिंडिकेट का हिस्सा बनने से इनकार करता है, उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित कर वहां से हटवा दिया जाता है। पूरे विभाग में डर और दहशत का माहौल है और सरकारी तंत्र इस बाहरी व्यक्ति के सामने नतमस्तक नजर आता है।

प्रशासन की रहस्मयी चुप्पी और सफेदपोशों का संरक्षण, आखिर किसका ‘आस्तीन का सांप’ है सुभाष जैन?
एक साल से ‘अवंतिका के युवराज’ लगातार तथ्यों और सबूतों के साथ इस महाभ्रष्टाचार की पोल खोल रहा है, लेकिन देवास का जिला प्रशासन और पुलिस विभाग गहरी नींद में सोया है। संभाग आयुक्त के पास शिकायतें पहुँचने के बाद भी कार्यवाही का पहिया थमा होना कई अनसुलझे सवाल खड़े करता है। क्या इस भ्रष्टाचार की गंगा में जिले के बड़े सफेदपोशों ने भी डुबकी लगाई है? प्रशासन की चुप्पी यह सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं इस ‘आस्तीन के सांप’ को पालने का मोटा किराया ऊपर तक तो नहीं पहुँच रहा?










