नाबालिग से अश्लीलता का विरोध करने पर पीड़ित परिवार को लाठी-स्टंपों से पीटा, रसूखदारों के आगे नतमस्तक एरोड्रम पुलिस!

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इंदौर। न्याय की उम्मीद में खाकी के द्वार खटखटाने वाले आम नागरिकों पर रसूख और गुंडागर्दी का ऐसा ही एक वीभत्स और कानून को ठेंगा दिखाने वाला मामला एरोड्रम थाना क्षेत्र के अंबिकापुरी में उजागर हुआ है। अपनी अस्मिता और मर्यादा की रक्षा के लिए विधिक रूप से संवाद करने गए एक संभ्रांत परिवार को लाठी, डंडों और क्रिकेट स्टंप से सरेआम लहूलुहान कर दिया गया। कानून व्यवस्था और भारतीय न्याय संहिता की स्थापित प्रक्रियाओं का मखौल तब और अधिक उड़ गया, जब अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजने के बजाय स्थानीय पुलिस प्रशासन शासकीय सेवा में बैठे एक रसूखदार पिता और उसके बिगड़ैल बेटों के दबाव में नतमस्तक दिखाई दिया। पीड़िता की विधिक गुहार को दरकिनार कर पुलिस द्वारा मामले को रफा-दफा करने की नीयत से हल्की धाराओं में केस दर्ज करना खाकी की कार्यप्रणाली पर गंभीर कानूनी सवालिया निशान खड़े करता है।

संवाद के बदले मिली लाठियां और स्टंप

प्राप्त विधिक शिकायत और घटनाक्रम के अनुसार, गत 23 मई की शाम को अंबिकापुरी निवासी पीड़ित परिवार की चौखट पर तब मानसिक क्रूरता का पहाड़ टूटा, जब आरोपी विश्व प्रताप सिंह ठाकुर ने मोबाइल नेटवर्क का दुरुपयोग करते हुए अत्यंत आपत्तिजनक और विधिक रूप से दंडनीय कृत्य को अंजाम दिया। सामाजिक लोक-लाज और शांतिपूर्ण समाधान की आस में जब महिला अपने पति और पुत्र के साथ आरोपी के निवास स्थान पर केवल बात करने पहुंची, तो वहां कानून हाथ में लेने की पूर्व नियोजित पटकथा तैयार बैठी थी। आरोपी विश्व प्रताप और उसके पिता ने बिना किसी विधिक तर्क के, अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय, दादागिरी और अवांछित पहलवानी का प्रदर्शन करते हुए लात-घूंसों, लकड़ियों और क्रिकेट स्टंप से जानलेवा हमला बोल दिया।

रसूख के दबाव में रीढ़विहीन हुई पुलिस

इस जघन्य वारदात का सबसे शर्मनाक पहलू तब सामने आया जब बीच-बचाव करने पहुंची महिलाओं पर भी इन कथित रसूखदारों ने रहम नहीं खाया और बेरहमी से मारपीट की, जिसके कारण महिला अचेत होकर जमीन पर गिर पड़ी। आपातकालीन सेवा 112 के हस्तक्षेप के बाद घायलों को शासकीय अस्पताल पहुंचाया गया। कानून के तहत जहां आरोपियों पर गंभीर गैर-जमानती धाराओं और महिला उत्पीड़न की संगीन धाराओं के तहत तत्काल मुकदमा दर्ज होना था, वहीं एरोड्रम पुलिस ने आरोपी के पिता के ‘शासकीय रसूख’ और प्रभाव के आगे घुटने टेक दिए। पीड़ित पक्ष का स्पष्ट और सीधा आरोप है कि पुलिसिया तंत्र ने प्रशासनिक दबाव में आकर संगीन अपराध को महज एक सामान्य और साधारण मारपीट की धाराओं में तब्दील कर एफआईआर की खानापूर्ति कर दी।

डिजिटल साक्ष्य के बाद भी खाकी मौन

न्याय के सिद्धांतों को धता बताते हुए अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि एफआईआर दर्ज होने के बाद भी पीड़ित परिवार को लगातार गंभीर परिणाम भुगतने और केस वापस लेने की धमकियां दी जा रही हैं। इस समूचे घटनाक्रम का एक प्रामाणिक सीसीटीवी वीडियो भी सार्वजनिक हो चुका है, जो साक्ष्य अधिनियम के तहत अदालत में आरोपियों को जेल भेजने के लिए अकाट्य सबूत है। इसके बावजूद पुलिस प्रशासन मौन साधे बैठा है। थक-हारकर पीड़ित परिवार ने गुरुवार को पुलिस उपायुक्त (DCP) की शरण ली है। अब यह देखना विधिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होगा कि क्या इंदौर पुलिस के आला अधिकारी अपने मातहतों की इस रसूखपरस्ती को सुधारते हुए मामले में कड़ी धाराएं बढ़ाते हैं, या फिर रसूख के इस नंगे नाच के आगे कानून यूं ही बेबस और लाचार बना रहेगा।