खाकी की जल्दबाजी ने बाप-बेटे को धकेला सलाखों के पीछे, सिरकटी लाश की शिनाख्त पर पुलिसिया जांच तार-तार

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बुरहानपुर। कानून की आंख पर बंधी पट्टी और पुलिसिया तफ्तीश की घोर लापरवाही का एक ऐसा अंधा कानून मार्का सनसनीखेज मामला खकनार थाना क्षेत्र में आधिकारिक रूप से दर्ज हुआ है, जिसने आपराधिक न्याय प्रणाली और साक्ष्य अधिनियम की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। जिस युवती की जघन्य हत्या के संगीन इल्जाम में एक बेकसूर पिता और भाई को खाकी ने गुनाहगार मानकर जेल की सलाखों के पीछे सड़ा दिया, वह ‘मृतका’ अचानक कानूनी दस्तावेजों और कफन को चीरकर सीधे थाने आ खड़ी हुई। युवती के इस विधिक रूप से पुनर्जीवित होने के बाद अब सबसे बड़ा संवैधानिक संकट यह खड़ा हो गया है कि बिना पुख्ता फोरेंसिक और डीएनए मिलान के पुलिस ने अदालत को गुमराह कर बेगुनाहों को जेल कैसे भेज दिया?

खाकी की स्क्रिप्ट और फर्जी शिनाख्त


तथ्यात्मक साक्ष्यों के अनुसार, खकनार निवासी शिवानी गत 24 अप्रैल को अचानक लापता हो गई थी, जिसकी गुमशुदगी थाने में दर्ज थी। इसी दौरान पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र की सीमा में एक अज्ञात, सिरकटी और बुरी तरह जली हुई युवती की लाश बरामद हुई। खकनार पुलिस ने अपनी विधिक जवाबदेही और गहन अनुसंधान से पल्ला झाड़ते हुए, केवल परिस्थितियों और कपड़ों के सतही आधार पर उस विकृत शव को शिवानी घोषित कर दिया। बिना किसी वैज्ञानिक साक्ष्य या फोरेंसिक ऑटोप्सी रिपोर्ट के, पुलिस ने कानून की स्थापित प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर अपनी मनगढ़ंत कहानी तैयार कर ली।

बेगुनाहों पर जुल्म और अंधा कानून

इस कथित अंधे कत्ल का पर्दाफाश करने की अंधी होड़ में पुलिस ने न्याय के प्राकृतिक सिद्धांतों का गला घोंट दिया। मृतका के पिता बापूराव और भाई अजय को मुख्य आरोपी नामजद करते हुए पुलिस ने उन्हें भादंवि/भारतीय न्याय संहिता की धारा 302 के तहत गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया। समाज और कानून की नजर में पिता-पुत्र हत्यारे साबित कर दिए गए और पुलिस अपनी इस सफल तफ्तीश पर पीठ थपथपाती रही। बेकसूरों की चीखें और खुद को निर्दोष साबित करने की तमाम कानूनी गुहारें बंद फाइलों के नीचे दबा दी गईं।

जिंदा शव और कानूनी भूचाल

मामले में असली कानूनी भूचाल 27 मई की रात को आया, जब कथित रूप से कत्ल हो चुकी शिवानी साक्षात खकनार थाने के मुख्य द्वार पर आ खड़ी हुई और चिल्लाकर बोली साहब, मैं जिंदा हूं, मेरे बेकसूर पिता और भाई को रिहा करो। शिवानी ने अपने बयानों में स्पष्ट किया कि वह अपनी मर्जी से अपने परिचित अर्जुन के साथ सुरक्षित गई थी। इस स्वीकारोक्ति ने पुलिसिया जांच की साख को पूरी तरह दफन कर दिया है। अब सबसे बड़ा आपराधिक और विधिक यक्ष प्रश्न यह है कि यदि शिवानी जिंदा है, तो महाराष्ट्र में मिली वह सिरकटी लाश किसकी थी और पुलिस ने किस दबाव में आकर बेगुनाहों को जेल भेजा? राज्य मानवाधिकार आयोग और वरिष्ठ न्यायिक स्तर पर अब इस समूचे मामले की उच्च स्तरीय स्क्रूटनी तय मानी जा रही है।