दफ्तरों के ताले और जनता की बेहाली का जिम्मेदार कौन?
मध्य प्रदेश। कोरोना काल के बाद जब दुनिया सामान्य पटरी पर लौटी, तो सरकारी और अर्ध-सरकारी दफ्तरों की कार्यशैली में एक ऐसा बदलाव आया जो आम आदमी की जेब और वक्त दोनों पर भारी पड़ रहा है। कभी शनिवार को ‘हाफ डे’ के नाम पर आधे दिन काम करने की रवायत थी, लेकिन अब यह रवायत धीरे-धीरे अघोषित रूप से ‘फुल हॉलिडे’ या लंबी छुट्टी में तब्दील हो चुकी है। लॉकडाउन के दौरान शुरू हुए विशेष नियम अब अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए एक ढाल बन गए हैं, जिसकी आड़ में आम नागरिकों को भारी असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि जब महीने के अंत में इन कर्मचारियों के खातों में पूरी सैलरी आती है, तो फिर जनता को मिलने वाली सेवाओं में कटौती क्यों की जा रही है?
हैरानी की बात यह है कि सप्ताह में दो छुट्टियां मनाने के इस नए चलन ने सरकारी फाइलों की रफ्तार को और धीमा कर दिया है। दूर-दराज के गांवों से शहर आने वाले ग्रामीण जब शनिवार को काम की उम्मीद में दफ्तर पहुंचते हैं, तो उन्हें अक्सर खाली कुर्सियां और लटके हुए ताले ही मिलते हैं।
नियमों की इस धुंधली तस्वीर का फायदा उठाकर कुछ लोग ‘ऊपरी कमाई’ का रास्ता भी निकाल लेते हैं, क्योंकि काम पेंडिंग होने का डर दिखाकर आम आदमी को मजबूर किया जाता है। विभागीय गलियारों में यह चर्चा आम है कि शनिवार को काम न करने का कोई औपचारिक आदेश नहीं है, फिर भी यह परंपरा मूक सहमति से जारी है।
प्रशासनिक स्तर पर इस ढिलाई ने न केवल कार्य संस्कृति को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि जनता के भरोसे को भी कम किया है। जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग इस ओर से आंखें मूंद कर बैठे हैं, मानो शनिवार का गायब होना व्यवस्था का हिस्सा बन गया हो।
जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और हाजिरी के रजिस्टर की सख्ती से जांच नहीं की जाएगी, तब तक आम जन इसी तरह सिस्टम और छुट्टियों के बीच पिसता रहेगा। अब समय आ गया है कि इस ‘वर्क फ्रॉम होम’ और ‘शनिवार विश्राम’ की मानसिकता से बाहर निकलकर जनता के प्रति कर्तव्यों को प्राथमिकता दी जाए, ताकि टैक्स भरने वाले नागरिक को अपने जायज काम के लिए दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें। आखिर यह बदलाव कब आएगा यह हमारे लिए प्रश्न चिन्ह बन चुका है।










