
उज्जैन।भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन का प्रतिष्ठित शासकीय चरक भवन अस्पताल, जहाँ रोज हजारों गरीब मरीज अपनी बीमारियों का इलाज कराने और गर्भवती महिलाएं प्रसव के लिए आती हैं, आज खुद वेंटिलेटर पर है। यह अस्पताल पहले भी कई बार अपनी लापरवाही और अव्यवस्थाओं के कारण सुर्खियों में रहा है, लेकिन सुधार के नाम पर यहाँ सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं। अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की संवेदनहीनता का आलम यह है कि यहाँ आने वाला मरीज और उसके परिजन सुविधा के नाम पर सिर्फ जिल्लत और गंदगी झेलने को मजबूर हैं। अवंतिका के युवराज की टीम ने जब अस्पताल परिसर का गोपनीय रूप से गहन निरीक्षण किया तो जो तस्वीरें सामने आईं वे विचलित करने वाली हैं। अस्पताल का हर कोना सिस्टम की नाकामी और भ्रष्टाचार की गवाही दे रहा है। यहाँ की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया है, जिसका जवाब देने वाला कोई नहीं है।

भगवान भरोसे मरीजों की जान, चरक भवन की ऊंची इमारत और बंद लिफ्ट! प्रतीक्षा करते-करते कहीं मरीज दम न तोड़ दे?
तस्वीरें कहानी कहती हैं, अस्पताल की इमारत बहुमंजिला और विशाल है, जिसमें गंभीर रूप से बीमार मरीजों और गर्भवती महिलाओं को ऊपर से नीचे ले जाने के लिए सरकार ने छह आधुनिक लिफ्ट का प्रबंध किया है। परंतु अवंतिका के युवराज की टीम ने पाया कि अस्पताल की ये लिफ्ट हमेशा ही बंद रहती हैं। जैसा कि तस्वीरों में स्पष्ट है, लिफ्ट के दरवाजे बंद हैं और कोई ऑपरेटर नहीं है। केवल एक लिफ्ट किसी तरह चालू हालत में रहती है, जिसके बाहर मरीजों और उनके परिजनों की भारी भीड़ अपनी बारी का इंतजार करती रहती है। स्ट्रेचर पर लेटे हुए गंभीर मरीज लिफ्ट के खुलने की प्रतीक्षा में भगवान भरोसे पड़े रहते हैं। जरा सोचिए, यदि कोई मरीज जीवन और मौत की लड़ाई लड़ रहा हो और उसे ऊपर के फ्लोर पर ले जाना हो, तो बंद लिफ्ट उसके लिए काल साबित हो सकती है। यह कैसी स्वास्थ्य व्यवस्था है, जहाँ करोड़ों की लिफ्ट धूल फांक रही हैं और मरीज तकलीफ में तड़प रहे हैं?

गंदगी के बीच अमृत या विष? बेसिन में जमा सड़ांध और स्वच्छता का जनाजा! क्या ऐसे होगी बीमारियों से मुक्ति?
तस्वीरें कहानी कहती हैं, अस्पताल में जल ही जीवन है, लेकिन चरक भवन में यह मौत का पैगाम दे रहा है। जहाँ पर मरीजों और उनके परिजनों के लिए पानी का इंतजाम है, वहाँ के हालात देखकर आपकी रूह कांप जाएगी। तस्वीर में साफ दिख रहा है कि नल के नीचे जो बेसिन लगा है, उसमें गंदगी और सड़ांध जमा हो रही है। इसी बेसिन में लोग हाथ धोते हैं और मरीजों के खाने के बर्तन भी धोते हैं, जिसकी पूरी गंदगी उसी बेसिन में जमा होकर सड़ रही है। स्वच्छता का कोई नामोनिशान नहीं है। सबसे शर्मनाक बात यह है कि जहाँ पीने के पानी का नल लगा है वह कभी बंद ही नहीं होता, अस्पताल के बाहर सीडीओ के ठीक पास ही खुला नाला बह रहा है, जिससे गंदा पानी रिसकर जमा हो रहा है। लोग उसी गंदगी और बदबू के बीच लोग आना जाना करने को मजबूर हैं। नल को बंद करने का कोई प्रबंध नहीं किया गया है, पानी चौबीसों घंटे चालू रहता है और टपकता रहता है, जिससे बीमारियां फैलने का खतरा और बढ़ गया है।

नर्स और डॉक्टर नदारद सफाई कर्मी राजा! डॉक्टरों की कुर्सी पर जमे सफाई कर्मचारी अस्पताल में मची है अंधेर नगरी चौपट राजा की लूट
तस्वीरें कहानी कहती हैं, अस्पताल में अनुशासन और कार्यसंस्कृति पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। जहाँ पर नर्स और डॉक्टरों को बैठकर मरीजों की सेवा करनी चाहिए और उनके इलाज का ध्यान रखना चाहिए, वहाँ की तस्वीरें हैरान कर देने वाली हैं। हमारी टीम ने पाया कि डॉक्टरों की आरक्षित कुर्सियों और टेबलों पर सफाई कर्मी आराम से बैठे हुए हैं और अपनी मस्ती में चूर हैं। तस्वीर में सफाई कर्मी डॉक्टरों के केबिन में बैठे हुए साफ देखे जा सकते हैं। वे मोबाइल चला रहे हैं और गप्पें मार रहे हैं, जबकि मरीज बाहर डॉक्टर का इंतजार करते-करते बेहाल हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि अस्पताल सफाई कर्मचारियों के भरोसे ही चल रहा है और डॉक्टरों ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है। इस घोर लापरवाही ने चरक भवन को अंधेर नगरी चौपट राजा का जीता-जागता उदाहरण बना दिया है।

सड़क पर रस्सी बांधकर पार्किंग का खेल टेंडर को सफल बनाने की साजिश! आम जनता परेशान, अंदर की पार्किंग खाली
तस्वीरें कहानी कहती हैं, अस्पताल के बाहर की व्यवस्था भी उतनी ही बदतर है जितनी कि अंदर की। अस्पताल प्रशासन ने अपनी काले कारनामों को छुपाने और अवैध रूप से पार्किंग वसूली को बढ़ावा देने के लिए बाहर रोड पर रस्सी बांधकर ट्रैफिक को पूरी तरह प्रभावित किया हुआ है। यह रस्सियां केवल इसलिए बांधी गई हैं ताकि गाड़ियां जबरन बाहर ही पार्क करवाई जा सकें और उनसे पैसा वसूला जा सके। ऐसा प्रतीत होता है कि अंदर की पार्किंग का जो टेंडर दिया गया था, उसे सफल बनाने के लिए यह पूरा खेल रचा जा रहा है क्योंकि बाहर वसूली होने से अंदर वाले खाली बैठे हैं। इस लापरवाही के कारण अस्पताल के बाहर का मुख्य मार्ग हमेशा जाम रहता है, जिससे आम जनता और एम्बुलेंस को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। नगर निगम और पुलिस विभाग इस गंभीर समस्या पर आँखें मूंदकर क्यों बैठा है?

गुटका और कचरे का साम्राज्य, सीवरेज का गंदा पानी सड़कों पर! स्वच्छ भारत अभियान की उड़ रही है धज्जियां
तस्वीरें कहानी कहती हैं, स्वच्छता की बात की जाए तो यहाँ पर गंदगी का ऐसा आलम है कि अस्पताल कम और कचरा डिपो ज्यादा लगता है। मरीज और उनके परिजन गुटका, पान और कचरा कहीं पर भी फेंक देते हैं, लेकिन उसे साफ़ करने वाला कोई नहीं है। सफाई कर्मी डॉक्टरों की सीट पर मौज कर रहे हैं, तो सफाई कौन करेगा? सीवरेज का गंदा पानी खुलेआम बाहर बह रहा है और सड़कों पर फैल रहा है। तस्वीर में सीवरेज का गंदा पानी रोड पर बहता हुआ साफ दिखाई दे रहा है। यह गंदा पानी न केवल बदबू फैला रहा है, बल्कि मलेरिया और डेंगू जैसी घातक बीमारियों को भी दावत दे रहा है। अस्पताल प्रशासन ने सीवरेज सिस्टम को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है। क्या इस गंदगी के बीच मरीजों का इलाज संभव है?

फायर फाइटिंग बॉक्स खाली, आपातकाल में क्या होगा? भगवान न करे अगर अस्पताल में आग लग जाए तो कौन होगा जिम्मेदार?
तस्वीरें कहानी कहती हैं, अस्पताल में सुरक्षा व्यवस्था का हाल भी बेहाल है। जहाँ पर मरीजों की सुरक्षा के लिए फायर फाइटिंग व्यवस्था यानी आग बुझाने के उपकरण होने चाहिए वहाँ पर सिर्फ खाली बॉक्स लटके हुए हैं। तस्वीर में खाली बॉक्स साफ देखे जा सकते हैं, जिनमें न तो अग्निशमन यंत्र है और न ही कोई पानी की पाइपलाइन। अगर भगवान न करे कभी अस्पताल में आग लग जाए तो मरीजों को बचाने का कोई उपाय नहीं है। यह लापरवाही नहीं बल्कि आपराधिक कृत्य है, जिससे मरीजों की जान सीधे तौर पर खतरे में डाली जा रही है। अस्पताल प्रशासन इस गंभीर सुरक्षा खामी को जानते हुए भी अनजान बना हुआ है। क्या वे किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं?

मुख्य चिकित्सा अधिकारी और अस्पताल अधीक्षक की संवेदनहीनता: क्या वे आँखें मूंदकर बैठे हैं? यह समाचार उनकी विफलता का प्रमाण है।
चरक भवन अस्पताल की यह भयावह तस्वीरें मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और अस्पताल अधीक्षक की कार्यप्रणाली पर एक गहरा तमाचा है। क्या वे इस बदहाली से अनजान हैं? या फिर वे जानबूझकर इसे नजरअंदाज कर रहे हैं? यह समाचार उनके लिए एक चेतावनी है। क्या उन्हें गरीब मरीजों की तकलीफें नहीं दिखतीं? अवंतिका के युवराज की यह पड़ताल स्वास्थ्य विभाग की संवेदनहीनता और भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करती है। अब समय आ गया है कि जिम्मेदार अधिकारी अपनी कुंभकर्णी नींद से जागें और इस अस्पताल की व्यवस्था में सुधार करें अन्यथा जनता का विश्वास सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से पूरी तरह उठ जाएगा। शहर की जनता इस बदहाली का हिसाब मांग रही है।

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