
देवास। क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO) में सुधार की बयार और भ्रष्टाचार के पुराने बरगद के बीच एक ऐसी जंग छिड़ी है, जिसने विभाग की साख को दांव पर लगा दिया है। एक ओर वर्तमान आरटीओ निशा चौहान की डिजिटल सख्ती है, जिसने फर्जी फिटनेस के काले कारोबार पर ताला जड़ दिया है, तो दूसरी ओर सुभाष जैन और उसके भतीजे रूपेश जैन का वह ‘डिजिटल सिंडिकेट’ है, जो कथित तौर पर सरकारी दफ्तर के बजाय घर के ड्राइंग रूम से संचालित हो रहा है। सवाल यह है कि जब फिटनेस का खेल बंद हो चुका है, तो विभाग की अति-गोपनीय आईडी और पासवर्ड आज भी सिंधी कॉलोनी स्थित एक निजी बंगले के कंप्यूटरों की शोभा क्यों बढ़ा रहे हैं? क्या देवास का परिवहन विभाग अब आधिकारिक इमारत के बजाय चाचा-भतीजे के रहमोकरम पर चलेगा?
सिस्टम के अंधे न्याय और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता एक बेबस परिवार
क्या किसी प्रशासनिक दफ्तर की चौखट इतनी पथरीली हो सकती है कि वहां एक मजबूर मां की ममता और मासूम बच्चों के आंसू भी न पिघल सकें? आरटीओ कार्यालय देवास के बाहर की धूल आज उन सिसकियों की गवाह है, जिन्हें रसूख और रुपयों के दम पर खामोश कर दिया गया। श्रीमती कीर्ति रायकवार के शब्दों में केवल शिकायत नहीं, बल्कि उस लाचार पत्नी का कलेजा बोल रहा है, जिसने अपने पति अजय रायकवार को भ्रष्टाचार की इस आग में शारीरिक और मानसिक रूप से टूटते देखा है। जब एक दिव्यांग पिता को इंसाफ की गुहार लगाने पर जलील करके बाहर धकेल दिया गया, तब वहां खड़े उनके मासूम बच्चों की आंखों से गिरते आंसू शायद सिस्टम की फाइलों में दर्ज न हों, पर वे उस पिता की अपाहिज देह और छलनी रूह का दर्द बखूबी बयान कर रहे हैं। जिस दफ्तर का काम जनता की सुरक्षा करना था, वहां कथित तौर पर चंद रुपयों के लालच में नियम और इंसानियत दोनों को दफन कर दिया गया। एक तरफ काली कमाई के अंबार हैं और दूसरी तरफ वह बेबस परिवार, जो आज भी न्याय की उम्मीद में पथराई आंखों से शासन की ओर देख रहा है। यह महज एक खबर नहीं, उस मरती हुई उम्मीद की चीख है जो पूछ रही है कि क्या ईमानदारी का इनाम सिर्फ जिल्लत और झूठे मुकदमे ही हैं?
सरकारी आईडी और निजी कंप्यूटर सुभाष-रूपेश की जोड़ी का होम ऑफिस बना चर्चा का केंद्र
भ्रष्टाचार के इस नए अध्याय में सबसे चौंकाने वाला पहलू चाचा-भतीजे की वह कार्यप्रणाली है, जिसने सिस्टम को ठेंगा दिखा रखा है। सूत्रों और पीड़ितों का दावा है कि सुभाष जैन, जो कभी जया बसावा के कार्यकाल का सबसे चहेता खिलाड़ी था, अब अपने भतीजे रूपेश जैन के साथ मिलकर ‘वर्क फ्रॉम होम’ की तर्ज पर आरटीओ चला रहा है। आरोप है कि विभाग के कुछ ‘विभीषणों’ ने मोटी मलाई के चक्कर में सरकारी आईडी और पासवर्ड सुभाष के घर तक पहुँचा दिए हैं। जहाँ एक तरफ आरटीओ दफ्तर में आम जनता फाइलों के लिए भटकती है, वहीं दूसरी ओर रूपेश जैन घर बैठे उन फाइलों का निपटारा और कार्ड प्रिंटिंग का काम कर रहा है। यह न केवल सुरक्षा में बड़ी सेंध है बल्कि सरकारी डेटा की गोपनीयता के साथ किया जा रहा एक बड़ा अपराध है।
फर्जी फिटनेस पर तो लगाम लगी, लेकिन पंजीयन की डकैती अब भी जारी
निशा चौहान ने पदभार ग्रहण करते ही व्हाट्सएप पर बंटने वाली फर्जी फिटनेस (जैसे MP09LR4123 और UP35T4925 जैसी कई हजारों गाड़ियाँ) के गोरखधंधे को बंद कर एक साहसिक मिसाल पेश की है। उनके इस कदम से दलालों के खेमे में हड़कंप तो मचा, लेकिन सुभाष जैन जैसे मंझे हुए खिलाड़ी ने अपना रास्ता बदल लिया। अब खेल ‘रजिस्ट्रेशन और कार्ड’ के नाम पर खेला जा रहा है। आरटीओ की लॉगिन आईडी का घर से संचालित होना यह बताता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। पीड़ितों का आरोप है कि सुभाष जैन खुद को अधिकारियों का करीबी बताकर रसूख झाड़ता है, जबकि पर्दे के पीछे उसका भतीजा रूपेश जैन तकनीकी कमान संभालकर शासन के राजस्व को चूना लगा रहा है। क्या प्रशासन यह जांच करने की हिम्मत जुटाएगा कि किस आईपी एड्रेस से विभाग की आईडी पिछले कुछ महीनों में लॉगिन हुई है?
सफेदपोशों की ढाल और अवंतिका के युवराज के तीखे सवाल
देवास की जनता के बीच अब यह चर्चा आम है कि आखिर सुभाष जैन को किसका संरक्षण प्राप्त है? तीन साल पुराने शिकायती आवेदनों पर धूल जमना और एक निजी व्यक्ति द्वारा सरकारी डेटा का इस्तेमाल करना बिना किसी ‘बड़ी ताकत’ के संभव नहीं है। ‘अवंतिका के युवराज’ के खुलासे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सिंधी कॉलोनी का वह बंगला महज एक घर नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का ‘कंट्रोल रूम’ बन चुका है। प्रशासन की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए पीड़ितों ने पूछा है कि क्या नियम केवल आम जनता के लिए हैं? क्या किसी प्रभावशाली नेता के इशारे पर एक दलाल और उसके परिवार को सरकारी तंत्र से खिलवाड़ करने की खुली छूट दे दी गई है?
30 लाख से 60 लाख का सफर भ्रष्टाचार, की डबल इंजन सरकार
साल 2021 देवास आरटीओ के इतिहास में वह ‘काला वर्ष’ था, जब दलाली को आधिकारिक मान्यता मिल गई थी। विश्वसनीय सूत्रों का दावा है कि उस समय के तत्कालीन अधिकारियों के साथ मिलकर सुभाष जैन ने पूरे आरटीओ को ठेके पर ले लिया था। तब तय हुआ था कि हर महीने 30 लाख रुपये की ‘भेंट’ ऊपर तक पहुँचाई जाएगी और बदले में सुभाष जैन को दफ्तर चलाने की खुली छूट मिलेगी। लेकिन भ्रष्टाचार की भूख कभी शांत नहीं होती। पिछले तीन सालों में काली कमाई के इस धंधे ने ऐसी रफ़्तार पकड़ी कि आज यह आंकड़ा दोगुना यानी 60 लाख रुपये महीने तक पहुँच गया है। जनता की जेब से निकले टैक्स और मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा अब सरकारी खजाने में जाने के बजाय सुभाष जैन और उसके कुनबे की तिजोरियों में कैद हो रहा है।
निशा चौहान के लिए अग्निपरीक्षा, साख बचानी है तो ‘सिंडिकेट’ को तोड़ना होगा
वर्तमान आरटीओ निशा चौहान की छवि अब तक एक ईमानदार और सख्त अधिकारी की रही है। उन्होंने ‘अंधकार युग’ की कई कुरीतियों को खत्म किया है, लेकिन सुभाष और रूपेश जैन की यह जुगलबंदी उनकी स्वच्छ छवि के लिए सबसे बड़ा खतरा है। यदि घर से आईडी चलाने का यह ‘समानांतर सिस्टम’ बंद नहीं हुआ, तो यह माना जाएगा कि भ्रष्टाचार का चेहरा बदला है, चरित्र नहीं। शहर की जागरूक जनता अब कलेक्टर और उच्च अधिकारियों से मांग कर रही है कि सिंधी कॉलोनी के उस संदिग्ध ठिकानों पर छापेमारी की जाए और उन कंप्यूटरों को जब्त किया जाए, जहाँ सरकारी काम अवैध रूप से किया जा रहा है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस ‘चाचा-भतीजे’ की जोड़ी पर नकेल कसता है या फिर देवास आरटीओ इसी तरह ‘आउटसोर्स’ होकर चलता रहेगा।










